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कश्मीर पर भारत की बजाए पाकिस्तान के साथ क्यों खड़ा है तुर्की?

प्रज्ञा बाजपेयी
03 October 2019
कश्मीर पर भारत की बजाए पाकिस्तान के साथ क्यों खड़ा है तुर्की?
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तुर्की की राजधानी अंकारा में संसद के इस साल के तीसरे सत्र को संबोधित करते हुए स्पीकर मुस्तफा सेनतप ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का पुरजोर समर्थन किया. तुर्की संसद के स्पीकर ने मंगलवार को कहा कि कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ खड़े होना तुर्की का कर्तव्य है.
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तुर्की संसद के स्पीकर ने कहा कि हमारा देश भारतीय मुसलमानों की दोस्ती को भूला नहीं है. दरअसल, वह एक शताब्दी पहले के तुर्की के स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय मुस्लिमों के योगदान के बारे में बात कर रहे थे. इसके बाद उन्होंने फिलिस्तीन का जिक्र किया. स्पीकर मुस्तफा ने सांसदों से कहा कि तुर्की फिलिस्तीन में इजरायल द्वारा फैलाए जा रहे आतंकवाद की निंदा करता है. उन्होंने कहा कि तुर्की फिलिस्तीनी भाइयों के साथ हमेशा खड़ा रहेगा.
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इससे पहले, तुर्की राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में भी कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन किया था. संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन में एर्दोगन ने कहा कि कश्मीर का मुद्दा न्याय और समानता के आधार पर बातचीत से सुलझाया जाना चाहिए, ना कि संघर्ष से. उन्होंने कहा कि पिछले 72 सालों में 'कश्मीर विवाद' को अंतरराष्ट्रीय समुदाय का पर्याप्त समर्थन नहीं मिला है.
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यह पहली बार नहीं है जब तुर्की ने कश्मीर मुद्दे पर इस्लामाबाद का समर्थन किया है. 1947 के बाद से ही तुर्की का झुकाव पाकिस्तान की तरफ रहा है. इन सारी चुनौतियों के बावजूद भारत तुर्की के साथ कई अहम द्विपक्षीय मुद्दों पर आगे बढ़ने में सफल रहा है. 2011 में अफगानिस्तान के विकास के लिए हार्ट ऑफ एशिया-इस्तांबुल की स्थापना की गई जिसमें भारत को भी सदस्य बनाया गया.
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इससे पहले, 2000 में दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में तुर्की प्रीमियर बुलेंत एसिविट ने भारत का दौरा किया था और उन्हें मशहूर साहित्यकार रवीन्द्रनाथ टैगोर की कृतियों में गहरी रुचि के लिए डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया था. 16 साल की उम्र में एसिविट ने टैगोर की गीतांजलि का तुर्की में अनुवाद किया था. यह 14 साल के लंबे अंतराल के बाद किसी तुर्की प्रीमियर का भारत का दौरा था.
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जब एसिविट भारत के दौरे पर आए तो पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने उनसे इस्लामाबाद में रुकने का आग्रह किया लेकिन पाकिस्तान के साथ करीबी होने के बावजूद एसिविट ने पाक के अनुरोध को खारिज कर दिया ताकि भारत की भावनाओं को ठेस ना पहुंचे.
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पिछले कुछ वर्षों में भारत और तुर्की के साथ व्यापारिक संबंध तो मजबूत हुए हैं लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के बीच तनाव भी रहा है. अपने घर में विवादित नेता एर्दोगन अपनी तानाशाही के लिए जाने जाते हैं और वह तुर्की की सेक्युलर छवि को तोड़कर उसकी इस्लामिक छवि को मजबूत करना चाह रहे हैं. तुर्की राष्ट्रपति एर्दोगन ने 2017 में एक उच्च स्तरीय कारोबारी प्रतिनिधि दल के साथ भारत का दौरा किया था. इस दौरे में भारत-तुर्की ने 2020 तक द्विपक्षीय व्यापार को 6.4 अरब डॉलर से बढ़ाकर 10 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया. हालांकि, 2018-19 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 7.84 अरब डॉलर का व्यापार हुआ. कई मुस्लिम देशों का कई बार दौरा कर चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अभी तक तुर्की का एक भी बार दौरा नहीं किया है.
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उइगर पर खामोशी
एर्दोगन का कश्मीर पर आक्रामक रुख चीन में उइगर मुस्लिमों पर उनकी चुप्पी से बिल्कुल उलट है. दुनिया भर के मुस्लिमों के मुद्दों को उठाने वाले एर्दोगन पिछले साल तक उइगर मुस्लिमों पर चीन के अत्याचार के खिलाफ मुखर थे.

उइगर मुस्लिमों के साथ तुर्की का सीधा संबंध है क्योंकि उइगर तुर्की का ही नस्लीय समूह है. तुर्की के रुख में इस बदलाव के पीछे विश्लेषक चीन की सफल कूटनीति को देखते हैं. विश्लेषकों का कहना है कि चीन ने लगातार बातचीत और कूटनीति से तुर्की को चुप करा लिया. यहां तक कि बीजिंग ने एर्दोगन व अन्य पर्यवेक्षकों को उइगर बहुल शिनजियांग प्रांत का दौरा करने के लिए भी आमंत्रित किया.
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तुर्की गणराज्य के संस्थापक मुस्तफा कमाल अतातुर्क हमेशा से तुर्की को एक ऐसा देश बनाना चाहते थे जो धर्म से शासित ना हो. हालांकि, एर्दोगन अपने कार्यकाल में इस विचारधारा के उलट तुर्की को मुस्लिमों के मसीहा देश के तौर पर साबित करने में जुटे हुए हैं.
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यूएई, सऊदी अरब और ओमान में भारत के पूर्व राजदूत तलमीज अहमद कहते हैं, 'ये बात सच है कि कि खाड़ी देशों के साथ भारत की करीबी जिस तेजी से बढ़ रही है, तुर्की के साथ संबंध वैसे मजबूत नहीं हो पाए हैं. लेकिन ये भी सच है कि इस रिश्ते की अपनी सीमाएं हैं. हमें ये समझना होगा कि एर्दोगन एक ऐसी पार्टी के नेता हैं जो इस्लामिक है, इसलिए उनके लिए ये बेहद जरूरी है कि वह इस्लाम से जुड़े मुद्दों को पकड़े रहें.'
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कश्मीर और भारत की एनएसजी (न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप) की सदस्यता दो ऐसे मुद्दे हैं जिन पर तुर्की मजबूती से पाकिस्तान के साथ खड़ा रहा है. पिछले साल भारत की एनएसजी की सदस्यता का तुर्की ने विरोध किया था क्योंकि उस वक्त पाकिस्तान की सदस्यता के आवेदन पर विचार नहीं किया गया था.
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