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इमरान खान ने बढ़ाया जिसका कार्यकाल, वही उनके लिए बन रहे नासूर

aajtak.in
03 October 2019
इमरान खान ने बढ़ाया जिसका कार्यकाल, वही उनके लिए बन रहे नासूर
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पाकिस्तान की पहले से ही बेहद ताकतवर सेना अब देश चलाने में और भी बड़ी भूमिका निभा रही है. आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को उबारने के लिए सैन्य नेतृत्व ने सरकार के हाथों से कमान छीनकर अपने हाथों में ले ली है.
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पाक आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए कारोबारी नेताओं से गोपनीय मुलाकातें कर रहे हैं. पाकिस्तान की वित्तीय राजधानी कराची और रावलपिंडी के सैन्य कार्यालय में ऐसी तीन मुलाकातें हो चुकी हैं.

मामले से जुड़े सूत्रों ने ब्लूमबर्ग को बताया कि बैठकों में बाजवा ने कारोबारी नेताओं से पूछा कि अर्थव्यवस्था को कैसे सही रास्ते पर लाया जाए और किस तरह से पाक में विदेशी निवेश बढ़ाया जाए. सूत्रों के मुताबिक, इन बैठकों के बाद सरकारी अधिकारियों को जल्दबाजी में कई निर्देश भी जारी कर दिए गए.
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बैठकों के बारे में पूछे जाने पर आर्मी प्रवक्ता ने प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया. हालांकि, गुरुवार को बाजवा की कारोबारी नेताओं के साथ मुलाकात के बाद सेना की तरफ से एक बयान जारी किया गया. बाजवा ने बयान में कहा, राष्ट्रीय सुरक्षा अर्थव्यवस्था से करीबी से जुड़ा मुद्दा है और संपन्नता सुरक्षा जरूरतों और आर्थिक वृद्धि के बीच संतुलन की ही प्रक्रिया है.

1947 में पाकिस्तान के बनने के बाद से सेना ने कई बार तख्तापलट को अंजाम दिया है. पाक की सेना पर वर्तमान आर्थिक संकट का सीधा असर पड़ा है. वित्तीय वर्ष 2020 में रक्षा खर्च में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई. एक दशक से ज्यादा के वक्त में पहली बार ऐसा हुआ था कि सेना के बजट में बढ़ोतरी नहीं हुई. रक्षा बजट में कटौती ऐसे वक्त में हुई है जब पाक कश्मीर और अफगानिस्तान को लेकर परेशान है.
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पाकिस्तान में कई कारोबारियों और आर्थिक विश्लेषक आर्मी जनरल की बढ़ती भूमिका का स्वागत कर रहे हैं. वे इमरान खान की पार्टी को सेना की तुलना में अनुभवहीन मानते हैं. हालांकि, कई लोगों को ये चिंता सता रही है कि सेना का बढ़ता दखल पाकिस्तान के लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित हो सकता है.

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर किताब लिख चुके और सिटीग्रुप के पूर्व बैंकर युसूफ नजार कहते हैं, सुरक्षा मामलों में पारंपरिक प्रभुत्व के बाद अर्थव्यवस्था में सेना की बढ़ती भूमिका कुछ और नहीं बल्कि एक धीमा तख्तापलट है जो लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है. इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे.

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आर्थिक नीतियों में दखल को वित्त मंत्रालय तूल देने से बच रहा है. वित्त मंत्रालय के प्रवक्ता उमर हामिद खान ने कहा, आर्मी चीफ के पास अर्थव्यवस्था को लेकर सुझाव हो सकते हैं लेकिन हमने किसी भी तरह का दखल नहीं महसूस किया है. उनका अपना कार्यक्षेत्र है और सरकार का अपना.

पाकिस्तान एक ऐसे असाधारण दौर से गुजर रहा है जब लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार और आर्मी एक ही लाइन में खड़े नजर आ रहे हैं. पाकिस्तान की सेना ने देश के 72 साल के इतिहास में करीब आधे वक्त तक शासन किया है जिसकी वजह से तख्तापलट की आशंका लगातार बनी रहती है.
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वैसे इमरान खान लगातार सेना से अपने सकारात्मक रिश्तों को जाहिर करते रहते हैं. अगस्त महीने में इमरान खान ने 58 वर्षीय बाजवा का कार्यकाल तीन साल के लिए बढ़ा दिया था. तब आर्मी प्रवक्ता आसिफ गफूर ने बयान दिया था कि बाजवा कार्यकाल के विस्तार को स्वीकार करने के इच्छुक नहीं थे लेकिन दुनिया के शीर्ष नेताओं के साथ उनके मजबूत रिश्तों की वजह से पीएम इमरान खान ने उनसे सेवा में बने रहने का आग्रह किया.

जुलाई महीने में एक टेलिविजन इंटरव्यू में इमरान खान ने कहा, "यह पहली सरकार है जिसके साथ सेना भी खड़ी है. ऐतिहासिक तौर पर, आर्मी और सरकारें अलग-थलग रूप से काम करती रही हैं. लेकिन वर्तमान में सभी संस्थाएं मेरे साथ हैं."

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पाकिस्तान की सरकार के अनुमान के मुताबिक, पिछले एक दशक में पाक की आर्थिक वृद्धि दर (2.4 फीसदी) सबसे धीमी रहने वाली है. पाकिस्तान ने अर्थव्यवस्था को संकट से बचाने के लिए मई महीने में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 6 अरब डॉलर का कर्ज लिया था.

पाक का बजट घाटा इस साल जीडीपी का 8.9 फीसदी तक पहुंच गया था जोकि पिछले तीन दशकों में सर्वाधिक था. रिकॉर्ड तोड़ आयात की वजह से पाक का विदेशी मुद्रा भंडार भी बिल्कुल खाली हो गया था. टोयोटा की स्थानीय यूनिट से लेकर पावर सीमेंच लिमिटेड तक सभी कंपनियों ने उत्पादन घटा दिया था जबकि नेस्ले ने पाकिस्तानी यूनिट में वर्करों की संख्या घटा दी थी.
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सूत्रों के मुताबिक, बंद कमरे में व्यापारियों के साथ हुई बैठक में आर्मी चीफ ने देश के करेंट अकाउंट घाटा, भ्रष्टाचार की समस्या और घटते विदेशी निवेश की समस्या पर बातचीत की. व्यापारियों ने पाक आर्मी चीफ से इमरान खान सरकार की इकोनॉमी टीम की शिकायत भी की.
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कराची आधारित ऑप्टिमस कैपिटल मैनेजमेंट प्राइवेट में शोधकर्ता फैजान अहमद कहते हैं, हमें पाक की अर्थव्यवस्था के हर नजरिए से देखभाल करने वाले जनरल की जरूरत है. आर्मी पाकिस्तान की सबसे व्यवस्थित और प्रतिष्ठित संस्था है. 2017 में पाकिस्तान में हुए एक ओपिनियन पोल के मुताबिक, लोकतंत्र का समर्थन करते हुए भी अधिकतर पाकिस्तानी जनता सेना पर सबसे ज्यादा भरोसा करती है. कारोबारियों के साथ बाजवा की बैठकों को लेकर भी सकारात्मक माहौल है.
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आर्मी की निजी क्षेत्र में भी सीधी भागेदारी है. आर्मी 'फौजी फाउंडेशन' भी चलाती है जिसके खाने से लेकर बिजली तक हर क्षेत्र में हित जुड़े हुए हैं. व्यावसायिक हित होने और पाकिस्तानी जीवन के हर क्षेत्र में मौजूदगी होने के बावजूद भी सेना का आर्थिक नीतियों में दखल कई विश्लेषकों को हैरान कर रहा है.
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वॉशिंगटन आधारित कंसल्टेंसी अल्ब्राइट स्टोनब्रिज ग्रुप एलएलसी के दक्षिण एशिया के निदेशक उजैर युनूस कहते हैं, सेना की विदेश मामलों और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में अहम भूमिका रही है लेकिन आर्थिक मामलों में उसकी भूमिका सीमित रही है. हालांकि, अर्थव्यवस्था की सुस्त रफ्तार की वजह से सेना की भागेदारी बढ़ रही है क्योंकि इसका असर रक्षा बजट पर पड़ रहा है.
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पाकिस्तान के एक दशक के इतिहास में पहली बार रक्षा बजट में कोई बदलाव नहीं हुआ. जुलाई महीने में पाकिस्तान की आर्थिक नीतियों को तय करने के लिए बनाई गई उच्च स्तरीय राष्ट्रीय विकास परिषद में बाजवा को भी शामिल किया गया. ऊर्जा क्षेत्र की निगरानी के लिए बनाई गई सरकारी समिति में भी आर्मी की इंटर सर्विस इंटेलिजेंस के एक सदस्य को नामांकित किया गया है.

पाकिस्तान मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के मुद्दे पर आर्थिक प्रतिबंधों से बचने की कोशिशें कर रहा है. इसके लिए पाकिस्तान ने उच्च स्तरीय कमिटी का भी गठन किया है जिसमें कम से कम दो शीर्ष सैन्य अधिकारी शामिल हैं.
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आर्मी ऐसे वक्त में आर्थिक फैसलों में हस्तक्षेप कर रही है जब इमरान खान की लोकप्रियता में भारी गिरावट आई है. रोशन पाकिस्तान के सर्वे के मुताबिक, उनकी लोकप्रियता में करीब 18 फीसदी की गिरावट हुई है. बाजवा के साथ करीबी से इमरान खान को अपनी लोकप्रियता बढ़ाने में मदद मिल सकती है.

सेंट्रल पंजाब यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के विभागाध्यक्ष राशिद अहमद खान ने कहते हैं, इमरान खान के लिए रेटिंग गिरना या विपक्ष का गठबंधन कोई बड़ा खतरा नहीं है. आर्मी ही इकलौता ऐसा सहारा है जो इमरान खान को पतन से बचा सकती है.

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