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हिंदुओं की तरह अंतिम संस्कार करने को क्यों मजबूर चीनी मुसलमान?

aajtak.in [Edited By: प्रज्ञा बाजपेयी]
11 March 2019
हिंदुओं की तरह अंतिम संस्कार करने को क्यों मजबूर चीनी मुसलमान?
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वांग तिंग्यु उदासी के साथ अपने बिस्तर के पास खाली पड़ी जगह की तरफ इशारा करती हैं जहां उनका ताबूत रखा रहता था. 20 साल पहले वांग और उनके पति ने इस ताबूत को खरीदा था, तब उनकी उम्र 60 साल थी. पति की मौत के बाद वांग का ताबूत कमरे के एक कोने में रखा हुआ था ताकि जब वह इस दुनिया को अलविदा कहें तो उनका शरीर इसमें दफनाया जा सके. कुछ महीने पहले कुछ अधिकारी 81 साल की वांग के घर में घुसे और उसके ताबूत को लेकर चले गए. वांग के मुताबिक, अधिकारियों ने मुआवजे के तहत उन्हें 1000 युआन (145 डॉलर) यानी कीमत का एक तिहाई हिस्सा थमा गए.
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दक्षिण-पूर्वी प्रांत जियानगी में रहने वाली वांग का दुख उनके पड़ोसी भी बांट रहे हैं. पड़ोसियों ने बताया कि इस साल अधिकारी घर-घर जाकर बुजुर्गों के खरीदे हुए ताबूत जमा कर रहे हैं. चीन के ग्रामीण इलाकों में अपनी मौत से पहले अपना ताबूत खरीदने का रिवाज है. कई लोग ताबूत को स्टेटस सिंबल से भी जोड़कर देखते हैं. जिसके घर जितना भव्य ताबूत आता है, उसे उतना ही ज्यादा समृद्ध समझा जाता है. अधिकारी ताबूत इकठ्ठा करने के बाद मैकेनिकल डिगर से उन्हें नष्ट कर दे रहे हैं. उनका दावा है कि इन टुकड़ों को जलाकर बिजली पैदा की जाएगी. राज्य की मीडिया का कहना है कि ग्रामीणों ने अपनी मर्जी से ताबूत सौंपे हैं जबकि स्थानीय इसका विरोध करते हैं. एक ग्रामीण का कहना है कि लोगों के भीतर इस बात को लेकर बहुत गुस्सा है.

(Photo: Juha)
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चीनी सरकार का लोगों को अपने करीबियों को मौत के बाद दफनाने से रोकना कोई नया काम नहीं है. इसका एक लंबा इतिहास रहा है. 1911 में औपनिवेशिक साम्राज्य के पतन के बाद सुधारवादियों ने शवों को जलाने की वकालत की, उनका मानना था कि यह आधुनिकता का प्रतीक है. यह नजरिया खुद माओ का था जिनका मानना था कि ताबूत बनाना लकड़ी और पैसे की बर्बादी है और दफनाने की प्रक्रिया से अंधविश्वास बढ़ता है. दिलचस्प ये है कि बीजिंग में खुद उनकी पत्थर की बनी हुई कब्र है. फ्रेंच नैशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च के नाताचा एवेलाइन दुबाच के मुताबिक, 1958-61 के बीच शंघाई में कब्रगाहें सुअरों के लिए खोल दी गई थीं. 1960-70 के बीच कब्रों के पत्थर किचन काउंटर्स और फर्श की टाइल्स में दिखने लगीं.

(Photo: Getty Images)
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माओ के उत्तराधिकारियों ने भी दफनाने को लेकर उनकी गलत मान्यताएं आत्मसात कर लीं. उनका डर कुछ और भी था- दफनाने की वजह से खेती लायक जमीन में कमी आ जाएगी और बढ़ती आबादी के लिए खाद्य उपलब्ध कराने में चीन की सक्षमता घट जाएगी. 1979 में एक बच्चे की नीति लागू की गई थी ताकि तेजी से बढ़ती आबादी पर काबू पाया जा सकें. 'एंटी बरियल मूवमेंट' इसीलिए चलाया गया ताकि इस दुनिया को अलविदा कह चुके लोगों को खेती की जमीन मिलने से रोका जा सके.

(Photo: Getty Images)
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1986 से 2005 के बीच चीन का नैशनल क्रीमेशन रेट (दफनाने की दर) 26 फीसदी से 53 फीसदी तक बढ़ गई. बड़े शहरों में दफनाने की जगह जलाने की प्रक्रिया से अंतिम संस्कार करना आम बात हो गई. कुछ ग्रामीण इलाकों में आज भी दफनाने की परंपरा जारी है.
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2012 में शी जिनपिंग के सत्ता में आने के बाद से अधिकारियों ने दफनाने को रोकने वाले अभियान को और तेज कर दिया है. 2014 में सरकार ने कहा था कि क्रीमेशन (जलाने) रेट में सालाना 1 फीसदी की वृद्धि दर चाहती है और कुछ खास इलाकों में 100 फीसदी क्रीमेशन चाहिए. सरकार इकोबरियल्स को बढ़ावा दे रही है. इसमें अस्थियों को बिस्तर में दफनाने या समुद्र में छिड़कना शामिल है.

(Photo: Getty Images)
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जियान्गी में विद्रोह की कई घटनाएं हुईं जब कुछ काउंटीज ने कहा कि वे अगस्त के अंत तक किसी को शव दफनाने नहीं देंगी. सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो भी वायरल हो रहे हैं जिसमें लोग अधिकारियों को अपना ताबूत जब्त करने से रोकने के लिए ताबूत में लेटे दिख रहे हैं.

(Photo: Handout)
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दफनाने की परंपरा को रोकने के लिए तेज होता आंदोलन केवल खेती लायक जमीन की कमी से जुड़ा हुआ नहीं है. सरकार का मानना है कि ताबूत पर और अंतिम संस्कार में किया जाने वाला भारी-भरकम खर्च 2020 तक गरीबी हटाने की कोशिशों के लिए एक झटका है. अधिकारी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए प्रांतों को खूबसूरत बनाना चाहते हैं जिनमें कब्रिस्तान की कोई जगह नहीं है. कुछ ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन कई बार उनके बरियल लैंड को हथियाकर डिवलेपर्स को बेच देते हैं.

(Photo: Handout)
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पिछले 3 सालों में क्रीमेशन रेट में बढ़ोतरी हुई है लेकिन कब्र विरोधी मुहिम का बुरा असर भी देखने को मिल रहा है. 2014 में अन्हुई प्रांत के कई पेंशनर्स ने मौत को गले लगा लिया. वे चाहते थे कि उनके अवशेष जलाए नहीं जाएं बल्कि दफनाए जाएं. कई चीनी लोगों का विश्वास है कि शरीर को पूर्ण रूप में रखना पूर्वजों के लिए सम्मान का प्रतीक होता है.

((Photo.jfif)
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इसी साल, गुवान्गडोंग में दो अधिकारियों पर 20 से ज्यादा शवों को कब्रों से खोदने के लिए लोगों को हायर करने का आरोप लगा था. इसके बाद अधिकारियों ने शवों को जलाया गया ताकि क्रीमेशन टारगेट को पूरा किया जा सके. इस तरह का यह इकलौता मामला नहीं है. अधिकारियों का प्रमोशन और भत्ते भी कई बार ऐसे टारगेट से जुड़े होते हैं. कुछ गांवों में समस्या इतनी गंभीर है कि लोग अपने रिश्तेदारों की कब्रों की सुरक्षा के लिए कैंपिंग कर रहे हैं.
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शहरी अधिकारी कब्र ही नहीं, अस्थियों की राख को दफनाने को लिए भी जमीन देने के इच्छुक नहीं है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल शहर में दफनाने के लिए एक वर्ग मीटर प्लॉट की कीमत 112,000 युआन ($16,000) थी. यह गुआनडान्ग के महंगे शहर शेनजांग में एक वर्ग मीटर के अपार्टमेंट की कीमत का दोगुना है.
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चीन की एक बच्चे के नीति लागू करने के वक्त भी सरकार को किसी भी तरह की आलोचना का समाना नहीं करना पड़ रहा था लेकिन दफनाने को लेकर चलाई जा रही मुहिम के खिलाफ मीडिया सरकार पर हमलावर है. सरकार संवेदनशीलता दिखाने के लिए कुछ इलाकों में समुद्र में अपनी अस्थियों की राख बहाने का वादा करने वाले पेंशनर्स को अतिरिक्त भत्ता देने का लालच दे रही है. वहीं कुछ प्रांतों में ग्रामीणों से शवों के दाह संस्कार का खर्च उठाने का भी वादा किया जा रहा है.
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उम्मीद की जा रही है कि चीन जल्द ही नागरिकों की गरिमा का सम्मान करते हुए अंतिम संस्कार संबंधी नियमों में बदलाव करेगा. 2012 में दाह संस्कार को बढ़ावा देने के लिए किसी भी तरह का बल प्रयोग नहीं किया जाएगा.

जीरो-बरियल पॉलिसी के आने के बाद से ताबूत बनाने या रखने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है. नए नियमों की सख्ती का आलम ये है कि यिंयांग काउंटी सरकार ने कहा था कि नियमों के विरुद्ध दफनाए गए एक शव को कब्र से खोदकर निकाल लिया गया है.
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