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इंटरव्यू: एक बेकसूर कैदी से पूछिए, सलाखों का रंग

नक्सल गतिविधियों का आरोप. 4 साल 8 महीने तक जेल में पुलिस का टॉर्चर सहा. कोर्ट ने हर मामले से बरी किया. कहानी 'कलर्स ऑफ द केज' के लेखक अरुण फेरेरा की.

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स्नेहा [Edited By: कुलदीप मिश्र]नई दिल्ली, 30 October 2015
इंटरव्यू: एक बेकसूर कैदी से पूछिए, सलाखों का रंग Arun ferreira and his book Colours of the Cage

यह नागपुर की गर्म दोपहर थी. सेंट जेवियर्स कॉलेज से पढ़े एक्टिविस्ट अरुण फेरेरा स्टेशन पर किसी साथी का इंतजार कर रहे थे. तभी उन्हें 15 लोगों ने घेर लिया और धक्के मारकर एक कार में डालकर ले गए. रास्ते में उन्हें मारा-पीटा गया और बाद में बताया गया कि नागपुर की एंटी नक्सल सेल ने उन्हें डिटेन कर लिया है. दूसरे दिन देश के अखबारों की अहम खबर थी-  'देश का बड़ा नक्सली गिरफ्तार.'

अरुण पर प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओइस्ट) का मेंबर होने समेत कुल 10 आरोप लगाए गए. पूरे 4 साल 8 महीने तक जेल में रहने के बाद वह जमानत पर जेल से बाहर आए.  जमानत के दो साल बाद तक उन पर कोई भी आरोप सिद्ध नहीं हो सका और अंतत: उन्हें हर मामले में बरी कर दिया गया.

अब वे  बाहर हैं, पर जिंदगी कितनी सामान्य है, उन्हीं से पूछिए. जिसकी उम्र के 4 साल 8 महीने जेल में खर्च हो गए, वह भी अंडा सेल में भयावह टॉर्चर, गाली-गलौज और धीमे ट्रायल की तपिश झेलते हुए, वह अब कितना सामान्य होगा, पता नहीं. अरुण ने जेल में वक्त काटने के लिए किताबों का सहारा लिया और स्केचिंग की पुरानी हॉबी को विस्तार दिया. सलाखों के पीछे से ही उन्होंने ह्यूमन राइट्स की पढ़ाई की. वहां रहते हुए भी पढ़ने और अर्जित करने के लिए संघर्ष किया.

बाहर आने के कुछ समय बाद उन्होंने उन स्केचों के इस्तेमाल से एक किताब लिखी- 'कलर्स ऑफ द केज'. अलेफ बुक कंपनी से प्रकाशित इस किताब में उन्होंने अपने एक्टिविज्म, गिरफ्तारी, टॉर्चर, बेल मिलने के तुरंत बाद हुई गिरफ्तारी से लेकर बेदाग निकलने तक के सफर का तफसील से ब्योरा दिया है. यह एक कैदी की आम जेल डायरी नहीं है. पुलिसिया तौर-तरीकों और न्याय व्यवस्था पर सवाल करता एक मजबूत दस्तावेज भी है. सलाखों का रंग कैसा होता है, यह फेरेरा जानते है. हमने उनसे जानने की कोशिश की, उनकी जिंदगी के बारे में, भारत की जेलों के बारे में और न्याय व्यवस्था पर उनकी राय के बारे में. पढ़िए उनसे हुई बातचीत:

4 साल 8 महीने जेल में रहने और फिर सभी मामलों में बरी होने के बाद आपका देश के ज्यूडिशियरी सिस्टम में कितना विश्वास बचा है?

फेरेरा: मैं नहीं जानता हूं कि 'विश्वास' शब्द का उपयोग इसके लिए करना सही रहेगा. सच्चाई यह है कि भले मैं लंबे समय तक जेल में रहा लेकिन मुझे सारे आरोपों से मुक्ति मिली और मुझे रिहा किया गया. वहीं कई केस ऐसे हैं जहां पुलिस ने झूठे आधार पर केस को फ्रेम भी किया है, जैसा कि बिनायक सेन और सीमा आजाद के केस में हुआ. ये लोग अपना ट्रायल तेजी से चलवाने और जल्दी बेल पाने में कामयाब रहे लेकिन इन्हें दोषी भी करार दिया गया. मैं इस सवाल का जवाब नहीं दे सकता कि मेरा विश्वास ज्यूडिशियरी में है या नहीं. इससे अच्छा मैं यह कहना पसंद करूंगा कि यह सिस्टम न्याय नहीं दे पाता है.

आपकी राय में न्याय क्या है?
फेरेरा: यह एक बड़ा सवाल है. मैं न्याय को क्रिमिनल जस्टिस सेंस में नहीं देखता हूं. मैं न्याय को सामाजिक न्याय के रूप में देखता हूं. समानता की सामान्य अवधारणा का भारी गैरबराबरी वाले समाज में कोई मतलब नहीं है. ज्यादातर अन्याय धनी या ताकतवर कॉरपोरेट लोग ही करते हैं, लेकिन यह अन्याय किसी को नहीं दिखता. जब तक अमीरों और ताकतवरों की ओर से किए जा रहे अन्याय को नहीं पहचाना जाएगा, तब तक गरीबों-कमजोरों को न्याय नहीं मिलेगा. यहां तक कि जब वंचित तबके में से कोई सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसे पकड़कर जेल में डाल दिया जाता है.

आपने अपनी किताब में लिखा है कि जेल से बाहर निकलने के बाद भी आपको डर रहेगा कि 'बिग ब्रदर इज वॉचिंग यू'. ऐसा कुछ आपके साथ अभी हो रहा है क्या?
फेरेरा: जब मैं बेल पर बाहर आया तब मुझे हर दिन लोकल पुलिस से बात करनी होती थी. यह एक सामान्य सी चीज है. लेकिन मेरे सभी केसों से बरी होने के बाद ऐसी ('बिग ब्रदर इज वॉचिंग यू' के संबंध में) कोई घटना नहीं घटी है. पुलिस और इंटेलीजेंस एजेंसियां ऐसे लोगों से पूछताछ जरूर करती हैं, जिनसे मैं अपने एक्टिविज्म के दौरान मिलता हूं. यहां तक कि मैं जिस संगठन से जुड़ा हूं, उसकी भी जांच-पड़ताल की जाती है.

जेल में नक्सली गतिविधियों के आरोपियों और दूसरे आरोपियों के बीच पुलिस क्या कोई भेदभाव करती है? पुलिस के काम करने के तरीके और सवाल पूछने के तरीके में क्या अंतर होता है? क्या आपको लगता है कि पुलिस ने टॉर्चर करने के अपने 'अलिखित' कानून बना रखे हैं?
फेरेरा: भारत में पुलिस कस्टडी में पूछताछ के दौरान टॉर्चर करना एक आम बात है. हालांकि कानून में इस शब्द का कहीं भी जिक्र नहीं है, फिर भी हमारे देश में इसे मान्यता मिली हुई है. इसका मतलब यह है कि पुलिस वालों को पूरे महकमे और सीनियर अफसरों का समर्थन हासिल होता है. साधारण कैदियों को सबूत निकलवाने के लिए टॉर्चर किया जाता है, जैसे 'जिस हथियार से तुमने मारा, उसे कहां छुपाया है'. लेकिन जिन पर राजनीतिक कैदी या आतंकवाद के आरोप होते हैं, उन्हें सजा देने, उनके समाज को चुप कराने और भेदभाव के मकसद से टॉर्चर किया जाता है. जैसा कि मुस्लिम आरोपियों के साथ होता है. मेरा मानना है कि पुलिस को अंदरूनी तौर पर टॉर्चर करने की विधियों के बारे में ट्रेनिंग दी जाती है. यहां तक कि इसमें विदेशी एजेंसी जैसे कि सीआईए और मोसाद से भी मदद ली जाती होगी.

नक्सली हमलों में देश के सैनिक भी मारे जाते हैं. आप इन हमलों को किस तरह देखते हैं?
फेरेरा: मैं किसी तरह की प्रतिहिंसा को जस्टिफाई नहीं करता हूं. मैं मानता हूं कि ऐसी हिंसा स्टेट की ओर से की जाने वाली हिंसा का जवाब होता है.

क्या आपको लगता है कि मुल्क और महाराष्ट्र (जहां की जेल में आप थे) में, बीजेपी की सरकार बनने के बाद शासन व्यवस्था बेहतर हुई है?
फेरेरा: पहले से बिल्कुल भी अच्छी नहीं हुई है, बल्कि खराब हो गई है. केंद्र और राज्य दोनों की सरकार सांप्रदायिक दंगे को रोकने में नाकाम रही है, बल्कि ऐसे मामलों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है.

क्या आपने जेल में ही किताब लिखने का फैसला कर लिया था, जैसा कि आपने स्केचेस की मदद से जेल की जिंदगी के पहलुओं को बयान किया है?
फेरेरा: नहीं, मैं जेल में टाइमपास और हॉबी के लिहाज से स्केचिंग करता था. जेल में रहते हुए मैंने अपने स्केच पब्लिश करवाने के बारे में सोचा था लेकिन अपने कैदी जीवन के बारे में किताब लिखने का विचार मन में नहीं था.

क्या आप अभी भी पिछड़े, वंचित, दलित और आदिवासी लोगों के लिए काम कर रहे हैं या आप आरोपी नक्सलियों के केस को भी देख रहे हैं.
फेरेरा: मेरा एक्टिविज्म मुंबई शहर में जारी है. मकसद यही है कि वंचितों की मदद की जाए. इस देश में ज्यादातर वंचित लोग गरीब, दलित और अल्पसंख्यक है. तो हां मैं अपना काम जारी रखे हुए हूं और हां मैं नक्सली होने के आरोप में जेल में बंद कैदियों को कानूनी तरीके से जेल से बाहर निकालने में भी मदद कर रहा हूं.

इस किताब को लिखते हुए आपको दोबारा उन सारी चीजों से गुजरना पड़ा होगा, जेल से बाहर आकर वापस अपनी जिंदगी को दोबारा शुरू करना कितना मुश्किल था आपके लिए?
फेरेरा: हां, इस दौरान मुझे उन सारे अनुभवों से गुजरना पड़ा. लेकिन यह अच्छा था और इसने सच्चाई से जोड़ने में मदद भी किया. पांच साल तक जेल में रहने के बाद और समाज में वापस आने पर लाइफ में कई एडजस्टमेंट करने होते हैं. जिंदगी को पटरी पर लाने में कुछ समय लगता है. मैं सोचता हूं कि ऐसा जारी ही रहेगा, इसके बार में मैंने अपने किताब के आखिरी चैप्टर में लिखा है.

जेल के अनुभव के आधार पर क्या आप यह मानते हैं कि जेल में रहने से कैदी बदल जाते हैं?
फेरेरा: हां, एक कैदी जेल में जरूर बदलता है. मगर यह बदलाव ऐसा नहीं है कि जेल जाकर व्यक्ति में सुधार आ जाए और वह पहले से अच्छा इंसान बन जाए. बल्कि यह बदलाव ऐसा है कि जेल जाकर इंसान स्टेट से ज्यादा डर जाता है या वह यह सीख लेता है कि क्राइम करके बिना पकड़ में आए, कानून की गिरफ्त से कैसे बचा जा सकता है. यानी उसके अंदर से कानून का डर ही खत्म हो जाता है.

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