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जिस ईश्वर पर लिखता हूं, उसके साथ कंट्रोवर्सी नहीं कर सकता: अमीश त्रिपाठी

टीशर्ट-जींस पहनकर पौराणिक आख्यानों को अपने तरीके से अंग्रेजी में लिखने वाले अमीश त्रिपाठी की जिंदगी भी उनकी व्याख्याओं जैसी दिलचस्प है.

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aajtak.in
कुलदीप मिश्रनई दिल्ली, 13 July 2015
जिस ईश्वर पर लिखता हूं, उसके साथ कंट्रोवर्सी नहीं कर सकता: अमीश त्रिपाठी Amish Tripathi

उनके दादा बनारस में पंडित थे. संस्कृत के प्रकांड विद्वान. घर में भी धार्मिक माहौल था. लेकिन आईआईएम से ग्रेजुएट उस नौजवान का ईश्वर से भरोसा टूट गया. वह घर से दूर बैंकर होकर अच्छा पैसा कमाने लगा. लेकिन चूंकि पढ़ने का शौक और जाने-अनजाने मिली धार्मिक संस्कारों की विरासत साथ थी, तो वह लिखने लगा. शिव की कहानी अपने तरीके से लिखनी शुरू की और फिर लिखते-लिखते चमत्कारिक तरीके से  वह आस्तिक हो गया. पहली किताब छपकर आई तो सुपर-डुपर-हिट हुई. फिर शिव की कहानी पर दो और किताबें आईं, जो भारत में सबसे तेजी से बिकने वाली बुक सीरीज बनी. उनकी शिव ट्रिलजी की करीब 2.5 मिलियन कॉपी बिकीं, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है.

टीशर्ट-जींस पहनकर पौराणिक आख्यानों को अपने तरीके से अंग्रेजी में लिखने वाले अमीश त्रिपाठी की जिंदगी भी उनकी व्याख्याओं जैसी दिलचस्प है. 'शिव त्रयी' के रूप में उनकी 'इमॉर्ट्ल्स ऑफ मेलुहा', 'सीक्रेट ऑफ नागाज' और 'द ओथ ऑफ वायुपुत्राज' जबरदस्त सफल रही हैं. अब वह भगवान राम की कहानी लिख रहे हैं. राम सीरीज की पहली किताब 'सायन ऑफ इक्ष्वाकु' पिछले महीने ही रिलीज हुई. इसी किताब के एक इवेंट के लिए वह पिछले हफ्ते दिल्ली में थे. 4 जुलाई को ताज पैलेस होटल में उनसे मुलाकात और तफसील से बात हुई.

अमीश धार्मिक कहानियों की फिक्शनल तरीके से व्याख्या करते हैं जो भारत में राजनीतिक तौर पर एक विस्फोटक सब्जेक्ट हो सकता है. इसके बावजूद वह विवादों से दूर बने रहने का भरोसा जताते हैं. खुद को राम-भक्त स्वीकारने में वह हिचकते नहीं, पर इसके राजनीतिक पक्ष पर भी खुलकर सामने नहीं आते. बावजूद इसके किताब के हर पहलू पर अपनी प्रकट विनम्रता के साथ बात करने को तैयार दिखते हैं, असहमति का सम्मान करते हैं और जिंदगी में 'बैलेंस' बनाने के हिमायती हैं.

पेश है कुलदीप मिश्र और नंदलाल शर्मा से हुई अमीश त्रिपाठी की बातचीत:

कुलदीप: आप शिव ट्रिलजी के बाद राम की कहानी लिखने वाले हैं जो भारत में राजनीति और धार्मिक लिहाज से एक संवेदनशील विषय है? फिर भी इस विषय को चुना?
अमीश:
मैं दिल से लिखता हूं. ज्यादातर कंट्रोवर्सी खड़ी की जाती हैं. लेखक खुद करते हैं. ताकि पब्लिसिटी मिल जाए और किताब निकल जाए. राम जी की कहानी और प्रेरणा सदियों से चला आ रहा है. जिस पॉलिटिक्स की आप बात कर रहे हैं वो तो कुछ साल से ही है. राम तो हमारे जेहन और आत्मा में मिले हुए हैं. उनकी कहानी से सीखने को बहुत मिलता है. तो मैं कंट्रोवर्सी करता नहीं हूं, तो होती नहीं है.

कुलदीप: आपकी व्याख्या तुलसी या वाल्मीकि रामायण से अलग होगी, जिस पर किसी को ऐतराज हो तो विवाद होगा ही. इसमें आपके चाहे, न चाहे से क्या होता है. जैसे राम की मुंहबोली बहन रोशनी का गैंगरेप वाला सीन जो दिल्ली गैंगरेप से इंस्पायर्ड लगता है. कोई उसे कहानी की तरह लेगा, पर किसी के धार्मिक प्रतीकों को चोट भी लग सकती है?
अमीश: यह इस फिलॉसफी पर डिस्कशन करने के लिए लिखा गया है कि अहम क्या है कि न्याय या कानून. आप जानते हैं कि जो हुआ वह अपराध था और उसे एक नाबालिग ने अंजाम दिया था. मेरी किताब में जो कांड है वह दिल्ली से ज्यादा नहीं, बल्कि अमेरिका के एक मामले का उदाहरण लेकर लिखा है. मैं चाहता हूं कि नाबालिग के अपराधों पर चर्चा होनी चाहिए. यह पश्चिमी देशों में भी बहुत है. 90 के दशक में वहां बड़ी समस्या हो गया था. हमने तय किया है कि कोई 18 साल से कम उम्र का अपराधी है तो उसे ज्यादा सजा नहीं दी जाएगी. अमेरिका में यह तय किया गया है कि संगीन जुर्म में 10 साल की उम्र से ज्यादा के बच्चों को भी सजा दी जाएगी. इस पर चर्चा तो होनी चाहिए हमारे देश में. मैं वही पूछने की कोशिश कर रहा हूं. मैं सही और गलत की बात नहीं कर रहा है. पर चाहता हूं कि देश इस बारे में सोचे. मेरी किताब में आप पाएंगे कि राम कानून के पक्ष में हैं और भरत न्याय के पक्ष में. बाकी कहानी तो आप किताब में पढ़ेंगे ही.

कुलदीप: आपकी व्याख्या वाल्मीकि, कम्ब या तुलसी की व्याख्या से कैसे अलग है?
अमीश: रामायण की बहुत व्याख्याएं हैं. ज्यादातर उत्तर भारतीयों से पूछेंगे तो वे तुलसी रामायण को ही रामायण समझते हैं. उनसे पूछिए कि क्या लक्ष्मण रेखा का कोई वर्णन है रामायण में? वे कहेंगे- हां. लेकिन वाल्मीकि रामायण में कोई जिक्र नहीं है इसका. मैं बस एक उदाहरण दे रहा हूं, ऐसे बहुत हैं. अगर आप पूछें कि राम जी ने कभी रावण की प्रशंसा की थी क्या? लोग कहेंगे नहीं. लेकिन कंब रामायण में बहुत मशहूर सीन है जिसमें राम और रावण ने एक-दूसरे की प्रशंसा की, फिर दोनों में युद्ध हुआ. अगर आप पूछेंगे कि जो मुख्य रावण है, उसका वध किसने किया, ज्यादातर लोग कहेंगे श्रीराम. लेकिन हजार साल पुराने अद्भुत रामायण में सीता मां ने मां काली का रूप लेकर बड़े रावण का वध किया. अलग-अलग पहलू हैं, राम जी के पास जाने के. एक वर्जन मेरा भी है.

नंदलाल: आज की पीढ़ी रामायण-रामचरितमानस से ज्यादा आपकी किताबें पढ़ रही है. क्या आपको लगता है कि 20-25 साल बाद आपकी की हुई व्याख्या ज्यादा प्रभावी होंगी?
अमीश: अरे नहीं नहीं (हाथ जोड़ लेते हैं). मेरी किताबें इतनी अच्छी नहीं हैं. हमारी प्रथा इतनी सदियों से चली आ रही है. हजारों साल से चली आ रही है. सदियों रहा है दुश्मन दौरे-जहां हमारा, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी. लेकिन ये हमारे देश की एक खासियत है कि हम अलग अलग पहलू को मानने को तैयार रहते हैं. जैसे आप नॉर्थ इंडिया में किसी से पूछें कि कार्तिकेय और गणेश में कौन बड़े हैं. वे कहेंगे कार्तिकेय. लेकिन दक्षिण भारत में गणेश बड़े हैं. नॉर्थ में कार्तिकेय जी को ब्रह्मचारी माना जाता है जबकि साउथ की मान्यता है कि उनकी दो पत्नियां हैं. हम लोग नॉर्थ के रहने वाले हैं, लेकिन साउथ में कार्तिकेय जी के मंदिर में गए तो उनकी पत्नियों की भी पूजा की. तो ये हमारे भारत की खासियत है कि हम अलग अलग सत्य को मानने को तैयार हैं.

कुलदीप: आप हमेशा ही लिबरल अप्रोच के लगते हैं. आपके पुराने इंटरव्यूज भी देखे हैं. आप शिकायत बिल्कुल भी नहीं करते.
अमीश: पूरा इंडिया ही लिबरल अप्रोच का है. मैंने तो स्वामी विवेकानंद की ही बात दोहराई.

कुलदीप: कहां है लिबरल? पीके के खिलाफ भी प्रदर्शन होते हैं?
अमीश: 'पीके' पर मैंने भी आर्टिकल लिखा था एक अखबार में. मुझे वो पिक्चर पसंद नहीं आई थी. उस आर्टिकल का पहला पैराग्राफ मैंने यही लिखा था कि फिल्म को प्रदर्शित किए जाने का पूरा हक है. उसी हक से मैंने अपनी बात लिखी. मुझे लगा कि फिल्म में मूर्ति पूजा का तिरस्कार किया जा रहा है. जबकि मुझे लगता है कि मूर्ति पूजा तो अच्छी चीज है और यह हमारी उदारता की निशानी है. अगर आप मूर्ति में भगवान देखते है, तो इसका 'रूट' यह है कि वह हर चीज में भगवान देखते हैं. इसका मतलब है कि आप हर चीज की इज्जत करने को तैयार हैं.

कुलदीप: बैंकिंग और नास्तिकता से लेखन और आस्था की तरफ कैसे लौटे? ये बदलाव, ये ट्रांसफर्मेशन कैसे हुआ?
अमीश: ये धीरे धीरे हुआ. जैसे जैसे मैं पहली किताब लिखता चला गया, मैं आस्था की तरफ वापस खिंचता चला गया. जब मैं बच्चा था तो आस्तिक ही था. परिवार का माहौल ही धार्मिक था. मेरे बाबा बनारस में पंडित थे, आपने सही कहा. मेरे मां-बाप बहुत धार्मिक थे. कुछ साल के लिए मैं नास्तिक बन गया था. मेरा मानना है कि अगर मैं जैसा इंसान अगर आस्था की तरफ आ सकता हूं तो कोई भी आ सकता है. क्योंकि मैं थोड़ा रेबेलियस (बागी) किस्म का आदमी हूं.

(अमीश के 6 साल के बेटे तैयार होकर वहां पहुंचते हैं. अपने बाल-सुलभ शेखी से अपने नए कुर्ते पायजामे का दर्शन कराते हुए. हम एक पल को रुक जाते हैं. अमीश कहते हैं- वाह जनाब बहुत अच्छे लग रहे हैं. फिर अमीश बात को आगे बढ़ाते हैं.)

...तो हम जैसे रेबेलियस लोगों के भगवान तो शिव ही हैं.

कुलदीप: तो मैं ये मानकर चलूं कि आप जब लिखते हैं तो विवादास्पद चीजों के बारे में सोचते नहीं हैं, क्योंकि आपको लगता है कि कोई कंट्रोवर्सी होगी नहीं.
अमीश: नहीं मैं दिल से लिखता हूं. मेरा यही मानना है कि मन साफ तो कंट्रोवर्सी नहीं होती. लेकिन दिल में खोट हो तो कंट्रोवर्सी निकल ही आती है. आप मीडिया से हैं, बुरा ने मानें. आप जानते होंगे कि 99 फीसदी कंट्रोवर्सी लेखक खुद करते हैं. दुख की बात यह है कि किताब को इसका फायदा भी मिलता है. लेकिन मैं आस्तिक हूं, मैं जिस ईश्वर के बारे में लिखता हूं, उसे पूजता हूं. उसके साथ कंट्रोवर्सी करना मेरे दिल को गलत बात लगेगी.

कुलदीप: ये एक श्रद्धालु की तरफ से लिखी गई किताब है या एक किस्सागो की तरफ से या...?
अमीश: (सवाल को बीच में काटते हुए) श्रद्धालु की तरफ से. मुझे अपने धर्म पर बहुत गर्व है. यह मैं बार बार सीना ठोंककर बोलता हूं. मेरा मानना है कि हमारी प्राचीन सभ्यता में बहुत अच्छी बातें हैं, जिन्हें हम सीख सकते हैं. जैसे भगवद्गीता के 18वें अध्याय में कृष्ण जी ने कहा कि अगर भगवान भी कुछ बोलें तब भी हमें अपना दिमाग इस्तेमाल करके अपने कर्म खुद करने चाहिए. क्योंकि कर्म का फल आपको ही मिलना है आपको ही सोचना है कि आपका कर्म आपके स्वधर्म के अनुकूल है या नहीं. ये मेरे हिसाब से तो अच्छी बात है.

कुलदीप: राम किसी के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, पर किसी के लिए विवादित किरदार हैं. राम को विवादित किरदार मानने वालों की भी अपनी एक राजनीतिक लाइन है. उनका प्रचार यह होता है कि उन्होंने जो सीता की अग्निपरीक्षा ली, वह एक महिलाविरोधी कदम था. या शंबूक का 'वध' एक दलितविरोधी काम था? आपकी क्या राय है इस पर?
अमीश: इन घटनाओं की व्याख्या मैं अपनी किताब में तो लिखूंगा. लेकिन अगर सीता मां के बारे में कहूं तो डेढ़ साल पहले मैंने इसी विषय पर एक आर्टिकल लिखा. उसमें मैंने लिखा था कि मैं श्रीराम की इज्जत क्यों करता हूं. मैंने लिखा था कि उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है. मर्यादा पुरुषोत्तम का मतलब क्या है, 'कानून का आदर्श पालक'. श्रीराम की कहानी हमें यह सिखाती है कि भई एक मर्यादा पुरुषोत्तम की जिंदगी कैसी होती है. आम तौर पर ऐसे लोग जिस समाज को लीड करते हैं, उस समाज का वे बहुत भला करते हैं. लेकिन उनके पारिवारिक जीवन में आम तौर पर कठिनाइयां होती हैं. मैंने कहा कि सिर्फ श्रीराम को नहीं दूसरों को भी देखें, जो मर्यादा के मुताबिक चलते थे. गौतम बुद्ध को देख लीजिए, उनके फलसफे से कितनी शांति मिलती है. लेकिन उनके परिवार को देख लीजिए. उन्होंने अपने परिवार को त्याग दिया. जब वो वापस आए उन्होंने राहुल को अपने बेटे के तौर पर स्वीकारने से साफ मना कर दिया. महात्मा गांधी को देख लीजिए. उनके बेटों से उनके रिश्ते बहुत अच्छे नहीं थे. अगर समाज में कानून का राज होता है तो समाज के लिए अच्छा होता है. परिवार में कानून का नहीं प्यार का राज होना चाहिए. राम को बुरे रूप में देखना एक पहलू है. दूसरा पहलू मैं अपनी किताब में लिखूंगा. राम की जिंदगी से यह सीखने को मिलता है कि जो मर्यादा पुरुषोत्तम होते हैं उनकी जिंदगी कैसी होती है. हमारे देश में ऐसे भी लीडर हुए हैं जिन्होंने अपने परिवार को कानून और देश से ज्यादा अहमियत दी. कह सकते हैं कि वे लीडर शायद लीडर अच्छे नहीं थे, लेकिन माता पिता अच्छे थे.

(अगले पेज पर पढ़िए अमीश के पसंदीदा नेताओं के नाम)

कुलदीप: आपके पसंदीदा लीडर्स कौन से हैं?
अमीश: (मुस्कुराते हुए कहते हैं) नहीं मैं राजनीति पर टिप्पणी नहीं करता. माफ कीजिए. कंट्रोवर्सी से दूर रहने का यही तरीका है. (फिर एक ठहाका कमरे में गूंजता है..)

कुलदीप: जो अब नहीं हैं, उन्हीं के नाम ले लीजिए?
अमीश: हमारे फाउंडिंग फादर्स में सब लीडर्स अच्छे थे. सरदार पटेल, महात्मा गांधी, नेहरू, डॉ. आंबेडकर, मौलाना आजाद, राजगोपालचारी, सुभाष चंद्र बोस, अरविंदो. हमारी किस्मत अच्छी थी.

नंदलाल: इन नेताओं की भी अलग अलग वजह से आलोचना होती है.
अमीश: राजनीतिक बात नहीं करूंगा. कोई भी लीडर इंसान है. खामियां खूबियां सबमें होती हैं. देश का भला हुआ कि नहीं, बस वही देखना चाहिए.

नंदलाल: आपने लिखने के लिए माइथोलॉजी को ही क्यों चुना?
कुलदीप: इसी में यह बात जोड़ दूं कि आप चेतन भगत जैसा फिक्शन लिखकर आसानी से सफल हो सकते थे, क्योंकि वह उसी तरह के लेखन का दौर था. लेकिन माइथोलॉजी का यूथ से कनेक्ट नहीं था अब तक. आपने मुश्किल रास्ता चुना.
अमीश: मैं कभी लेखक बनना ही नहीं चाहता था. मैंने रास्ता नहीं चुना, रास्ते ने मुझे चुन लिया. 'हंबल' परिवार से हूं. बाप-दादा का आशीर्वाद है, जायदाद वगैरह नहीं है. नौकरी अच्छी थी मेरी. नौकरी से खुश भी था. लेकिन इस किताब का जब आइडिया मुझे लगा, 11-12 साल पहले तो अपने लिए ही लिख रहा था. तब मैंने ये भी नहीं सोचा था कि किताब छपकर आएगी. अपने और परिवार के लिए लिख रहा था बस. शायद बिना सोचे-समझे मैं वही कर रहा था जो हमारे कृष्ण भगवान कहते हैं कि कमर्ण्ये वाधिकारस्ते माफलेषु कदाचन्. 'सायन ऑफ इक्ष्वाकु' भी मैंने इसी सोच से लिखी है. हो सकता है मेरी अगली किताब न चले. तो कोई नहीं, मैं वापस बैंकिंग में चला जाऊंगा. लेकिन वही करूंगा, जो मेरे दिल को सही लगेगा. अगर सिर्फ पैसा कमाना है तो बैंकिंग भी कोई बुरा जरिया नहीं है.

कुलदीप: मैंने सुना है कि आपके पास 20 साल का प्लान तैयार पड़ा है. राम के बाद क्या लिख रहे हैं.
अमीश: हां राम जी की 5 किताबें आएंगी तो चार-पांच साल इसी में निकल जाएंगे. फिर और भी कई कहानियां हैं, मनु के ऊपर, ब्रह्मा जी, परशुराम जी और श्री रुद्र और मोहिनी पर है. एक महाभारत पर है और ये सब कहानियां एक-दूसरे से जुड़ी हैं. रामचंद्र सीरीज के बाद आप शिव ट्रिलजी दोबारा पढ़ें, तो मैंने उसमें कुछ सुराग छोड़े हैं रामचंद्र सीरीज के. महाभारत, परशुराम और सबकी कहानी के क्लू मैंने शिव ट्रिलजी में छोड़े हैं. मेरी कहानियां मेरे दिमाग में 9 हजार साल के बीच फैली हुई हैं. 12 हजार साल पहले से लेकर 9 हजार साल पहले तक. यह वैदिक लोगों की कहानी है, मनु के साथ संस्कृति के जन्म और 3500 साल पहले संस्कृति के खात्मे तक. और हम उनके 'अयोग्य वंशज' हैं.

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