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'आसां नहीं है बच्चों का ध्यान खींचना'

बाल साहित्य कोई बच्चों का खेल नहीं है, यह बात रस्किन बॉन्ड से बेहतर भला और कौन जानता है. बाल साहित्य के पितामह जैसी हैसियत पर पहुंच चुके रस्किन बॉन्ड का मानना है कि बच्चों का ध्यान किताबों की तरफ खींचना कोई आसान काम नहीं है. इसके लिए जिम्मेदारी का भाव और खास तरह की संवेदनशीलता की दरकार होती है.
'आसां नहीं है बच्चों का ध्यान खींचना' रस्किन बॉन्ड
aajtak.in [Edited By: विकास त्रिवेदी]नई दिल्ली, 02 August 2015

बाल साहित्य कोई बच्चों का खेल नहीं है, यह बात रस्किन बॉन्ड से बेहतर भला और कौन जानता है. बाल साहित्य के पितामह जैसी हैसियत पर पहुंच चुके रस्किन बॉन्ड का मानना है कि बच्चों का ध्यान किताबों की तरफ खींचना कोई आसान काम नहीं है. इसके लिए जिम्मेदारी का भाव और खास तरह की संवेदनशीलता की दरकार होती है.

उनका यह भी मानना है कि अब बाल साहित्य को गंभीरता से लिया जा रहा है. 81 साल की उम्र में 150 से अधिक किताबों के रचयिता रस्किन बॉन्ड ने बाल साहित्य की दिशा-दशा से लेकर निजी जीवन तक पर खुलकर बातें कीं. लैंडमार्क बुक स्टोर की पहल 'चाइल्ड रीडिंग टू चाइल्ड' के तहत चुने गए पांच बच्चों से मुलाकात के बाद उन्होंने ये बातें की.

अपनी कलम से शब्दों का जादू गढ़ने वाले रस्किन बॉन्ड ने कहा कि पहले के कुछ पन्ने अगर मजेदार नहीं हुए तो फिर बच्चे उस किताब को किनारे रखने में देर नहीं लगाते. इसलिए बच्चों के लिए लिखते वक्त लेखक को अधिक जिम्मेदारी और संवेदना की जरूरत पड़ती है.

रस्किन बॉन्ड ने कहा कि स्कूल के दिनों से ही उनकी पढ़ने की आदत कोई बहुत अच्छी नहीं थी. हालांकि वह कहते हैं कि बाद में इसमें सुधार हुआ. उन्होंने कहा, 'मैं हमेशा सुनता रहता हूं कि इंटरनेट-गिजमोस की वजह से बच्चों की पढ़ने की आदत पर प्रतिकूल असर पड़ा है लेकिन मेरा स्कूल का टाइम टीवी और इंटरनेट से पहले का है और उस वक्त भी कम ही बच्चे पढ़ने में मजा लेते थे. तो, मुझे नहीं लगता कि इस बात का इंटरनेट से कोई लेना-देना है.'

'रस्टी एंड द मैजिक माउंटेन्स' का विमोचन अगले महीने
रस्टी के नाम से भी मशहूर रस्किन बॉन्ड की नई किताब 'रस्टी एंड द मैजिक माउंटेन्स' का विमोचन अगले महीने होने जा रहा है. उनका मानना है कि पिछले 10 सालों में बाल साहित्य की स्थिति में बहुत सुधार हुआ है. उन्होंने कहा कि आज से 10-15 साल पहले प्रकाशक बाल साहित्य को गंभीरता से नहीं लेते थे लेकिन भला हो अंग्रेजी भाषा का जिसकी वजह से अब शिक्षक और अभिभावक भी बच्चों के लिए अच्छा साहित्य चाहने लगे हैं.

पद्म भूषण, पद्म श्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजे जा चुके रस्किन बॉन्ड ने 81 साल की उम्र में अपनी सक्रियता के बारे में कहा, 'मैं एक आलसी लेखक हूं. एक दिन में दो पन्ने लिखता हूं और फिर सो जाता हूं. इतनी किताबें तो कई सालों के लिखने का नतीजा हैं.' रस्किन बॉन्ड की कुछ किताबों पर फिल्म भी बन चुकी है. 'द ब्लू एंब्रेला' नाम की किताब पर इसी नाम से फिल्म बनी है.

शादी क्यों नहीं की?
कसौली में पैदा हुए और मसूरी को अपना घर बनाने वाले रस्किन बॉन्ड ने कहा कि उनकी पहली किताब 'द रूम आन द रूफ' हमेशा उनके दिल के करीब रहेगी. शादी नहीं करने के बारे में उन्होंने कहा कि यह इत्तेफाक ही है कि उनकी शादी नहीं हुई. अपनी जगह बनाने में लगे एक युवा लेखक की आर्थिक हैसियत ऐसी नहीं थी कि परिवार चला सके. उन्होंने बताया कि वह अपनी आत्मकथा में इसका उल्लेख करेंगे, इसका कोई पछतावा नहीं है. वे अपने खुद के बनाए परिवार में वह खुश हैं.

इनपुट IANS

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