एडवांस्ड सर्च

Advertisement

महिला दिवस: निहारती हैं आंखें रोज हथेलियों को...

महिला दिवस के मौके पर महिलाओं की स्थिति बयां करती एक कविता.
महिला दिवस: निहारती हैं आंखें रोज हथेलियों को... symbolic image
aajtak.in[Edited by: विकास त्रिवेदी]नई दिल्ली, 03 April 2015

हर दिन सुबह आंख खोलते ही
निहारती हैं हम हथेलियों को
देखती हैं अपने किस्मत की रेखा
जाने रात भर में
क्या बदल गया होगा
बदलता कुछ नहीं
पैरों में वही चकर घिन्नी लगी है
जो पैदा होते वक्त
धरती मां से खोइन्छे में मिली थी

रोबोट की तरह
सेट हो चुका है अपना माइंड सेट
अब उसी कण्ट्रोल बटन से चलता है
अपने जीवन का कारोबार
इसलिए कभी कभी याद भी नहीं रहता
अगले दिन इतवार है या सोमवार
तो भला कैसे याद रहेगा
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का त्योहार
जिसमे हमें याद दिलाया जाता है
कि हमें भी हैप्पी होना है
साल के तीन सौ पैंसठ दिनो में से
अब भला कैसे याद रहे
अदना सा 8 मार्च का एक दिन
जबकि इस दिन अपने परिवार में से
किसी का जन्मदिन भी तो नहीं पड़ता
और ना ही होता है
दीवाली, ईद, गुरु-पूरब, ईस्टर
या कोई राष्ट्रीय त्योहार

आज भी
स्कूल की किताबों में नहीं होता
वुमन के हैप्पी होने का कोई चैप्टर
वो मर्दानी झांसी की रानी हो सकती है,
या हो सकती है
ममता की नदी सी मदर टेरेसा या
करुणा की लौ लिए नाईट-एंगल
बाजू का दम दिखाती मेरीकॉम या
उड़नपरी पी टी उषा हो सकती है
वो हो सकती है
पुचकारने वाली मां,
लाड दिखाने वाली बहन
प्यार लुटाने वाली पत्नी
और ख्याल रखने वाली बेटी या बहू

लेकिन नहीं हो सकती तो बस
खुल कर आजाद ख्यालों से
जिन्दगी जी लेने वाली आम लड़की
थोपी हुई सोच की दल-दल से निकल कर
खुली हवा में सांस लेने वाली स्त्री
लिंगानुपात की ही तरह
इसे भी महिला दिवस का नाम देकर
एक दिन में समेट दिया गया है
जहां हम उसी रोबोटिक माइंड सेट की तरह
उस दिन खुश हो जाते हैं
रटे-रटाये ज़ुबान से कहते हैं
'हैप्पी वुमेंस डे'

(ये कविता वाराणसी में रहने वाली रेनू मिश्रा ने लिखी है)

Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay