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कमलेश्वर की कहानी: राजा निरबंसिया

पढ़िए, कमलेश्वर की मशहूर कहानी 'राजा निरबंसिया'.

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aajtak.in
aajtak.inनई दिल्ली, 06 January 2015
कमलेश्वर की कहानी: राजा निरबंसिया Kamleshwar

'एक राजा निरबंसिया थे', मां कहानी सुनाया करती थीं. उनके आस-पास ही चार-पांच बच्चे अपनी मुट्ठियों में फूल दबाए कहानी समाप्त होने पर गौरों पर चढ़ाने के लिए उत्सुक-से बैठ जाते थे. आटे का सुन्दर-सा चौक पुरा होता, उसी चौक पर मिट्टी की छह गौरें रखी जातीं, जिनमें से ऊपर वाली के बिन्दिया और सिन्दूर लगता, बाकी पांचों नीचे दबी पूजा ग्रहण करती रहतीं. एक ओर दीपक की बाती स्थिर-सी जलती रहती और मंगल-घट रखा रहता, जिस पर रोली से सथिया बनाया जाता. सभी बैठे बच्चों के मुख पर फूल चढ़ाने की उतावली की जगह कहानी सुनने की सहज स्थिरता उभर आती.

'एक राजा निरबंसिया थे,' मां सुनाया करती थीं, 'उनके राज में बड़ी खुशहाली थी. सब वरण के लोग अपना-अपना काम-काज देखते थे. कोई दुखी नहीं दिखाई पड़ता था. राजा के एक लक्ष्मी-सी रानी थी, चंद्रमा-सी सुन्दर और औ़र राजा को बहुत प्यारी. राजा राजकाज देखते और सुख से रानी के महल में रहते.'

मेरे सामने मेरे ख्यालों का राजा था, राजा जगपती! तब जगपती से मेरी दांत-काटी दोस्ती थी, दोनों मिडिल स्कूल में पढ़ने जाते. दोनों एक-से घर के थे, इसलिए बराबरी की निभती थी.

मैं मैट्रिक पास करके एक स्कूल में नौकर हो गया और जगपती कस्बे के ही वकील के यहां मुहर्रिर. जिस साल जगपती मुहर्रिर हुआ, उसी वर्ष पास के गाँव में उसकी शादी हुई, पर ऐसी हुई कि लोगों ने तमाशा बना देना चाहा. लड़कीवालों का कुछ विश्वास था कि शादी के बाद लड़की की विदा नहीं होगी.

ब्याह हो जाएगा और सातवीं भांवर तब पड़ेगी, जब पहली विदा की सायत होगी और तभी लड़की अपनी ससुराल जाएगी. जगपती की पत्नी थोड़ी-बहुत पढ़ी-लिखी थी, पर घर की लीक को कौन मेटे! बारात बिना बहू के वापस आ गई और लड़केवालों ने तय कर लिया कि अब जगपती की शादी कहीं और कर दी जाएगी, चाहें कानी-लूली से हो, पर वह लड़की अब घर में नहीं आएगी. लेकिन साल खतम होते-होते सब ठीक-ठाक हो गया. लड़कीवालों ने माफी माँग ली और जगपती की पत्नी अपनी ससुराल आ गई.

जगपती को जैसे सब कुछ मिल गया और सास ने बहू की बलाइयाँ लेकर घर की सब चाबियाँ सौंप दीं, गृहस्थी का ढंग-बार समझा दिया. जगपती की माँ न जाने कब से आस लगाए बैठीं थीं. उन्होंने आराम की साँस ली. पूजा-पाठ में समय कटने लगा, दोपहरियाँ दूसरे घरों के आँगन में बीतने लगीं. पर साँस का रोग था उन्हें, सो एक दिन उन्होंने अपनी अन्तिम घड़ियाँ गिनते हुए चंदा को पास बुलाकर समझाया था - 'बेटा, जगपती बड़े लाड़-प्यार का पला है. जब से तुम्हारे ससुर नहीं रहे तब से इसके छोटे-छोटे हठ को पूरा करती रही हूँ अब तुम ध्यान रखना.' फिर रुककर उन्होंने कहा था, 'जगपती किसी लायक हुआ है, तो रिश्तेदारों की आँखों में करकने लगा है. तुम्हारे बाप ने ब्याह के वक्त नादानी की, जो तुम्हें विदा नहीं किया. मेरे दुश्मन देवर-जेठों को मौका मिल गया. तूमार खड़ा कर दिया कि अब विदा करवाना नाक कटवाना है. जगपती का ब्याह क्या हुआ, उन लोगों की छाती पर साँप लोट गया. सोचा, घर की इज्जत रखने की आड़ लेकर रंग में भंग कर दें. अब बेटा, इस घर की लाज तुम्हारी लाज है. आज को तुम्हारे ससुर होते, तो भला...' कहते कहते माँ की आँखों में आँसू आ गए, और वे जगपती की देखभाल उसे सौंपकर सदा के लिए मौन हो गई थीं.

एक अरमान उनके साथ ही चला गया कि जगपती की सन्तान को, चार बरस इन्तज़ार करने के बाद भी वे गोद में न खिला पाईं. और चंदा ने मन में सब्र कर लिया था, यही सोचकर कि कुल-देवता का अंश तो उसे जीवन-भर पूजने को मिल गया था. घर में चारों तरफ जैसे उदारता बिखरी रहती, अपनापा बरसता रहता. उसे लगता, जैसे घर की अँधेरी, एकान्त कोठरियों में यह शान्त शीतलता है जो उसे भरमा लेती है. घर की सब कुंडियों की खनक उसके कानों में बस गई थी, हर दरवाजे की चरमराहट पहचान बन गई थी.

'एक रोज राजा आखेट को गए,' माँ सुनाती थीं, 'राजा आखेट को जाते थे, तो सातवें रोज जरूर महल में लौट आते थे. पर उस दफा जब गए, तो सातवाँ दिन निकल गया, पर राजा नहीं लौटे. रानी को बड़ी चिन्ता हुई. रानी एक मंत्री को साथ लेकर खोज में निकलीं.'

और इसी बीच जगपती को रिश्तेदारी की एक शादी में जाना पड़ा. उसके दूर रिश्ते के भाई दयाराम की शादी थी. कह गया था कि दसवें दिन जरूर वापस आ जाएगा. पर छठे दिन ही खबर मिली कि बारात घर लौटने पर दयाराम के घर डाका पड़ गया. किसी मुखबिर ने सारी खबरें पहुँचा दी थीं कि लड़कीवालों ने दयाराम का घर सोने-चाँदी से पाट दिया है आखिर पुश्तैनी जमींदार की इकलौती लड़की थी. घर आए मेहमान लगभग विदा हो चुके थे. दूसरे रोज जगपती भी चलनेवाला था, पर उसी रात डाका पड़ा. जवान आदमी, भला खून मानता है! डाकेवालों ने जब बन्दूकें चलाई, तो सबकी घिग्घी बँध गई. पर जगपती और दयाराम ने छाती ठोककर लाठियाँ उठा लीं. घर में कोहराम मच गया. फिर सन्नाटा छा गया. डाकेवाले बराबर गोलियाँ दाग रहे थे. बाहर का दरवाजा टूट चुका था. पर जगपती ने हिम्मत बढ़ाते हुए हाँक लगाई, 'ये हवाई बन्दूकें इन तेल-पिलाई लाठियों का मुकाबला नहीं कर पाएँगी, जवानो.'

पर दरवाजे तड़-तड़ टूटते रहे, और अन्त में एक गोली जगपती की जाँघ को पार करती निकल गई, दूसरी उसकी जाँघ के ऊपर कूल्हे में समा कर रह गई.

चंदा रोती-कलपती और मनौतियाँ मानती जब वहाँ पहुँची, तो जगपती अस्पताल में था. दयाराम के थोड़ी चोट आई थी. उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी. जगपती की देखभाल के लिए वहीं अस्पताल में मरीजों के रिश्तेदारों के लिए जो कोठरियाँ बनीं थीं, उन्हीं में चंदा को रुकना पड़ा. कस्बे के अस्पताल से दयाराम का गाँव चार कोस पड़ता था. दूसरे-तीसरे वहाँ से आदमी आते-जाते रहते, जिस सामान की जरूरत होती, पहुँचा जाते.

पर धीरे-धीरे उन लोगों ने भी खबर लेना छोड़ दिया. एक दिन में ठीक होनेवाला घाव तो था नहीं. जाँघ की हड्डी चटख गई थी और कूल्हे में ऑपरेशन से छ: इंच गहरा घाव था.

कस्बे का अस्पताल था. कंपाउंडर ही मरीजों की देखभाल रखते. बड़ा डॉक्टर तो नाम के लिए था या कस्बे के बड़े आदमियों के लिए. छोटे लोगों के लिए तो कम्पोटर साहब ही ईश्वर के अवतार थे. मरीजों की देखभाल करनेवाले रिश्तेदारों की खाने-पीने की मुश्किलों से लेकर मरीज की नब्ज़ तक सँभालते थे. छोटी-सी इमारत में अस्पताल आबाद था. रोगियों की सिर्फ छ:-सात खाटें थी. मरीजों के कमरे से लगा दवा बनाने का कमरा था, उसी में एक ओर एक आरामकुर्सी थी और एक नीची-सी मेज. उसी कुर्सी पर बड़ा डॉक्टर आकर कभी-कभार बैठता था, नहीं तो बचनसिंह कंपाउंडर ही जमे रहते. अस्पताल में या तो फौजदारी के शहीद आते या गिर-गिरा के हाथ-पैर तोड़ लेनेवाले एक-आध लोग. छठे-छमासे कोई औरत दिख गई तो दीख गई, जैसे उन्हें कभी रोग घेरता ही नहीं था. कभी कोई बीमार पड़ती तो घरवाले हाल बताके आठ-दस रोज की दवा एक साथ ले जाते और फिर उसके जीने-मरने की खबर तक न मिलती.

उस दिन बचनसिंह जगपती के घाव की पट्टी बदलने आया. उसके आने में और पट्टी खोलने में कुछ ऐसी लापरवाही थी, जैसे गलत बँधी पगड़ी को ठीक से बाँधने के लिए खोल रहा हो. चंदा उसकी कुर्सी के पास ही साँस रोके खड़ी थी. वह और रोगियों से बात करता जा रहा था. इधर मिनट-भर को देखता, फिर जैसे अभ्यस्त-से उसके हाथ अपना काम करने लगते. पट्टी एक जगह खून से चिपक गई थी, जगपती बुरी तरह कराह उठा. चंदा के मुँह से चीख निकल गई. बचनसिंह ने सतर्क होकर देखा तो चंदा मुख में धोती का पल्ला खोंसे अपनी भयातुर आवाज दबाने की चेष्टा कर रही थी. जगपती एकबारगी मछली-सा तड़पकर रह गया. बचनसिंह की उँगलियाँ थोड़ी-सी थरथराई कि उसकी बाँह पर टप-से चंदा का आँसू चू पड़ा.

बचनसिंह सिहर-सा गया और उसके हाथों की अभ्यस्त निठुराई को जैसे किसी मानवीय कोमलता ने धीरे-से छू दिया. आहों, कराहों, दर्द-भरी चीखों और चटखते शरीर के जिस वातावरण में रहते हुए भी वह बिल्कुल अलग रहता था, फोड़ों को पके आम-सा दबा देता था, खाल को आलू-सा छील देता था उसके मन से जिस दर्द का अहसास उठ गया था, वह उसे आज फिर हुआ और वह बच्चे की तरह फूँक-फूँककर पट्टी को नम करके खोलने लगा. चंदा की ओर धीरे-से निगाह उठाकर देखते हुए फुसफुसाया, 'च्...च्... रोगी की हिम्मत टूट जाती है ऐसे.'

पर जैसे यह कहते-कहते उसका मन खुद अपनी बात से उचट गया. यह बेपरवाही तो चीख और कराहों की एकरसता से उसे मिली थी, रोगी की हिम्मत बढ़ाने की कर्तव्यनिष्ठा से नहीं. जब तक वह घाव की मरहम-पट्टी करता रहा, तब तक किन्हीं दो आँखों की करूणा उसे घेरे रही.

और हाथ धोते समय वह चंदा की उन चूड़ियों से भरी कलाइयों को बेझिझक देखता रहा, जो अपनी खुशी उससे माँग रही थीं. चंदा पानी डालती जा रही थी और बचनसिंह हाथ धोते-धोते उसकी कलाइयों, हथेलियों और पैरों को देखता जा रहा था. दवाखाने की ओर जाते हुए उसने चंदा को हाथ के इशारे से बुलाकर कहा, 'दिल छोटा मत करना जाँघ का घाव तो दस रोज में भर जाएगा, कूल्हे का घाव कुछ दिन जरूर लेगा. अच्छी से अच्छी दवाई दूँगा. दवाइयाँ तो ऐसी हैं कि मुर्दे को चंगा कर दें. पर हमारे अस्पताल में नहीं आतीं, फिर भी.' 'तो किसी दूसरे अस्पताल से नहीं आ सकतीं वो दवाइयाँ?' चंदा ने पूछा.

'आ तो सकती हैं, पर मरीज को अपना पैसा खरचना पड़ता है उनमें.' बचनसिंह ने कहा.

चंदा चुप रह गई तो बचनसिंह के मुँह से अनायास ही निकल पड़ा, 'किसी चीज की जरूरत हो तो मुझे बताना. रही दवाइयाँ, सो कहीं न कहीं से इन्तजाम करके ला दूँगा. महकमे से मँगाएँगे, तो आते-अवाते महीनों लग जाएँगे. शहर के डॉक्टर से मँगवा दूँगा. ताकत की दवाइयों की बड़ी जरूरत है उन्हें. अच्छा, देखा जाएगा.' कहते-कहते वह रुक गया.

चंदा से कृतज्ञता भरी नजरों से उसे देखा और उसे लगा जैसे आँधी में उड़ते पत्ते को कोई अटकाव मिल गया हो. आकर वह जगपती की खाट से लगकर बैठ गई. उसकी हथेली लेकर वह सहलाती रही. नाखूनों को अपने पोरों से दबाती रही.

धीरे-धीरे बाहर अँधेरा बढ़ चला. बचनसिंह तेल की एक लालटेन लाकर मरीज़ों के कमरे के एक कोने में रख गया. चंदा ने जगपती की कलाई दाबते-दाबते धीरे से कहा, 'कंपाउंडर साहब कह रहे थे.' और इतना कहकर वह जगपती का ध्यान आकृष्ट करने के लिए चुप हो गई. 'क्या कह रहे थे?' जगपती अनमने स्वर में बोला.

'कुछ ताकत की दवाइयाँ तुम्हारे लिए जरूरी हैं!'
'मैं जानता हूँ.'
'पर.'
'देखो चंदा, चादर के बराबर ही पैर फैलाए जा सकते हैं. हमारी औकात इन दवाइयों की नहीं है.
'औकात आदमी की देखी जाती है कि पैसे की, तुम तो.'
'देखा जाएगा.'
'कंपाउंडर साहब इन्तजाम कर देंगे, उनसे कहूँगी मैं.'
'नहीं चंदा, उधारखाते से मेरा इलाज नहीं होगा च़ाहे एक के चार दिन लग जाएँ.'
'इसमें तो.'
'तुम नहीं जानतीं, कर्ज कोढ़ का रोग होता है, एक बार लगने से तन तो गलता ही है, मन भी रोगी हो जाता है.'
'लेकिन ...' कहते-कहते वह रुक गई.
जगपती अपनी बात की टेक रखने के लिए दूसरी ओर मुँह घुमाकर लेटा रहा.

और तीसरे रोज जगपती के सिरहाने कई ताकत की दवाइयाँ रखी थीं, और चंदा की ठहरने वाली कोठरी में उसके लेटने के लिए एक खाट भी पहुँच गई थी. चंदा जब आई, तो जगपती के चेहरे पर मानसिक पीड़ा की असंख्य रेखाएँ उभरी थीं, जैसे वह अपनी बीमारी से लड़ने के अलावा स्वयं अपनी आत्मा से भी लड़ रहा हो चंदा की नादानी और स्नेह से भी उलझ रहा हो और सबसे ऊपर सहायता करनेवाले की दया से जूझ रहा हो.

चंदा ने देखा तो यह सब सह न पाई. उसके जी में आया कि कह दे, क्या आज तक तुमने कभी किसी से उधार पैसे नहीं लिए? पर वह तो खुद तुमने लिए थे और तुम्हें मेरे सामने स्वीकार नहीं करना पड़ा था. इसीलिए लेते झिझक नहीं लगी, पर आज मेरे सामने उसे स्वीकार करते तुम्हारा झूठा पौरूष तिलमिलाकर जाग पड़ा है. पर जगपती के मुख पर बिखरी हुई पीड़ा में जिस आदर्श की गहराई थी, वह चंदा के मन में चोर की तरह घुस गई, और बड़ी स्वाभाविकता से उसने माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, 'ये दवाइयाँ किसी की मेहरबानी नहीं हैं. मैंने हाथ का कड़ा बेचने को दे दिया था, उसी में आई हैं.'

'मुझसे पूछा तक नहीं और...' जगपती ने कहा और जैसे खुद मन की कमजोरी को दाब गया - कड़ा बेचने से तो अच्छा था कि बचनसिंह की दया ही ओढ़ ली जाती. और उसे हल्का-सा पछतावा भी था कि नाहक वह रौ में बड़ी-बड़ी बातें कह जाता है, ज्ञानियों की तरह सीख दे देता है.

और जब चंदा अँधेरा होते उठकर अपनी कोठरी में सोने के लिए जाने को हुई, तो कहते-कहते यह बात दबा गई कि बचनसिंह ने उसके लिए एक खाट का इन्तजाम भी कर दिया है. कमरे से निकली, तो सीधी कोठरी में गई और हाथ का कड़ा लेकर सीधे दवाखाने की ओर चली गई, जहाँ बचनसिंह अकेला डॉक्टर की कुर्सी पर आराम से टाँगें फैलाए लैम्प की पीली रोशनी में लेटा था. जगपती का व्यवहार चंदा को लग गया था, और यह भी कि वह क्यों बचनसिंह का अहसान अभी से लाद ले, पति के लिए जेवर की कितनी औकात है. वह बेधड़क-सी दवाखाने में घुस गई. दिन की पहचान के कारण उसे कमरे की मेज-कुर्सी और दवाओं की अलमारी की स्थिति का अनुमान था, वैसे कमरा अँधेरा ही पड़ा था, क्योंकि लैम्प की रोशनी केवल अपने वृत्त में अधिक प्रकाशवान होकर कोनों के अंधेरे को और भी घनीभूत कर रही थी. बचनसिंह ने चंदा को घुसते ही पहचान लिया. वह उठकर खड़ा हो गया. चंदा ने भीतर कदम तो रख दिया, पर सहसा सहम गई, जैसे वह किसी अंधेरे कुएँ में अपने-आप कूद पड़ी हो, ऐसा कुआँ, जो निरन्तर पतला होता गया है और जिसमें पानी की गहराई पाताल की पर्तों तक चली गई हो, जिसमें पड़कर वह नीचे धँसती चली जा रही हो, नीचे अँधेरा एकाँत घुटन पाप!

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