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वसीम बरेलवी: मैं अपने ख़्वाब से बिछड़ा नज़र नहीं आता...

उर्दू के मशहूर शायर वसीम बरेलवी अपनी शायरी के माध्यम से भारत के लाखों लोगों के दिलों पर राज करते हैं. उन्होंने उर्दू अदब का उपयोग अपनी शायरी में बड़ी ही खूबसूरती से किया है. आज के दौर में उनका महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि कोई भी मुशायरा उनकी शायरी के बगैर पूरा नहीं होता.

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aajtak.in [Edited By: स्नेहा]नई दिल्ली, 03 March 2015
वसीम बरेलवी: मैं अपने ख़्वाब से बिछड़ा नज़र नहीं आता... Wasim Barelvi

उर्दू के मशहूर शायर वसीम बरेलवी अपनी शायरी के माध्यम से भारत के लाखों लोगों के दिलों पर राज करते हैं. उन्होंने उर्दू अदब का उपयोग अपनी शायरी में बड़ी ही खूबसूरती से किया है. आज के दौर में उनका महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि कोई भी मुशायरा उनकी शायरी के बगैर पूरा नहीं होता.

प्रोफेसर वसीम बरेलवी का जन्म 18 फरवरी 1940 को बरेली में हुआ. इन्हें इनकी शायरी के लिए फिराक इंटरनेशनल अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है. फिलहाल ये रुहेलखंड विश्वविद्यालय में उर्दू विभाग में प्रोफेसर हैं और इसके साथ ही नेशनल काउंसिल फॉर प्रोमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज के वाइस चेयरमैन हैं.

उनकी कुछ लोकप्रिय गजलें.....

1. तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते

मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है
ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते

जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का
उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते

ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना
बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते

बिसाते-इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता
यह और बात कि बचने के घर नहीं आते

वसीम जहन बनाते हैं तो वही अख़बार
जो लेके एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते

2. कहाँ तक आँख रोएगी कहाँ तक किसका ग़म होगा
मेरे जैसा यहाँ कोई न कोई रोज़ कम होगा

तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना रो चुका हूँ मैं
कि तू मिल भी अगर जाये तो अब मिलने का ग़म होगा

समन्दर की ग़लतफ़हमी से कोई पूछ तो लेता ,
ज़मीं का हौसला क्या ऐसे तूफ़ानों से कम होगा

मोहब्बत नापने का कोई पैमाना नहीं होता ,
कहीं तू बढ़ भी सकता है, कहीं तू मुझ से कम होगा

3. हुस्न बाज़ार हुआ क्या कि हुनर ख़त्म हुआ
आया पलको पे तो आँसू का सफ़र ख़त्म हुआ

उम्र भर तुझसे बिछड़ने की कसक ही न गयी ,
कौन कहता है की मुहब्बत का असर ख़त्म हुआ

नयी कालोनी में बच्चों की ज़िदे ले तो गईं ,
बाप दादा का बनाया हुआ घर ख़त्म हुआ

जा, हमेशा को मुझे छोड़ के जाने वाले ,
तुझ से हर लम्हा बिछड़ने का तो डर ख़त्म हुआ

4. कितना दुश्वार है दुनिया ये हुनर आना भी
तुझी से फ़ासला रखना तुझे अपनाना भी

ऐसे रिश्ते का भरम रखना बहुत मुश्किल है
तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी

5. अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आयें कैसे

घर सजाने का तस्सवुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तय हो कि इस घर को बचायें कैसे

क़हक़हा आँख का बर्ताव बदल देता है
हँसने वाले तुझे आँसू नज़र आयें कैसे

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा
एक क़तरे को समुन्दर नज़र आयें कैसे

साभार: कविता कोष

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