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आप तो हमको छल गए साहिब, इतनी जल्दी बदल गए साहिब?

वर्तमान राजनीति नित नए खेल दिखा रही है. चुनाव से पहले बड़े-बड़े बदलावों का दावा ठोका जा रहा था. अब वही राजनेता, अपने वादों से मुकरने लगे हैं. इन सब विषयों को समेट कर जाने-माने ग़ज़लकार आलोक श्रीवास्तव ने अपने तेवर से अलग, दो बहुत प्रासंगिक ग़ज़लें कहीं हैं.

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aajtak.in [Edited By: कुलदीप मिश्र]नई दिल्ली, 22 April 2015
आप तो हमको छल गए साहिब, इतनी जल्दी बदल गए साहिब?

वर्तमान राजनीति नित नए खेल दिखा रही है. चुनाव से पहले बड़े-बड़े बदलावों का दावा ठोका जा रहा था. अब वही राजनेता, अपने वादों से मुकरने लगे हैं. कोई 100 फीसदी से महज़ 40-50 फीसदी काम ही पूरे कर पाने पर आ गया है तो किसी ने अब तक बातों और वादों में ही उलझा रखा है.

इन सब विषयों को समेट कर जाने-माने ग़ज़लकार आलोक श्रीवास्तव ने अपने तेवर से अलग, दो बहुत प्रासंगिक ग़ज़लें कहीं हैं, जिन्हें हम यहां दे रहे हैं.

(1)

तू जब राह से भटकेगा, मैं बोलूंगा
मुझको कुछ भी खटकेगा, मैं बोलूंगा

सच का लहजा थोड़ा टेढ़ा होता है,
तू कहने में अटकेगा, मैं बोलूंगा

अवसरवादी साथी-सा व्यवहार न कर,
हाथ अगर तू झटकेगा, मैं बोलूंगा

विश्वासों का शीशा नाज़ुक होता है,
ये शीशा जब चटकेगा, मैं बोलूंगा

मीठे-मीठे वादों के सब बाग़ दिखा,
वादों से जब भटकेगा, मैं बोलूंगा

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(2)

आप सत्ता में ढल गए साहिब,
इतनी जल्दी बदल गए साहिब

वादे आधे पे आ गिरे धम से,
आप तो हमको छल गए साहिब

हाथ में हाथ थाम कर चलते,
हाथ से क्यूं निकल गए साहिब ?

ये तो 'बाज़ार' का करम था, जो-
खोटे सिक्के भी चल गए साहिब

आप को तो समय बदलना था,
आप ख़ुद ही बदल गए साहिब

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