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शायरी के ख़ुदा मीर की तीन ग़ज़लें

उर्दू के सर्वकालिक महान शायरों में शुमार मीर तकी मीर आज ही के दिन इस दुनिया-ए-फानी से कूच कर गए थे. मीर को शायरी का ख़ुदा कहा जाता है. कहते हैं ग़ालिब ने जब एक फकीर से मीर की एक नज्म सुनी तो उनके मुंह से बेसाख्ता निकला, 'रेख्ते के तुम ही नहीं हो उस्ताद ग़ालिब, कहते हैं पिछले ज़माने में कोई मीर भी था.' इन्हीं ख़ुदा-ए-सुख़न मीर की तीन नज्में.

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aajtak.in [Edited By: आदर्श शुक्ला]नई दिल्ली, 21 September 2015
शायरी के ख़ुदा मीर की तीन ग़ज़लें Mir Taqi mir

उर्दू के सर्वकालिक महान शायरों में शुमार मीर तकी मीर 20 सितंबर को ही इस दुनिया-ए-फानी से कूच कर गए थे. मीर को शायरी का ख़ुदा कहा जाता है. कहते हैं ग़ालिब ने जब एक फकीर से मीर की एक नज्म सुनी तो उनके मुंह से बेसाख्ता निकला, 'रेख्ते के तुम ही नहीं हो उस्ताद ग़ालिब, कहते हैं पिछले ज़माने में कोई मीर भी था.' इन्हीं ख़ुदा-ए-सुख़न मीर की तीन नज्में.

1.
यारो मुझे मु'आफ़ रखो मैं नशे में हूं
अब दो तो जाम खाली ही दो मैं नशे में हूं

माज़ूर हूं जो पाओं मेरा बेतरह पड़े
तुम सर-गरां तो मुझ से न हो मैं नशे में हूं

या हाथों हाथ लो मुझे मानिंद-ए-जाम-ए-मय
या थोड़ी दूर साथ चलो मैं नशे में हूं

मस्ती से दरहमी है मेरी गुफ्तगू के बीच
जो चाहो तुम भी मुझको को कहो में नशे में हूं

नाजुक मिजाज आप क़यामत है मीर जी
ज्यों शीशा मेरे मुंह न लगो में नशे में हूं

2.
पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है

आगे उस मुतक़ब्बर के हम ख़ुदा ख़ुदा किया करते हैं
कब मौजूद ख़ुदा को वो मग़रूर ख़ुद-आरा जाने है

आशिक़ सा तो सादा कोई और न होगा दुनिया में
जी के ज़िआं को इश्क़ में उस के अपना वारा जाने है

चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
वर्ना दिलबर-ए-नादां भी इस दर्द का चारा जाने है

क्या क्या फ़ितने सर पर उसके लाता है माशूक़ अपना
जिस बेदिल बेताब-ओ-तवाँ को इश्क़ का मारा जाने है

आशिक़ तो मुर्दा है हमेशा जी उठता है देखे उसे
यार के आ जाने को यकायक उम्र दो बारा जाने है

3.
देख तो दिल कि जां से उठता है
ये धुआं सा कहां से उठता है

गोर किस दिल-जले की है ये फलक
शोला इक सुबह यां से उठता है

नाला सर खेंचता है जब मेरा
शोर एक आसमान से उठता है

लड़ती है उस की चश्म-ऐ-शोख जहां
इक आशोब वां से उठता है

सुध ले घर की भी शोला-ऐ-आवाज़
दूद कुछ आशियां से उठता है

बैठने कौन दे है फिर उस को
जो तेरे आस्तां से उठता है

यूं उठे आह उस गली से हम
जैसे कोई जहां से उठता है

इश्क इक 'मीर' भारी पत्थर है
बोझ कब नातावां से उठता है

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