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आदिवासी समाज की भूली दास्तां 'माटी माटी अरकाटी'

कोंता और कुंती की इस कहानी को कहने के पीछे लेखक का उद्देश्य पूरब और पश्चिम दोनों के गैर-आदिवासी समाजों में मौजूद नस्लीय और ब्राह्मणवादी चरित्र को उजागर करना है, जिसे विकसित सभ्यताओं की बौद्धिक दार्शनिकता के जरिए अनदेखा किया जाता रहा है.
आदिवासी समाज की भूली दास्तां 'माटी माटी अरकाटी' गिरमिटिया मजदूरों की कहानी कहती है ये किताब
संतोष कुमारनई दिल्ली, 10 June 2016

जब भी गिरमिटिया मजदूरों की बात होती है, हमारे सामने ऐसे किसी मजदूर की जो छवि उभरती है वह भोजपुरी समाज का होता है. अभी तक जो भी बहुचर्चित साहित्यिक लेखन सामने आए हैं, उनमें भोजपुरिया गिरमिटियों के बारे में ही खास तौर पर बात हुई है, लेकिन जो झारखंडी आदिवासी मजदूर बाहर गए, जिनको हिल कुली कहा गया, उनके बारे में कहां बात होती है? वे कहां और क्यों खो गए हमारी चिंता और चर्चा से? सोचने की बात तो है.

हिल कुली कोंता की कहानी पढ़िए अब 'माटी माटी अरकाटी' उपन्यास में, जिसे अश्विनी कुमार पंकज ने गहरी छानबीन के बाद काफी दिलचस्प तरीके से लिखा है. यह उपन्यास आदिवासी समाज के इतिहास के भूले-बिसरे संदर्भों को नए सिरे से सामने ला रहा है. राधाकृष्ण प्रकाशन से पेपरबैक संस्करण में प्रकाशित इस किताब की कीमत 250 रुपये है. फिलहाल इस किताब की अमेजन पर प्री-बुकिंग शुरू हो चुकी है और 10 जून से अमेजन इसे पाठकों तक पहुंचना शुरू कर देगा.

कोंता और कुंती की इस कहानी को कहने के पीछे लेखक का उद्देश्य पूरब और पश्चिम दोनों के गैर-आदिवासी समाजों में मौजूद नस्लीय और ब्राह्मणवादी चरित्र को उजागर करना है, जिसे विकसित सभ्यताओं की बौद्धिक दार्शनिकता के जरिए अनदेखा किया जाता रहा है. कालांतर में मॉरीशस, गयाना, फिजी, सूरीनाम, टुबैगो सहित अन्य कैरीबियन और लैटिन अमेरिकी और अफ्रीकी देशों में लगभग डेढ़ सदी पहले ले जाए गए गैर-आदिवासी गिरमिटिया मज़दूरों ने बेशक लम्बे संघर्ष के बाद इन देशों को भोजपुरी बना दिया है.

 

सवाल है कि वे हजारों झारखंडी जो सबसे पहले वहां पहुंचे थे, वे कहां चले गए? कैसे और कब वे गिरमिटिया कुलियों की नवनिर्मित भोजपुरी दुनिया से गायब हो गए? ऐसा क्यों हुआ कि गिरमिटिया कुली खुद तो आजादी पा गए, लेकिन उनकी आजादी हिल कुलियों को चुपचाप गड़प कर गई. एक कुली की आजादी कैसे दूसरे कुली के खात्मे का सबब बनी? क्या थोड़े आर्थिक संसाधन जुटते ही उनमें बहुसंख्यक धार्मिक और नस्ली वर्चस्व का विषधर दोबारा जाग गया?

लेखक के बारे में

अश्विनी कुमार पंकज का जन्म 1964 में हुआ. इन्होंने रांची विश्वविद्यालय, रांची से आर्ट्स में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. पिछले तीन दशकों से वह रंगकर्म, कविता-कहानी, आलोचना, पत्रकारिता और डॉक्यूमेंट्री से गहरी यारी. इन्होंने अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों—प्रिंट, ऑडियो, विजुअल, ग्राफिक्स, परफॉरमेंस और वेब में रचनात्मक उपस्थिति दर्ज कराई है. अश्विनी कुमार ने नब्बे के शुरुआती दशक में जन संस्कृति मंच और उलगुलान संगीत नाट्य दल, रांची के संस्थापक संगठक सदस्य रहे.

किताब का नाम: माटी माटी अरकाटी

लेखक: अश्विनी कुमार पंकज

प्रकाशन: राधाकृष्ण

बाउंड: पेपरबैक

कीमत: 250/- रुपये

आईएसबीएन: 978-81-8361-802-1

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