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बाकर गंज के सैयद: अनदेखे को दिखाने की दिलफरेब कोशिश

युवा मन की आंखों में छोटे मगर बड़े ही हसीन सपने होते हैं. ये सपने ही हैं जो उन्हें हर हालात से लड़ने की ताकत दे देते हैं. ये बात शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि नौजवान आंखों में पनाह पाने वाले सपने उन लफ्जों के जरिए सांस लेते हैं, जिन्हें हम किसी जि‍ल्द में समेटकर किताब की तह में जमा कर देते हैं.

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aajtak.in [Edited By: रोहित गुप्ता]नई दिल्ली, 16 October 2015
बाकर गंज के सैयद: अनदेखे को दिखाने की दिलफरेब कोशिश Baqar ganj ke Syed

युवा मन की आंखों में छोटे मगर बड़े ही हसीन सपने होते हैं. ये सपने ही हैं जो उन्हें हर हालात से लड़ने की ताकत दे देते हैं. ये बात शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि नौजवान आंखों में पनाह पाने वाले सपने उन लफ्जों के जरिए सांस लेते हैं, जिन्हें हम किसी जि‍ल्द में समेटकर किताब की तह में जमा कर देते हैं. लेकिन वो शब्द जैसे ही दबे हुए पन्नों से निकलकर किसी रोशन निगाहों से रू-ब-रू होते हैं तो जिंदा हो जाते हैं, जिसे हम सभी जवानी के नाम से जानते हैं.

ऐसे ही जिंदा ख्यालों के साथ हिन्दी के जाने-माने लेखक डॉक्टर असगर वजाहत बुधवार की दोपहर दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में सैकड़ों छात्र छात्राओं से रू-ब-रू हुए. बुधवार को डॉ. असगर वजाहत की पुस्तक 'बाकर गंज के सैयद' का लोकार्पण हुआ. हिन्दी के जाने माने प्रकाशक राजपाल एंड संस ने डॉक्टर असगर वजाहत की इस पुस्तक को प्रकाशित किया है. इतना ही नहीं, प्रकाशक ने दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र छात्राओं को डॉक्टर वजाहत से रू-ब-रू करवाने के लिए उनकी चार पुस्तकों के विमोचन का कार्यक्रम रखा है, जिसका पहला पड़ाव बुधवार को मिरांडा हाउस में आयोजित किया गया.

भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में न जाने कितनी ऐसी गौरव गाथाएं हैं, जिनके बारे में सोच कर गर्व होता है. कौमी तराने ‘सारे जहां से अच्छा’ में इकबाल ने लिखा था, ‘ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! वो दिन है याद तुझको. उतरा तेरे किनारे, जब कारवां हमारा.’ माना जाता है कि डॉक्टर असगर वजाहत भी उसी सिलसिले को आगे बढ़ा रहे हैं जो ऐसे ही किसी कारवां की तलाश में जुटे हैं जिसने कभी हिन्दुस्तान की सरजमी पर कदम रखा और यहां की गंगा-जमनी तहज़ीब में आकर उसी में समा गया. बाकर गंज के सैयद इस तलाश का एक पड़ाव है.

इस पुस्तक को इतिहास कहा जाए या फिर यात्रा वर्णन? उपन्यास कहा जाए या एक संस्मरण? इस किस्से को रिपोर्ताज कहें या फिर ऐतिहासिक रिपोर्टिंग? किसी एक दायरे में शामिल होकर भी ये पुस्तक उसके बाहर खड़ी नज़र आती है. वजाहत इस अनोखी यात्रा में पाठकों को अवध के भूले-बिसरे गांवों की सैर करवाते नजर आते हैं और शब्दों की भूल-भुलैया में कोई रास्ता भटक न जाए इसके लिए उन्होंने इतिहास की उंगली थाम रखी है. इस पुस्तक में इतिहास साथ साथ चलता महसूस होता है और उर्दू-फारसी का ज्ञान किसी लंबी यात्रा के दौरान मिली ठंडी छांव सा सुकून देती है. मगर ये डॉक्टर असगर वजाहत की ही कलम का कमाल है जिसे उन्होंने इतने सहज अंदाज में प्रस्तुत किया है.

हिन्दी में ऐसी बहुत कम रचनाएं हैं जिनमें इतिहास ने साहित्य की इस तरह गलबहियां की है और सच कहें को ये किसी दानिशमंद का हुनर ही है जिसने इस मेल को इतना रोचक और दिलफरेब बनाया है. यही बात इतिहास की अनजानी-अनदेखी लहरों पर सवार होने का सुखद अहसास देती है. सच तो यह है कि किस्सागोई का ऐसा अंदाज असगर वजाहत का ही देखने को मिला, जिसकी बदौलत अनदेखे को दिखाने का दुर्लभ काम होता नजर आता है.

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