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मूर्खों को 'महाज्ञान', उस्ताद परसाई के खजाने से

मूर्ख दिवस का पावन मौका भला उस शख्स को याद किए बिना कैसे पूरा हो सकता है जो समाज की मूर्खताओं का सबसे बड़ा आईना था. हरिशंकर परसाई के व्यंग्य, व्यवस्था की कान उमेठने का कोई मौका नहीं छोड़ते. मूर्ख दिवस पर परसाई के तीन व्यंग्य पढ़िए और अपनी मूर्खताओं पर हंस सकने का साहस करिए.

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aajtak.in
आदर्श शुक्लानई दिल्ली, 02 April 2015
मूर्खों को 'महाज्ञान', उस्ताद परसाई के खजाने से symbolic image

मूर्ख दिवस का पावन मौका भला उस शख्स को याद किए बिना कैसे पूरा हो सकता है जो समाज की मूर्खताओं का सबसे बड़ा आईना था. हरिशंकर परसाई के व्यंग्य, व्यवस्था की कान उमेठने का कोई मौका नहीं छोड़ते. मूर्ख दिवस पर परसाई के तीन व्यंग्य पढ़िए और अपनी मूर्खताओं पर हंस सकने का साहस करिए.

1.अकाल-उत्सव
दरारों वाली सपाट सूखी भूमि नपुंसक पति की संतानेच्छु पत्नी की तरह बेकल नंगी पड़ी है. अकाल पड़ा है. पास ही एक गाय अकाल के समाचार वाले अखबार को खाकर पेट भर रही है. कोई 'सर्वे वाला' अफसर छोड़ गया होगा. आदमी इस मामले में गाय-बैल से भी गया बीता है. गाय तो इस अखबार को भी खा लेती है, मगर आदमी उस अखबार को भी नहीं खा सकता जिसमें छपा है कि अमेरिका से अनाज के जहाज चल चुके हैं. एक बार मैं खा गया था. एक कॉलम का 6 पंक्तियों का समाचार था. मैंने उसे काटा और पानी के साथ निगल गया. दिन भर भूख नहीं लगी. आजकल अखबारों में आधे पन्नों पर सिर्फ अकाल और भुखमरी के समाचार छपते हैं. अगर अकाल ग्रस्त आदमी सड़क पर पड़ा अखबार उठाकर उतने पन्ने खा ले, तो महीने भर भूख नहीं लगे. पर इस देश का आदमी मूर्ख है. अन्न खाना चाहता है. भुखमरी के समाचार नहीं खाना चाहता.

2.निंदा रस
चेखव की एक कहानी याद आ रही है. एक स्त्री किसी सहेली के पति की निंदा अपने पति से कर रही है. वह बड़ा उचक्का, दगाबाज आदमी है. बेईमानी से पैसा कमाता है. कहती है कि मैं उस सहेली की जगह होती तो ऐसे पति को त्याग देती. तब उसका पति उसके सामने यह रहस्य खोलता है कि वह स्वयं बेईमानी से इतना पैसा कमाता है. सुनकर स्त्री स्तब्ध रह जाती है.क्या उसने पति को त्याग दिया? जी हां, वह दूसरे कमरे में चली गई. कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हममें जो करने की क्षमता नहीं है, वह यदि कोई करता है तो हमारे पिलपिले अहंकार को धक्का लगता है, हममें हीनता और ग्लानी आती है. तब हम उसकी निंदा करके उससे अपने को अच्छा समझकर तुष्ट होते हैं. एक मित्र की मुलाकात के करीब दस-बारह घंटे बाद यह सब मन में आ रहा है. अब कुछ तटस्थ हो गया हूं. सुबह जब उसके साथ बैठा था तब मैं स्वयं निंदा के काला सागर में डूबता उतराता था, कलोल कर रहा था. बड़ा रस है न निंदा में. सूरदास ने इसलिए इसे निंदा सबद रसाल कहा है.

3. बाएं क्यों चलें?
साधो हमारे देश का आदमी नियम मान ही नहीं सकता. वह मुक्त आत्मा है. वह सड़क के बीच चलकर प्राण दे देगा, पर बाएं नहीं चलेगा. मरकर स्वर्ग पहुंचेगा, तो वहां भी सड़क के नियम नहीं मानेगा. फरिश्ते कहेंगे कि बाएं चलो. तो वह दाहिने चलेगा. साधो, आत्मा अमर है. सड़क पर दुर्घटना में सिर्फ देह मरती है, आत्मा थोड़े ही मरती है. इस तुच्छ देह के लिए ज्ञानी इतना अनुशासन क्यों सीखे कि सड़क के बाए बाजू चले. साधो, मैं तो पुलिस का भक्त हूं सो फौरन बाएं बाजू हो जाता हूं. मैं कायर हूं. मगर उन्हें नमन करता हूं, जो सड़क के कोई नियम नहीं मानते.

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