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हिंदी साहित्य को जिंदा करना है तो अमेरिक की इन गलियों से सबक ले भारत

पिछले दिनों पूरे देश में जोर-शोर के साथ हिंदी दिवस मनाया गया. भारतीयों के हिंदी से दूरी बनाने का खूब स्यापा किया गया. हिंदी सम्मेलन भी आयोजित हुआ जिसे शानदार आयोजन बनाने की कोशिश की गई. एक दूसरे की तुष्टि करते लोग नजर आए. राजनीतिक ड्रामा भी खूब हुआ. इन सब के बीच हिंदी तो बेचारी कहीं कोने में छिपी हुई थी और अपने विकास और प्रसार के नाम पर हो रहे इस सालाना समागम को नम आंखों से देख रही थी.

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नरेंद्र सैनी [Edited by: हर्षिता]नई दिल्ली, 25 September 2015
हिंदी साहित्य को जिंदा करना है तो अमेरिक की इन गलियों से सबक ले भारत यहां साइन बोर्ड पर नेता नहीं लेखकों के हैं नाम

पिछले दिनों पूरे देश में जोर-शोर के साथ हिंदी दिवस मनाया गया. भारतीयों के हिंदी से दूरी बनाने का खूब स्यापा किया गया. हिंदी सम्मेलन भी आयोजित हुआ जिसे शानदार आयोजन बनाने की कोशिश की गई. एक दूसरे की तुष्टि करते लोग नजर आए. राजनीतिक ड्रामा भी खूब हुआ. इन सब के बीच हिंदी तो बेचारी कहीं कोने में छिपी हुई थी और अपने विकास और प्रसार के नाम पर हो रहे इस सालाना समागम को नम आंखों से देख रही थी.

थोड़ा आगे बढ़ते हैं. इसी दौरान मैं अमेरिका के कैलिफोर्निया स्टेट के स्टीवेंसन रैंच में छुट्टियां मना रहा था. हसीन वादियों के बीच बसे इस सुव्यवस्थित और साफ-सुथरे शहर की गलियों से रोज गुजरना होता तो एक बात पर नजर गई. जहां हम रहते थे, उस सोसाइटी का नाम था 'द आर्ट्स'. यह शहर के महंगे इलाकों में से एक है. लेकिन मजेदार बात ये थी कि वहां की गलियों और सड़कों के नाम अंग्रेजी लेखकों के नाम पर रखे गए.

बीस दिन तक इन रास्तों से गुजर-गुजरकर मेरे जेहन में दफन कई अंग्रेजी लेखकों के नाम फिर से ताजा हो गए. जैसे वहां की गलियों और सड़कों के नाम जॉन स्टाइनबेक, एडगर एलन पो, अर्नेस्ट हेमिंग्वे, रॉबर्ट ब्राउनिंग और विलियम ब्लेक जैसे कई जाने-माने लेखकों के नाम पर थे. एकदम आसानी से एक इलाके ने मुझे अंग्रेजी साहित्य के दिग्गजों के बारे में फिर से सोचने और पढ़ने के लिए मजबूर कर दिया और इस तरह आसान से तरीके से कभी न भूलने वाला सबक मैंने सीख लिया.

तो क्या हम ऐसा नहीं कर सकते? करोड़ों रुपये आयोजनों पर खर्च करने और हिंदी का रोना रोने की बजाए हम अगर अपने हिंदी के लेखकों के नाम आने वाली पीढ़ी को इस आसान तरीके से याद करा सकें तो कितना अच्छा हो. जरूरी नहीं कि हिंदी या उससे जुड़े लोगों को उनके हलक में उतारा जाए, बल्कि कहीं प्रेमचंद मार्ग हो जाए तो कहीं निर्मल वर्मा पथ और इसी तरह कहीं निराला एवेन्यू तो कहीं मुक्तिबोध चौक. शायद कुछ भी थोपने से अच्छा उससे जोड़ना होता है, और यह हमारी समझ में ना जाने कब आएगा?

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