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नुक्कड़ पर खड़े होकर सत्ता का नाटक दिखाते थे सफ़दर हाशमी

इनके नाटक सिर्फ मन का रंजन ही नहीं करते थे बल्कि मजलूमों पर हो रहे ज़ुल्म की कहानी भी कहते थे. इनकी कला समाज के वंचित और शोषित लोगों को समर्पित थी.
नुक्कड़ पर खड़े होकर सत्ता का नाटक दिखाते थे सफ़दर हाशमी सफ़दर हाशमी
aajtak.in [Edited by: रोहित] 12 April 2018

आज 12 अप्रैल को भारत में स्ट्रीट थियटर डे यानी कि नुक्कड़ नाटक दिवस मनाया जाता है. मनाया इसलिए जाता है क्योंकि आज के ही दिन सफ़दर हाशमी का जन्म हुआ था. भारतीय रंगमंच तबके में सफ़दर हाशमी का नाम बड़े अदब से लिया जाता है. सफ़दर दबे, कुचलों के हक-हुकूक की बात करते थे. इनके नाटक शोषितों और वंचितों की हक़ीक़त कहते थे.

इनके नाटक सिर्फ मन का रंजन ही नहीं करते थे बल्कि मजलूमों पर हो रहे ज़ुल्म की कहानी भी कहते थे. इनकी कला समाज के वंचित और शोषित लोगों को समर्पित थी.

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1 जनवरी को सन 1989 को सफ़दर हाशमी अपनी टोली जन नाट्य मंच के साथ गाज़ियाबाद नुक्कड़ नाटक 'हल्ला बोल' कर रहे थे. तभी कांग्रेस के मुकेश शर्मा की एक रैली निकली. मुकेश शर्मा ने नाटक रोकने के लिए कहा लेकिन नाटक करने वालों का कहना था कि इससे नाटक की लय टूट जाएगी इसलिए या तो वे लोग थोड़ी देर रुक जाएं या फिर दूसरे रास्ते से चले जाएं. बहस हुई और मुकेश शर्मा के लोगों ने नाटक मंडली पर हमला कर दिया. सफ़दर हाशमी को गंभार चोटें आई. 2 जनवरी को सफ़दर हाशमी की मौत हो गई थी.

सफ़दर हाशमी के कुछ मशहूर नाटकों में गांव से शहर तक, हत्यारे और अपहरण भाईचारे का, तीन करोड़, औरत और डीटीसी की धांधली शामिल है. सफ़दर हाशमी ने हबीब तनवीर के साथ मिलकर साल 1988 में दो बेहतरीन नाटक तैयार करने में अपना सहयोग दिया, मक्सिम गोर्की के नाटक पर आधारित 'दुश्मन' और प्रेमचंद की कहानी 'मोटेराम के सत्याग्रह'. यही नहीं उन्होंने बहुत से गीतों, एक टेलीवीजन धारावाहिक, कविताओं, बच्चों के नाटक और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों की रचना में भी की.

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1989 में उस घटना के बाद हर साल जन नाट्य मंच उसी जगह पर मजदूरों के सामने एक नुक्कड़ नाटक का मंचन करता है.  

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