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Book Review: आशावादी दृष्टिकोण की वकालत है 'मुर्दे इतिहास नहीं लिखते'

अलका अग्रवाल का कथा संग्रह 'मुर्दे इतिहास नहीं लिखते' समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है. प्रत्येक कहानी मन को झकझोरती है, उद्देलित करती है और पाठकों का ध्यान आकर्षित करती है.

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aajtak.in
लव रघुवंशी / सईद अंसारी नई दिल्ली, 16 January 2016
Book Review: आशावादी दृष्टिकोण की वकालत है 'मुर्दे इतिहास नहीं लिखते' Review: मुर्दे इतिहास नहीं लिखते

पुस्तक का नाम- मुर्दे इतिहास नहीं लिखते
लेखिका- अलका अग्रवाल
प्रकाशक- यूनिस्टार बुक्स
मूल्य- 295 रुपये

अलका अग्रवाल का कथा संग्रह 'मुर्दे इतिहास नहीं लिखते' समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है. प्रत्येक कहानी मन को झकझोरती है, उद्देलित करती है और पाठकों का ध्यान आकर्षित करती है. हर कथा में कोई ना कोई संदेश है. किसी कहानी में सच्ची मित्रता की जीवन में उपादेयता सिद्ध होती है तो कहीं नाते-रिश्तों का अपनापन है. कहीं समाप्त ना होने वाली आत्मीयता है तो कोई कहानी समाज का आईना दिखाती है तो कहीं जीवन के यथार्थ से दूर केवल और केवल आदर्शवाद है. इस सबके बावजूद कथा संग्रह मन को बांधे रखता है और भविष्य के प्रति आशावादी दृष्टिकोण की वकालत करता है.

यह सच है कि जीवन में हमें ना जाने कितने संघर्षों से जूझना पड़ता है और यही संघर्ष हमें और ज्यादा दृढ़ता प्रदान करता है. हमें सहनशील बनाता है और रिश्तों की गरिमा को समझकर उन्हें बिखरने नहीं देता बल्कि अपनत्व के अहसास से भरपूर उन्हें एक नई ऊर्जा प्रदान करता है. यही है अलका की कहानियों का संदेश और जीवन का सार कि प्रत्येक पाठक कहानी पढ़कर कहीं खो सा जाता है और वह कहानी अलका के कहानी संग्रह की कहानी ना रहकर उस पाठक के जीवन की घटना बन जाती है, साथ ही हर मन पर गहरा असर डालती है. 'मुर्दे इतिहास नहीं लिखते' कहानी प्रेरणाप्रद है और मन को झकझोर कर यह संदेश देती है कि यदि अपना रास्ता हम खुद बनाते हैं तो हममें आत्मविश्वास भी जाग्रत होता है और हमारी अपनी पहचान भी बनती है और यही पहचान हमें भीड़ से अलग करती है.

अलका की कहानियों में सहजता है, जीवन की सच्चाई है इसीलिए कथाओं का प्रवाह रुकता नहीं बल्कि अति सरलता और सहजता से हर कथा आगे बढ़ती है, गहराई से उतरती है ह्दय में. वेदना और फिर जीवन की सच्चाई को स्वीकार कर उससे जूझने और लड़ने का साहस भी अलका की कहानियों से मिलता है. 'टिकुली' कहानी बड़ी मार्मिक है. 'नदी अभी सूखी नहीं' में रिश्तों की सच्चाई है. जाति और धर्म से परे सिर्फ मानवीय संवेदनाएं ही हैं जो हमें एक-दूसरे के लिए जीना और समर्पित होना सिखाती हैं. अलका सोई हुई मानवीय संवेदनाओं को ना केवल अपनी कहानियों के माध्यम से जगाती हैं बल्कि पाठकों को भाव प्रवण भी बनाती हैं.

अलका अग्रवाल के संग्रह की कुछ कहानियों के कथ्य ऐसे हैं कि उनके लिए किसी शब्द वैशिष्ट्य की भी आवश्यकता नहीं बल्कि वह हमारे मन के गवाक्षों में सहजता से प्रविष्ट होकर संवेदनाओं को जगाती हैं. अलका के कथा संग्रह की कहानियां काल्पनिक नहीं बल्कि सत्य कथाओं का सा आभास कराती हैं. प्रतीत होता है कि अलका को प्रयास नहीं करना पड़ा बल्कि अनुभूत घटनाओं ने शब्दों का आकार ग्रहण किया और कथा सृजित होती चली गई.

अपने शिल्प और कथ्य दोनों में ही सभी कथाएं मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं. आशा है कि भविष्य में भी अलका मार्मिक और संवेदनाओं से भरपूर ऐसे कथा संग्रह लाकर पाठकों को एक नई ऊर्जा प्रदान करेंगी.

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