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कैसा था वाजिद अली शाह का परीखाना

राजा महाराजा और नवाब अपने काल में किस तरह जीवनयापन किया करते थे और महिलाए और मर्दो के बीच का फर्क क्या अंतर था.. नवाब वाजिद अली शाह ने अपने जीवन के अनछुए पहलु और राज को अपनी नई किताब में बयान किया है.

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वन्‍दना यादव/ सुरेश कुमार नई दिल्ली, 13 April 2017
कैसा था वाजिद अली शाह का परीखाना बुक परीखाना

अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह एक कुशल शासक के बजाय कला, संगीत प्रेमी और अपनी विलासमयी जीवनशैली की वजह से इतिहास में ज्यादा प्रसिद्ध हुए थे. उनकी ऐसी छवि के पीछे कौन से कारण जिम्मेदार थे? क्या सचमुच में वाजिद हमेशा कनीजों से घिरे रहते थे? क्या उनके मन में महिलाओं के लिए सम्मान नहीं था? ऐसे ही तमाम सवाल इतिहास में दिलचस्पी रखने वाले हर शखस के मन में उठते हैं. इस मामले में दिलचस्प बात यह हुई कि वाजिद ने खुद ही अपने जीवन के शुरुआती 26 वर्षों की दास्तान को किताब की शक्ल में तैयार कर दिया है.

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हाल ही में राजपाल एंड संस नई दिल्ली से छपकर आई किताब ‘परीखाना’ में वाजिद अली के जीवन के उस पक्ष का वर्णन है, जिसमें उन्होंने 26 वर्ष की आयु तक अनेक महिलाओं से अपने प्रेम प्रसंगों, अनुभवों और संगीत नृत्य से अपने जुड़ाव का ईमानदारी से बयान किया है. यह सच है कि बहुत कम उम्र से ही वह तमाम नाचने-गाने वाली नर्तकियों, खिदमतगार कनीजों और महिला कलाकारों के संपर्क में रहने लगे थे. उनमें से कईयों के साथ उन्होंने शादी की और कईयों को अलग-अलग बेगम के ख़िताब से भी नवाजा.

ऐसी हसीन बेगमों को रहने और उन्हें नृत्य का प्रशिक्षण देने के लिए उन्होंने ‘परीखाना’ का निर्माण करवाया था. केवल आठ वर्ष की उम्र में रहीमन नाम की अधेड़ महिला खिदमतगार ने पहली बार वाजिद के मन में औरत और मर्द का अहसास करवाया. इसके बाद बेशुमार परियों और बेगमों ने वाजिद की जिन्दगी और दिल में जगह बनाने की कोशिश की. लेकिन उनमें से कुछ ही ऐसी थी जिनसे वास्तव में वाजिद को भी मोहब्बत हुई या जिनके लिए उनके दिल में खास जगह बनी और जिनके बिछड़ने पर वाजिद रोए भी थे.

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हालांकि इस किताब को अवध के आखिरी नवाब की रंगीन दास्तान के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है लेकिन इस किताब में वाजिद अली शाह के भीतर मौजूद एक बिलकुल अलग तरह के इंसान की भी छवि उजागर होती है.

यहां पर सिर्फ प्यार मुहब्बत ही नहीं रिश्तों की पेंचीदगीयां भी उजागर हुई हैं. अमीरन, उमराव खानम, हुज़ूर परी, दिलदार परी, महक परी, इमामन, हूर परी , कैसर बेगम, खुसरो बेगम और बेगम हजरत महल जैसी बेशुमार महिलाओं का जिक्र इस किताब में मौजूद है. भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में अपनी भूमिका के लिए प्रसिद्ध हुई बेगम हजरत महल भी परीखाना की बेगमों में शामिल थी. इस किताब में उनके बारे में काफी कुछ लिखा गया है.

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वाजिद अली की इतिहास में कैसी भी छवि रही हो लेकिन वह एक कोमल ह्रदय वाले संवेदनशील इंसान थे इसमें संदेह नहीं हैं. इस किताब में भी अपनी गतिविधियों का जिक्र करने के उद्देश्य के बारे में वह लिखते हैं ‘ इस किताब को पड़ने वाले स्वार्थी महिलाओं से सावधान रहें और उनपर कभी यकीन न करें और न ही उनपर अपना पैसा बर्बाद करें.’

एक 26 वर्षीय युवक के द्वारा इतनी बेबाकी और ईमानदारी से अपने जीवन के अतरंग प्रसंगों को केवल उत्तेजना या उपहास के लिए नहीं बल्कि अपनी छवि के पीछे के सच को उजागर करने के लिये बयान करना वाकई नवाब की बुद्धीमता और सरलता को ही सिद्ध करता है. भले ही यह किताब वाजिद अली के जीवन के अतरंग पक्षों को उजागर करती है लेकिन इसके जरिये उस दौर के इतिहास और संस्कृति की भी झलक मिलती है. इस लिहाज़ से इस किताब का ऐतिहासिक महत्त्व भी कम नहीं है.

एक नजर -
पुस्तक- परीखाना
लेखक-नवाब वाजिद अली शाह
अनुवाद- शकील सिद्दीकी
मूल्य- 225 रुपये
प्रकाशक- राजपाल एंड संस, दिल्ली

 

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