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बुक रिव्यू: भारत की अर्थव्यवस्था का पुनर्जागरण

संजीव सान्याल की यह किताब स्वतंत्र भारत के आर्थिक विकास पर एक विस्तृत टिप्पणी है. 1991 के उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास को भारतीय इतिहास के संदर्भ में देखना जरूरी है.

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aajtak.in
प्रतीक्षा पांडेय [Edited By: कुलदीप मिश्र]नई दिल्ली, 08 September 2015
बुक रिव्यू: भारत की अर्थव्यवस्था का पुनर्जागरण Book Cover

किताबः द इंडियन रेनेसा: इंडियाज राइज आफ्टर अ थाउजेंड ईयर्स ऑफ डिक्लाइन (पेपरबैक)
लेखक: संजीव सान्याल
पब्लिशरः पेंगुइन
कीमतः 399 रुपए

संजीव सान्याल की यह किताब स्वतंत्र भारत के आर्थिक विकास पर एक विस्तृत टिप्पणी है. 1991 के उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था ने जो उछाल देखा, उसने दुनिया का ध्यान खींचा है. लेखक का मानना है कि इस विकास को भारतीय इतिहास के संदर्भ में देखना जरूरी है. सान्याल ऐसा करने में बिलाशक सफल रहे हैं.

नेहरू-कालीन समाजवाद के प्रति अविश्वास
लेखक के मुताबिक, स्वतंत्र भारत का नेहरूवादी रवैया, जिसे उसने 'inward looking cultural attitude' माना है, कोई भी आर्थिक क्रांति लाने में नाकाम रहा. लेखक का तर्क है कि देश की आर्थिक दुर्गति अंग्रेजों के आने के कई साल पहले ही शुरू हो गई थी, जब महमूद गज़नी ने देश में लूट-पाट शुरू की थी. जिस धरती ने अपने सुनहरे इतिहास में कौटिल्य जैसे विद्वान देखे हैं, उसके ज्ञान में धीरे-धीरे गिरावट आती गई. 1991 के उदारीकरण के बाद भारत में न सिर्फ आर्थिक, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण भी हुआ.

सुधार के दौर
नब्बे के दशक में आए उदारीकरण को समझाते हुए आर्थिक विकास को लेखक ने तीन भागों में बांटा है: साल 1992-97, 98-2002 और 2003 के बाद. पहले दौर में भारत वैश्विक बाजार में एक नवजात शिशु जैसा था. उस दौर में आर्थिक और तकनीकी कमियां नुमाया होने लगी थीं. दूसरे से तीसरे दौर में आते-आते अर्थव्यवस्था बैंक ऋण की कमी के अभाव से ग्रस्त होने से लेकर लगातार बढ़ते विदेशी निवेश से दो-चार हो रही थी.

दूसरे देशों से अलग है भारत के विकास का मार्ग
उदारीकरण और प्रौद्योगिकी विकास के बाद, देश के सकल घरेलू उत्पाद में सबसे बड़ा योगदान कृषि और औद्योगिक क्षेत्र नहीं, बल्कि सेवा क्षेत्र का रहा है. सस्ता श्रम, और मजबूत मानव संसाधन का इस्तेमाल उन चीज़ों के निर्माण में नहीं किया गया जिनमें कौशल की जरूरत कम होती है. बल्कि भारत ने जटिल चीजें- जैसे ऑटोमोबाइल पार्ट्स और फार्मास्युटिकल्स का निर्यात शुरू कर दिया.

दो क्रांतियां
भारत के आर्थिक विकास के पीछे दो तत्वों का योगदान रहा. पहला, जनसांख्यिकीय ढांचे में बदलाव: परिवार नियोजन जैसी योजनाओं और ज्यादा निरोध तकनीकें बढ़ने के कारण जन्म दर घटती गई. वहीं दूसरी तरफ लाइफ एक्सपेंटेंसी बढ़ती गई. दूसरा, रोज़गार के नए अवसरों ने शिक्षित युवा को आर्थिक और निजी विकास का मौका दिया.

कुल मिलाकर, यह किताब 11वीं सदी से लेकर वर्तमान तक भारत के आर्थिक सफर को बयान करती है और उसकी समीक्षा करती है. लेखक अर्थव्यवस्था की खामियों पर लाल निशान लगाता है. आगे आ सकने वाली समस्याओं के बारे में बताता है. साथ ही एक बेहतर देश के रूप में उभरने की क्षमता दर्शाता है.

क्यों पढ़ें?
यह किताब बहुत खोज-बीन करने के बाद जमा किये हुए तथ्यों पर आधारित है. सान्याल अपने तर्कों के प्रमाण इतिहास और वर्तमान से निकाल कर लाते हैं. वह देश के विकास को रेखांकित करने के साथ जरूरी आलोचना भी करते हैं. लेखक आदर्शवादी नहीं, बल्कि सकारात्मक है. किताब की भाषा सहज, शब्दजाल से मुक्त है और पाठकों को देश की अर्थव्यवस्था समझने में मदद करती है.

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