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बिहार के 'दो भाइयों' लालू और नीतीश की कहानी

बिहार क्या है. कौन समझा है. पर कोशिशें तो की ही जा सकती हैं. बिहार की सियासत के दो अहम छोर हैं, लालू यादव और नीतीश कुमार. इन दोनों की कहानी के समांतर समझें बिहार को और उसकी सियासत को.

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aajtak.in
कुलदीप मिश्र नई दिल्ली, 16 October 2015
बिहार के 'दो भाइयों' लालू और नीतीश की कहानी Book the brothers bihari

किताब: द ब्रदर्स बिहारी
राइटर: संकर्षण ठाकुर
पब्लिशर: हार्पर कॉलिन्स इंडिया
कीमत: 550 रुपये (पेपरबैक एडिशन)

बिहार क्या है. कौन समझा है. कोई समझेगा. पर कोशिशें तो की ही जा सकती हैं. बिहार उसके लोग हैं. उनकी सोच है. इसके दो सिरे हैं. या ऐसा कुछ वक्त पहले तक था और अब ये सिरे कुल जमा तीन हो गए हैं. पर फिलवक्त बात दो की. इनके नाम हैं. लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार.

दोनों छात्र नेताओं ने साठ के दशक के आखिर में पटना में पैर जमाए. वाया छात्र राजनीति. लालू बीएन कॉलेज से बीए कर सरकारी नौकरी में लग गए. नीतीश इंजीनियरिंग करके भी जमे रहे. दोनों को ही नरेंद्र सिंह का सहारा था.

1973 में किस्मत ने पलटी खाई. लोहिया की जलाई मशाल धधक रही थी. बिहार में इसे कर्पूरी ठाकुर ने थाम रखा था. जेपी के पैर रखने के साथ ही इसे और मजबूती मिल गई. कांग्रेस की गफूर सरकार लटपटा रही थी. देश भर की आंच बिहार में भी पहुंच रही थी. और इसके युवा चेहरे बने लालू. लालू जो साथियों के समझाने पर दोबारा स्टूडेंट पॉलिटिक्स में लौटे थे. पिछली हार की कसक बीते बरसों में कम हो गई थी. शादी भी हो गई थी. उधर नीतीश इंजीनियरिंग के स्टूडेंट्स की यूनियन मजबूत करने में जुटे थे.

फिर जेपी के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान लालू को खूब अहमियत मिली. वह पटना यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ अध्यक्ष थे. सुशील मोदी एबीवीपी कोटे से महामंत्री थे. आंदोलन हुआ. इमरजेंसी लागू हुई. कोई भूमिगत हुआ तो कोई गिरफ्तार. जो भागा वो भी देर सवेर पकड़ा गया. जब सब छूटे तो लालू को मिला छपरा से टिकट. नीतीश का कहना है कि उनको भी जेपी ने सांसदी का टिकट दिया था, मगर सिंबल देर से मिला. और सुशील मोदी तो संघ और संगठन में रम गए. लालू सांसद बने 77 में. फिर 80 से विधायक बनने लगे. सोनेपुर सीट से.

नीतीश विधायकी लड़े. मगर हार गए कांग्रेस के कद्दावर कुर्मी नेता से. उनको झटका लगा. 80 में फिर हारे तो मन खिन्न हो गया. सियासत छोड़ने का मन बनाने लगे, पर दोस्तों ने मनाया. 1985 में उनको आखिरकार विधायकी नसीब हुई. उसी हरनौट सीट से जहां पिछले दो दफा खेत रहे थे. इसके बाद उनकी भी गुड्डी चढ़ने लगी. 87 में युवा लोकदल के अध्यक्ष बन गए. बाद में लालू के खास हो गए.

लालू कर्पूरी ठाकुर की चेलई करते करते अपना अलग ही रौला बना रहे थे. 1988 में कर्पूरी ठाकुर का निधन हुआ तो अनूप लाल यादव सरीखे कई हैवीवेट और वरिष्ठों को किनारे कर नीतीश सरीखे युवा तुर्कों के सहारे लालू विपक्ष के नेता बन गए. उस दौरान वह दिल्ली में खूब जमे रहे. जनता दल की एका के लिए कभी हेगड़े, तो कभी देवीलाल और चंद्रशेखर के चक्कर लगाते.

1990 में लालू बिहार के मुख्यमंत्री बने. करीबी मुकाबले में उन्होंने प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के कैंडिडेट रामसुंदर दास को हराया. इसके बाद उनकी ब्रैंड पॉलिटिक्स शक्ल पाने लगी. लालू ये अक्ल पा गए थे कि सिर्फ कांग्रेस का विरोध कर ज्यादा दिन दुकान नहीं चल सकती. यादव उनके पीछे जमा हो गए थे. भागलपुर दंगों के बाद मुसलमान कांग्रेस से बिदके थे. उन्हें भी लालू अपने पक्ष में लाए. प्रशासनिक मशीनरी को साफ संदेश था. सब कुछ हो पर दंगा नहीं. तिस पर समस्तीपुर में आडवाणी का राम रथ रोक मुसलमानों के दुलरुआ हो गए. फिर दलितों को भी उन्होंने अपने खालिस देसी ढंग से अपना बना लिया. मगर इसके बाद समाजवाद या कहें कि मंडलवाद यादववाद में तब्दील हो गया.

नीतीश कुमार अब तक कमोबेश नेपथ्य में थे. मगर लालू सरकार के बदले रंग ढंग ने उन्हें भी चाल बदलने पर मजबूर कर दिया. वह जनता दल से अलग हो गए. समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिल समता पार्टी बनाई. पहले चुनाव में बुरी तरह हारे. पर हिम्मत नहीं हारी. बीजेपी के साथ आए. केंद्र में मंत्री बने और आखिरकार 2005 में लालू राज का 15 साल बंद अंत कर पाए.

इस बीच लालू चारा घोटाले के बीच पार्टी तोड़ अपना राष्ट्रीय जनता दल बन चुके थे. बिहार में वही रिट थे और उन्हीं के आभामंडल के इर्द-गिर्द सब कुछ संचालित होता था. अपहरण उद्योग चरम पर था. विकास थम गया था. बिहार ठहर गया था. नीतीश हौसले के टूटने के ऐन पहले कबूल हुई दुआ की तरह आए. सुशासन लौटा. धीमे धीमे. जेडीयू और बीजेपी ने बिहार को सुधारा. सियासत भी साथ साथ चलती रही. 2010 में दूसरे चुनाव के दौरान नीतीश के नेतृत्व में एनडीए को प्रचंड बहुमत मिला. यहां से नीतीश की महत्वाकांक्षाओं को नए पर लगे. 2009 के लोकसभा चुनाव में भी जब एनडीए सब जगह धूल फांक रही थी, तब बिहार से उसे बड़ी जीत मिली थी. इसने भी नीतीश को कुछ पर और परवाज दी. अब तक नीतीश के लिए सब अनुकूल था. बीजेपी की तरफ से उन्हें सुशील मोदी मिले थे, जो आधुनिक लक्ष्मण के रोल में परम प्रसन्न थे.

मगर बीजेपी के पास एक सीनियर मोदी भी थे. नरेंद्र मोदी. जो गुजरात से देश विजय को निकलने की तैयारी में थी. नीतीश से उनकी खटकी. शुरुआत 2009 में हुई. और फिर रार बढ़ती ही गई. इसके भी कई किस्से हैं. पर सिलसिले की अहम कड़ी है वह मोड़, जब मोदी के चलते नीतीश ने एनडीए से कट्टी कर ली.

2014 में मोदी ने नीतीश को उनके घर में ध्वस्त कर दिया. नीतीश टूटे, जुड़ने के लिए पर्दे के पीछे गए. आगे आए जीतनराम मांझी. इस बीच लालू और नीतीश दोनों को समझ आ गया कि अकेले अकेले रहे तो राजनीतिक इतिहास की किताबों में सिमटकर रह जाएंगे. झाड़ पोंछ निकाला गया वही पुराना साफा जो हर बेमेल साथी में गठजोड़ के काम आता है. सांप्रदायिकता विरोध की ओट में बेर केर संग आ गए. रहीम दास चचा अब दोहा बदल लें जन्नत में बैठे बैठे.

इतनी लंबी कहानी क्यों सुनाई. क्योंकि एक किताब आई है. इसका टाइटल है 'द ब्रदर्स बिहारी'. ये दरअसल एक पैकिंग में दो किताबे हैं. पहली का नाम है 'सबऑल्टर्न साहेब, बिहार एंड द मेकिंग ऑफ लालू यादव'. दूसरी किताब का नाम है 'सिंगल मैन- द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ नीतीश कुमार ऑफ बिहार'. सपाट लहजे में समझना चाहें तो यूं समझें कि ये लालू और नीतीश की पॉलिटिकल बायोग्राफी हैं. इन्हें अलग अलग दौर में लिखा बिहार के ही मंझे हुए पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने. ठाकुर ऐसे परिवार से आते हैं, जिसकी बिहार के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हनक और पकड़ रही है.

इसलिए उन्हें अंदरखाने की भी खूब खबर रहती है. तिस पर ये पेशा पत्रकारिता का. सो उन्होंने मंझे किस्सागो की तरह दोनों का जीवन चरित बुना है. इस दौरान श्वेत श्याम दोनों ही स्याहियों को बखूबी खर्चा है. जाहिर है इस क्रम में उनकी अपनी राजनीतिक समझ ने भी खूब रोल अदा किया.

'सबऑल्टर्न साहेब' 90 के दशक के आखिर में लिखी गई किताब है. 2006 में इसका एक और संशोधित संस्करण आया था. उसी तरह 'सिंगल मैन' 2014 में नमूदार हुई थी. अब बिहार चुनाव के मौके पर इन्हें नए सिरे से चुस्त दुरुस्त कर एक साथ पेश किया गया है. किताब पढ़कर बिहार पर पिछले कमोबेश 25 बरस से शासन कर रहे दो नेताओं के बारे में खूब समझ बढ़ती है. भाषा कुछ जटिल है. अपने एक सहकर्मी के शब्दों में कहूं तो संकर्षण राजनीति पर लिखने के दौरान कविताई करने लगते हैं. इससे समझना कुछ मुश्किल हो जाता है. पर ये एक नजरिया है. एक ये भी कि सब सामने दिखता सहज सीधा नहीं तो उसे ज्यों का त्यों कैसे कह लिख दिया जाए. शैली रोचक है. किस्सों की भरमार है. याद रह जाते हैं.

मगर इस किताब की कुछ सीमाएं भी हैं. चूंकि ये दो पुरानी किताबों की नई पैकिंग है. इसलिए अधूरापन भी सालता है. खासतौर पर लालू वाली किताब में. 2000 के दौर के बाद के लालू. 2004 के बाद रेल मंत्री रहे लालू. 2009 के बाद के लालू. जब केंद्र और राज्य दोनों ही जगह उन्हें सत्ता सुख से वंचित रहना पड़ा. ये सब मिसिंग है. किन मजबूरियों के चलते उन्हें 2015 में नीतीश को नेता मानना पड़ा. उनके अपने सियासी कुनबे का अब क्या.

और नीतीश. मोदी से हारने के बाद कितनी और कैसी बदली उनकी सियासत. ये सब नहीं हैं. जो है, वह एक सरसरी निगाह के साथ लिखा फुटनोट. तो किताब को पढ़ते वक्त इसका ख्याल रखें.

बिहार चुनाव हैं. खूब किताबें आ रही हैं. कुछ अच्छी भी हैं. ये उनमें से एक है. पुराने माल के बावजूद, इसे पढ़ें.

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