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एक गुल्लक यादों की...

यादों के इस गुलदस्ते में मनीषा ने प्रयोग करने का जोखिम लिया है. कभी कविता तो कभी कहानी तो कभी डायरी के पन्ने के तौर पर अपनी बात कहने की कोशिश की है. इस लिहाज से उनकी किताब एक सराहनीय कोशिश है.

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aajtak.in
सना जैदी नई दिल्ली, 28 April 2016
एक गुल्लक यादों की... जिंदगी की गुल्लक बुक का कवर

किताब-जिंदगी की गुल्लक
लेखिका-मनीषा श्री
प्रकाशन-एपीएन पब्लिकेशंस
मूल्य-150 रुपये.

वो भी क्या दिन थे...बचपन के...हम सब अपने बचपन से लेकर बड़े होने के किस्सों को कुछ ऐसे ही संजोये रखते हैं. अपना बचपन साथ लेकर घूमते हैं चाहे दुनिया के किसी भी हिस्से में क्यों ना रहें. यादों की एक गुल्लक सी हमेशा साथ रहती है. जेब खर्च के लिए मिले पैसे तो कब के खत्म हो चुके होते हैं. लेकिन यादों की वो पूंजी इस गुल्लक में हमेशा बनी रहती है.

मलेशिया में रह रहीं लेखिका मनीषा श्री की किताब जिंदगी की गुल्लक भी यादों का एक ऐसा ही कोलाज है. जिंदगी की कतरनें हैं...रंग बिरंगी तो कभी सोचने के लिए मजबूर करने वाली. लिखने वाले का मकसद क्या होता है. वो लिखने के बहाने खुद को जीता है और अगर पढ़ने वाला इन यादों में अपना अक्स तलाशने लगे तो यकीनन लेखक की कामयाबी है. इस लिहाज से मनीषा श्री की जिंदगी की गुल्लक निश्चित तौर पर अपनी बात बिना शोर शराबे के चुपके से कानों में कह जाती है.

यादों के इस गुलदस्ते में मनीषा ने प्रयोग करने का जोखिम लिया है. कभी कविता तो कभी कहानी तो कभी डायरी के पन्ने के तौर पर अपनी बात कहने की कोशिश की है. इस लिहाज से उनकी किताब एक सराहनीय कोशिश है. सरल लिखना दुनिया का सबसे जटिल काम है. लेकिन किताब पढ़ने से ये अहसास होता है कि मनीषा ने वाकई इस जटिलता का निर्वाह बड़ी सरलता से किया है.

नदी की कहानी कविता की शक्ल में आती है तो दहेज जैसे मुद्दे पर अपनी बात वो बेबाकी से रखती हैं. इसमें मां का दर्द भी है और बेटी की पीड़ा भी. स्त्री होने पर जिस भेदभाव का दंश झेलना पड़ता है उसकी कसक है तो सपनीली दुनिया का मीठा अहसास भी है. यादों के इस पिटारे में कभी सहेली के जरिए बात कही गई है तो कभी किसी मुददे के बहाने. लेकिन हर कहीं लेखिका की छटपटाहट किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की रही है. थोंपने की कोशिश नहीं है. लेकिन एक विमर्श जरूर उभर कर आया है. जो सुघड़ है कई बार उसमें शिल्प का वो सौंदर्य उभर कर नहीं आता जो देखकर ही हमें उसकी खूबसूरती का अहसास करा दे.

कई बार अनगढ़ प्रतिमाएं ज्यादा आनंद देती हैं. मनीषा श्री की किताब में ये अनगढ़ता कई बार झलकती है. लेकिन अनगढ़ता का यही आनंद इस किताब की खासियत है. लेखिका की ये पहली किताब है. जिस लेखन शैली के जरिए उन्होंने प्रयास किया है वो निश्चित रूप से सराहनीय है. उम्मीद की जानी चाहिए कि जो गुल्लक है कल वो संदूक में बदल जाए.

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