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देश-संविधान सबको भुनाने की राजनीति पर तीखा व्यंग्य है 'धंधे मातरम'

धर्म और जाति को लेकर जो बड़ी-बड़ी दलीलें देते हैं वे भी जब अपने-अपने कार्यक्षेत्र में वादा खिलाफी करते हैं तब वंदे मातरम बहुत पीछे रह जाता है और धंधे मातरम की जीत होती है. पीयूष ने एक पागल से मुलाकात के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि धर्म-जात, राष्ट्र-संविधान, सबको धंधा बना दिया है लोगों ने...

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सईद अंसारी [Edited By: प्रज्ञा बाजपेयी]नई दिल्ली, 15 January 2018
देश-संविधान सबको भुनाने की राजनीति पर तीखा व्यंग्य है 'धंधे मातरम' बुक रिव्यू: धंधे मातरम

इस देश में कोल मचा है फकत कोरे बयानों का, आरोपों के खेल को सीखो, ये खेल है बड़े दाम का धंधे मातरम. पीयूष पांडे की रचना धंधे मातरम धंधे को नए रूप में परिभाषित करती है. धंधा ही अपनी संजीवनी है जो मृत प्राय में प्राण फूंक देती है फिर धंधा चाहे कोई भी हो. धर्म और जाति को लेकर जो बड़ी-बड़ी दलीलें देते हैं वे भी जब अपने-अपने कार्यक्षेत्र में वादा खिलाफी करते हैं तब वंदे मातरम बहुत पीछे रह जाता है और धंधे मातरम की जीत होती है. पीयूष ने एक पागल से मुलाकात के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि धर्म-जात, राष्ट्र-संविधान, सबको धंधा बना दिया है लोगों ने. और जब धंधा ही बना दिया है तो बोलो धंधे मातरम. वंदे मातरम बोलने की औकात नही है.

" अ से असहिष्णुता, आ से आतंवाद में पीयूष ने राजनीति पर बड़ा सटीक व्यंग्य किया है. राजनीति को भले ही गंदा कहा जाए पर यह धंधा बड़ा कामयाब बना देता है इंसान को. विपक्ष को कैसे आरोपों के घेरे में खड़े करें और संसद को चलने ही ना दें. झूठे आरोपों का खंडन करने में भले ही राष्ट्रीय मुद्दे पूछे छूट जाएं पर अपनी राजनीति का धंधा बरकरार रहना चाहिए. लेखक ने राजनेता बनने के इच्छुकों के लिए नया ककहरा भी तैयार किया है. व्यंग्य को लेकर लेखक की दृष्टि बिलकुल अलग है. पीयूष को व्यंग्य के सरोकारों की गहरी समझ है. एक वाक्य " अच्छे दिन आएंगे " को विरोधियों ने किस प्रकार उछाला कि तमाम प्रगति को अनदेखा कर दिया. पीयूष ने एक वाक्य के माध्यम से हिन्दुस्तानी ट्रेनों के कहीं समय पर ना पहुंचने पर भी व्यंग्य कर दिया है. अच्छे दिन आएंगे पर भारतीय ट्रेनों की तरह कहीं भटक गए हैं. चीख पुकार करके संसद को ना चलने देना और लोकतंत्र की हत्या का नारा लगाने वालों की मानसिकता को उजागर किया गया है कि ज्वलंत समस्याओं से ध्यान हटाना क्या वास्तव में लोकतंत्र की हत्या नहीं है. क्या धंधे मातरम ही सर्वोपरि है.

डेंगू मच्छर हमारी कुत्सित मानसिकता का प्रतीक है. इंसान ही इंसान को डस रहा है और अपनी इस हरकत पर गर्वित हो रहा है. ठीक ही कहा पीयूष ने " गंदा है पर धंधा है " सरकारें बदलती रहती हैं पर बेरोजगारी की समस्या ज्यों की त्यों मुंह बाए खड़ी है. कोरे वादों से बात नहीं बनती. युवा हर क्षेत्र में आगे आएं तो " नागिन डांस को बचाना है " कि तरह युवाओं को हताशा से बाहर निकाल लाएंगे और राजनैतिक दलों के घोषणा पत्र सिर्फ वोटर को उल्लू बनाने तक सीमित नहीं रहेंगे. उन्हें वादे पूरे करने ही होंगे. कितनी सहजता से व्यक्त कर दिया है पीयूष ने कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए कैसे हम सब जानते समझते हुए भी उल्लू का आवरण ओढ़े रहते हैं. चर्चित बने रहने के लिए क्या-क्या नौटंकी करनी चाहिए इसका बखूबी वर्णन और व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण प्रदर्शित किया है. " होली कंहैया की हो ली ... " समाज की विसंगतियों को पीयूष ने अति सहजता से स्पष्ट किया है. रोजमर्रा की घटनाओं में से व्यंग्य के विषय खोज लेना पीयूष के बूते की बात है.

चाहे बाबा हों या राजनेता स्थिति कमोबेश दोनों की एक जैसी ही है. ढोंग रचने में दोनों माहिर. आंखों में धूल झोंकना तो इनके बाएं हाथ का खेल है. कैसे भक्तों की भीड़ इन्हें फर्श से अर्श तक पहुंचाती है औंधे मुंह गिर भी पड़ें तो इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि यह अपने धंधे में माहिर हैं. आम आदमी होने का दर्द भी पीयूष ने उभारा है. मन को झकझोर देती हैं कुछ अनुभूतियां कि हम कैसे निरीह पर तो बेकसूर होने पर भी टूट पड़ते हैं पर कठोर वार होने पर भी उच्च वर्ग की ओर आंख भी नहीं उठाते. दिखावा हमारी रग-रग में है. हम दान भी देते हैं तो दिखावे के लिए इसीलिए उसे यू ट्यूब पर भी डाल देते हैं. राजनीति एक दलदल है इसमें फंसते जाना लाजमी है. एक बड़ा बंगला और चापलूसों का जमावड़ा यही है पहचान जन-जन के नायक की. कोरे वादे, नए-नए प्रलोभन, जिनके जाल में फंसता आद आदमी उसे क्या मिलता है वही ढाक के तीन पात. पीयूष की रचना मन को झकझोरती, देश की, समाज की सच्चाई से हमें रूबरू कराती है. धंधा ही हमारे लिए सर्वोपरि है चाहे वह कैसा भी क्यों ना हो. विरोध की राजनीति बहुत जोर पकड़ रही है. विरोध नहीं तो राजनीति किस बात की. बात चाहे स्वच्छता अभियान की हो या संपत्ति विवरण की हो. हर अच्छी बात का विरोध करना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है. हम आदी हैं मनमानी करने के. चुनाव के पहले घोषणापत्र में बड़े-बड़े वादे होते हैं गरीब की जरूरत पूरे करने के पर गरीब वहीं रह जाता है और राजनेता और अमीर हो जाते हैं. यही है देश की विडंबना.

पीयूष को उनके व्यंग्य संग्रह धंधे मातरम के लिए शुभकामनाएं, पढ़ते ही पाठकों के मन में सवाल उठेंगे और समाज तथा देश की परिस्थिति चलचित्र की भांति उनके नैनों के सामने घूमेंगी ऐसा मेरा विश्वास है. संग्रह में कई बड़े गंभीर विषय हैं जिनपर पीयूष की लेखनी चली है व्यंग्यात्मक रूप में. भाषा आम है इसलिए प्रभावशाली है. जनमानस का आक्रोश भी उभरकर सामने आया है पर सहज और व्यंग्यात्मक रूप में. पीयूष का संग्रह निश्चय ही सामाजिक सरोकारों पर सोचने को विवश करेगा.

पुस्तक का नाम - धंधे मातरम

लेखक - पीयूष पांडे

प्रकाशक - प्रभात प्रकाशन

मूल्य - 250 

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