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बुक रिव्यू: मेरी जीवन गाथा, शब्दों के संदूक में यादें

बचपन में कोई महान नहीं होता मगर बचपन में मिली सीख और संस्कार के साथ उम्र के हर दौर में किए गए फैसले किसी भी व्यक्ति को महानता के रास्ते पर अग्रसर जरूर कर देता है. ऐसा ही एक संस्मरण है आरके नारायण की आत्मकथमा का...मेरी जीवन गाथा.

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aajtak.in
सबा नाज़ नई दिल्ली, 21 September 2016
बुक रिव्यू: मेरी जीवन गाथा, शब्दों के संदूक में यादें मेरी जीवन गाथा

बचपन हमेशा और हरेक का सुनहरा होता है, फिर चाहे वो कोई भी हो. कुछ लोग अपने बचपन की खूबसूरत यादों को शब्दों का संदूक में सहेज कर रख लेते हैं, और कुछ बोलचाल की आवारगी में ही रहने देते हैं. बचपन में कोई महान नहीं होता मगर बचपन में मिली सीख और संस्कार के साथ उम्र के हर दौर में किए गए फैसले किसी भी व्यक्ति को महानता के रास्ते पर अग्रसर जरूर कर देता है. ऐसा ही एक संस्मरण है आरके नारायण की आत्मकथमा का...मेरी जीवन गाथा.

राजपाल एंड संश से प्रकाशित मेरी जीवन गाथा वो पुस्तक है, जिसमें आरके नारायण के महान लेखक बनने या यूं कहें आम लोगों के जज्बातों को बहुत मुलायम हाथों से टटोलकर उन्हें सहलाने वाले कहानीकार की पूरी लेखनयात्रा का वो हिस्सा झलकता है, जिसका साथ सारी उम्र उनके साथ रहा. जिसे उन्होंने कभी खुद से दूर नहीं किया और शायद यही वजह है कि आरके नारायण के तमाम लेखन में कोई भी पाठक बड़ी आसानी से उनका बचपन, उनकी नानी का घर, घर में पले जानवरों से मुलाकात या फिर उनके बालपन के किसी मित्र या रिश्तेदार को देख सकता है...और महसूस कर सकता है.

ये आरके नारायण के लेखन की खूबी है कि वो अपनी हर एक बात को बेहद गुदगुदाने वाले अंदाज में कुछ यूं बयान कर देते हैं कि पढ़ने वाला या सुनने वाला मुस्कुराए बगैर नहीं रह सकता. ये आर के नारायण के लेखन का ही कौशल है कि अंग्रेजी भाषा में लिखने के बावजूद भारत की मिट्टी की महक और उसका देसी अंदाज जरा भी कम नहीं होता है. उनकी इस आत्मकथा को पढ़ने के बाद इस बात का भी खुलासा हो जाता है कि वो किस माहौल और किस तरह के परिवेश में पले बढ़े. ये किताब उनके बचपन की वो तस्वीर भी दिखाती है कि बच्चों की शरारतें और अनुशासन की बंदिशों को तोड़ने की जिद किस तरह एक नए किस्से को जन्म देती है. जीवन के संघर्ष को चित्रित करने वाला उनका ये संस्मरण बेहद अनोखा प्रतीत होता है, जब उसमें बचपन की आविष्कारक फितरत नज़र आती है.

मालगुडी डेज के स्वामी का किरदार किस तरह उनके लेखन का हिस्सा बना और कैसे किरदार तिल तिल कर संपूर्ण उपन्यास में बदला, इसका चित्रण इतने खूबसूरत और सरल लहजे में किया गया है कि बोझिल हुए बगैर आगे पढ़ने को प्रेरित करता है. जो इस बात का भी सबूत है कि एक किरदार को तैयार करने के पीछे लेखक की भूमिका क्या हो सकती है, उसे किस किस तरह से दौर से गुज़रना पड़ता है. अपनी जिंदगी के उस पल को भी शब्दों से जीवित करने में आर के नारायण ने कोई कंजूसी नहीं बरती, जिस हिस्से को लोग अक्सर शर्म और हया की ओट में छुपा ले जाते हैं. जवानी के उस दौर का जिक्र उन्होंने बखूबी और खूबसूरत अंदाज में किया जब संघर्ष के दौर में जवान लड़के को प्रेम रोग की असंभव संभावनाएं घेर लेती है.

अपनी 80 हजार शब्दों में लिखी कहानी द गाइड के फिल्म बनने और उसके प्रचार और प्रसार के साथ जुड़े उनके किस्से बेहद रोचक और किसी फिल्मी पटकथा जैसे जान पड़ते हैं. मेरी जीवन गाथा में आरके नारायण ने उस किस्से से भी मुंह नहीं मोड़ा जब उन्हें न्यूयॉर्क से किसी अपराधी की तरह निकलने को विवश होना पड़ा. लेकिन इस गाथा का सबसे खूबसूरत पहलू ये लगा, जो उन्होंने अपने देसी होने के अलग अलग सबूत दिए. दुनिया भर के महान लेखकों की जमात का हिस्सा बनने के बावजूद जब लेखक इस बात में सुकून तलाशे कि उसे नदी का किनारा, खेतों में हल को चलता हुआ देखने, फावड़ा चलाना और मिट्टी गोड़ने में ज्यादा सुख मिलता है तो महसूस होता है कि लेखक की उर्वरता असीम है और शायद यही उसके महान होने का बीज भी है.

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