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बुक रिव्यू: उस औरत ने जंगली कबूतर से मर्द को काबू करना चाहा

एक आदमी था. बातों से बातें बनाने वाला. ऐसा नामुराद, जिसकी हर हिना मुराद करे. तो आबिदा भी इसी ख्वाहिश का शिकार बन गई. मगर शुरू से ऐसा न था.

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aajtak.in
कुलदीप मिश्र नई दिल्ली, 15 October 2015
बुक रिव्यू: उस औरत ने जंगली कबूतर से मर्द को काबू करना चाहा junglee kabootar book cover

किताब: जंगली कबूतर (छोटा नॉवेल)
किस्सागो: इस्मत चुगताई
पब्लिशर: वाणी प्रकाशन
पन्ने: 88 (हार्ड बाउंड एडिशन)
कीमत: 125 रुपये

एक आदमी था. बातों से बातें बनाने वाला. ऐसा नामुराद, जिसकी हर हिना मुराद करे. तो आबिदा भी इसी ख्वाहिश का शिकार बन गई. मगर शुरू से ऐसा न था. आबिदा को जब माजिद भाई के बारे में पता चला तो उसने कोई गफलत न पाली. मगर उस दिन किसी निकाह की दावत में उनसे निगाह दो चार हो गई. आबिदा ऊपर से सख्त बनी रही. मगर भीतर से शीर माल सी तर मिठास भर गई जेहन में. खीर पर पसारी गई सूखे पिस्ते की परत सा उसका मन हो गया. खीर में डूबने उतराने को आतुर.

आबिदा और माजिद एक हो गए. परिवार खुश, परवरदिगार खुश. मगर सब यूं ही तो नहीं चलना था. वरना कहानी कैसे बनती. ये कहानी भी न किसी ठेकेदार और इंजीनियर की जुगलबंदी सी है. मोड़ न आए, मुश्कल न आए, तो कोई इल्म को क्यों कर याद करे.

आबिदा बिछ बिछ जाती, मगर फिर एक डर भी. कि कहीं माजिद का इश्किया मिजाज उन्हें दूर न करे. एक बार सिलसिला कुछ यूं बना कि आबिदा इसके उसके चलते माजिद से लगातार दूर रही. ससुराल में कभी सास की सेवा करती तो कभी ननद की जचगी कराती.

और उधर माजिद उसकी याद में पिसने सा लगा. जब हद हो गई तो जिस्म को एक मांद मिली. मोना नाम की. मुआमला तब खुला, जब इस औरत के हमल ठहर गया. जाहिद ने आबिदा को बता दिया.

और यहां से तिहरी यंत्रणा का दौर शुरू हुआ. आबिदा ने जाहिद को नहीं दुत्कारा. बस बेचारगी, दया और दिलदारी की तिरंगी चादर ओढ़ ली. एक दिन बेसाख्ता मोना के दर पहुंच गई. उसे ये कहने. कि तू बच्चा न गिरा. मैं तेरी देखभाल करूंगी.

माजिद एक ऐसे ढेर सा हो गया, जो बाहर से ठौर दिखता, मगर भीतर आंच में झुलसता. और मोना. उसे तो बस जिस्म की आग से पेट के लिए रोटी पकाना आता. बच्ची होते न होते, बहुत कुछ बदलने लगा. बना कम, टूटा ज्यादा. जुड़ने की कोशिश में कुछ और. और आखिर में जो बचा, वो बस एक सबक था.

जंगली कबूतर इस्मत आपा की एक लंबी कहानी या कि छोटा उपन्यास है. इस बहस को वैसे भी आलोचकों के लिए छोड़ना मुनासिब होगा. हमारे हिस्से तो ये किस्सा ही भला. इसे आप एक बार में ही पढ़ लेंगे. छोटे छोटे सिलसिलों और ब्यौरों के जरिए मंजर बंधता. और फिर कहानी यूं फर्राटा भरती कि आप शिकायत भी न कर पाते कि अभी तो ठहर आंखों ने सुस्ताया था.

इस्मत चुगताई की किस्सागोई, शिल्प या जबान पर कुछ कहना खालिस चुगदपना होगा. मैंने ये कहानी पढ़ी. छू गई. याद रहेगी. आप भी पढ़ें. बस इतना ही.

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