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चेतन भगत की अधूरी समझ से 'ऑसम' बनेगा इंडिया?

चेतन के ही शब्दों में, नेता अगर इंजन के ड्राइवर हैं तो वह अनाउंसर हैं. उन्होंने बात की है उन समस्याओं पर, जो उनके मुताबिक देश को 'ऑसम' बनने से रोक रहे हैं.

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प्रतीक्षा पांडेय [Edited By: कुलदीप मिश्र]नई दिल्ली, 08 October 2015
चेतन भगत की अधूरी समझ से 'ऑसम' बनेगा इंडिया? chetan bhagat book cover

किताब: मेकिंग इंडिया ऑसम (न्यू ऐसेज एंड कॉलम्स)
लेखक: चेतन भगत
पब्लिशर: रूपा
पेज: 177
कीमत: 176

अखबारों में कॉलम लिखते हुए चेतन भगत को एक अरसा हो गया है. नॉवेलिस्ट की पहचान से आगे बढ़कर अब वह 'एक्सपर्ट' भी कहलाने लगे हैं. उनकी दूसरी नॉन-फिक्शन किताब अगस्त 2015 में रिलीज हुई. नाम है 'मेकिंग इंडिया ऑसम'.

मुल्क की समस्याओं पर उनके लेखों और निबंधों का संग्रह है यह किताब. चेतन के ही शब्दों में, नेता अगर इंजन के ड्राइवर हैं तो वह अनाउंसर हैं. इस किताब में उन्होंने उन समस्याओं पर बात की है, जो उनके मुताबिक देश को 'ऑसम' बनने से रोक रहे हैं. 'ऑसम' शब्द को लेकर उनका 'ऑब्सेशन' जाहिर है.

टाइटल के बारे में
चेतन ने यह किताब भारतीय युवाओं के नाम की है जो उनकी नजर में 'ऑसम' हैं. बात शुरू करने से पहले उन्होंने टाइटल के तीनों शब्दों 'मेकिंग, इंडिया और ऑसम' का मतलब बाकायदे डिक्शनरी के जरिये समझाया है. किताब उस युवा वर्ग को ध्यान में रखकर लिखी गई है जो राजनीतिक विवादों और बयानबाजी से घिरा खुद को खोया हुआ पाता है. ये वही नौजवान तबका है जो बड़बोले नेताओं, समर्थकों, मीडिया और सोशल मीडिया के असर के चलते अपनी खुद की पॉलिटिक्स को लेकर असमंजस में है.

किसके लिए है ये किताब
चेतन के मुताबिक, अगर आप यह किताब पढ़ते हैं तो देश के उन 4 फीसदी लोगों में हैं जो असल में देश की फ़िक्र करते हैं. लेकिन इन फिक्रमंद लोगों की आवाज भी सोशल मीडिया के बड़बोले कट्टरपंथी दबा देते हैं.

चेतन लिखते हैं कि अपनी चुनी हुई पार्टी की आलोचना करने वालों को लोग थाली का बैंगन बताकर खारिज कर देते हैं. फिर हारकर वे 4 फीसदी लोग भी आवाज उठाना बंद कर देते हैं और उसी मूक जनता का हिस्सा बन जाते हैं जिसे देश से कोई मतलब नहीं है. हालांकि 4 फीसदी के आंकड़े का निर्धारण चेतन भगत ने किसी सर्वे की बुनियाद पर नहीं, निजी अनुभवों के आधार पर किया है जो उन्हें सोशल मीडिया पर मिले.

कैसे बनाएं इंडिया को 'ऑसम'
चेतन का मानना है कि एक ऑसम देश बनने के लिए चार दिशाओं में मेहनत की जरूरत है: शासन, समाज, समानता और साधन. शुरुआती कॉलमों में वह प्रधानमंत्री मोदी के लिए 17 निर्देश जारी करके उनसे लोकतांत्रिक बनने की अपील करते हैं. वह जनता और प्रधानमंत्री के बीच अघोषित मध्यस्थ की तरह बात करते हैं. यह बात ध्यान में रखी जाए कि उन्होंने पूरी बात विरोध नहीं शिकायत की भाषा में कही है. वह सरकार विरोधी पक्ष में खड़े नहीं दिखते.

भ्रष्टाचार के लिए वह नेताओं के साथ जनता को भी दोषी ठहराते हैं. उनके मुताबिक भ्रष्टाचार से लड़ना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है. आर्थिक विकास का उनका नजरिया यह है कि बिजनेस-माइंडेड रवैया अपनाकर ज्यादा से ज्यादा निजीकरण करने से ही देश का भला होगा.

सेक्स जैसे विषयों पर वह समाज के दोगलेपन पर सवाल करते हैं. वह समानता की बात करते हैं. पुरुषों से अपील करते हैं कि औरत को वस्तु की तरह नहीं, इंसान की तरह देखें. औरतों से कहते हैं कि खुद के बुने हुए पिंजरे से बाहर निकलें. पर जेंडर विषयों पर उनकी समझ की खामी तब उभरकर आती है जब वो वर्किंग महिलाओं के पक्ष में ये तर्क रखते हैं कि वो घर की कुल कमाई में योगदान करती हैं. महिलाएं परिवार या अर्थव्यवस्था के लिए नहीं, सिर्फ खुद के लिए भी नौकरी कर सकती हैं. यह आजादी की बात है और शायद चेतन इसे स्किप कर गए हैं. अपनी दलीलों में वह 'राइट टू वर्क' का मूल भूल गए हैं और एक ऐसी तस्वीर बुनते हैं जैसे हर औरत का नौकरी करना एक पुरुष से त्याग मांगता हो.

पढ़ें या नहीं
किताब लिखने की तकनीक ऐसी है कि आपको लगेगा कि चेतन भगत सामने बैठकर बात कर रहे हैं. किताब पढ़ सकते हैं अगर आप चेतन भगत के फैन हैं और उनके कॉलम्स फॉलो करते हैं. चेतन ने इस किताब में एक बार फिर वह कर दिखाया है जिसके लिए वो जाने जाते हैं- आसान भाषा, कॉमन सेंस के तर्क जिन्हें वे रोजमर्रा के जीवन की मिसाल देकर समझाते हैं, और अपनी थ्योरीज़ जिन्हें वो फ्लोचार्ट के जरिये पेश करते हैं.

अगर आप उस युवा वर्ग का हिस्सा हैं जिसने 2014 के लोकसभा चुनाव फॉलो किए थे, तब भी यह किताब पढ़ सकते हैं. पर इसकी सबसे बड़ी खामी ये है कि चेतन के तर्क तथ्यों के बजाय निजी अनुभवों की बुनियाद पर दिए गए हैं. देश के आर्थिक विकास के उनके मॉडल में न कुछ नया है, न ही कुछ अलग. कहीं कहीं तो मुद्दों का उन्होंने इतना सरलीकरण कर दिया है कि गंभीरता बाधित हो गई है. इस किताब में उस बड़े वोटर तबके के लिए कुछ नहीं है जो न देश के राजनीतिक वाद-विवाद का हिस्सा है, न सोशल मीडिया पर दिखता है और फिर भी चुनावों के नतीजे तय करता है.

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