एडवांस्ड सर्च

Advertisement

'भीगा हुआ सच' की कविताएं मन को देंगी आजादी

ये कविताएं पिंजड़े को तोड़ उन्मुक्त गगन में विचरण करने की प्रेरणा देती हैं.
'भीगा हुआ सच' की कविताएं मन को देंगी आजादी 'भीगा हुआ सच' का बुक कवर
सईद अंसारी [Edited by: विकास त्रिवेदी]नई दिल्ली, 16 June 2015

किताब: भीगा हुआ सच
लेखिका: अर्चना राजहंस मधुकर
प्रकाशक: कश्यप पब्लिकेशन, गाजियाबाद
कीमत: 150 रुपये

'भीगा हुआ सच' अपने नितांत नए कलेवर में लिपटी कृति. अर्चना की कविताएं पिंजड़े को तोड़ उन्मुक्त गगन में विचरण करने की प्रेरणा देती हैं. कवियित्री का मन जहां कोमलता से ओत-प्रोत प्रतीत होता है. वहीं दूसरी ओर समाज से विद्रोह करने को भी आतुर है. बंधी-बंधाई लीक पर चलना शायद उसे स्वीकार नहीं.

बात जब कविता की है तो इसमें भी कोई संदेह नहीं कि रोज कोई ना कोई नया कविता संग्रह पढ़ने को मिलता है. लेकिन सभी में प्राय: एक ठहराव है, एक ही विषय, एक ही मानसिकता पाठकों को बांध नहीं पाती. कविताएं ऐसी हों जो कुछ नया करने को विवश करती हों. अर्चना ऐसी ही सशक्त हस्ताक्षर हैं, जो काव्य जगत में कुछ नया करना चाहती हैं.

यह भाव उनकी कविताओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. 'तुम आओ तो कहूं' कविता की अंतिम पंक्ति 'सपनों के पीछे भागना ही अंतिम सत्य नहीं होता' बहुत बड़ी सच्चाई बयां करती है. यह सच है कि सपनों के पीछे भागने से सपने सच नहीं होते. जीवन के ठोस धरातल पर मजबूती से पैर जमाए रहने से बहुत से रास्ते खुद ब खुद निकल आते हैं. अर्चना की यही विशेषता है कि बड़े-बड़े संदेश उन्होंने बड़ी सहजता से स्पष्ट कर दिए हैं.

अर्चना स्वयं स्त्री हैं. लेकिन कहीं भी कविताओं के माध्यम से पाठकों की करुणा पाने का उन्होंने प्रयास नहीं किया है. स्त्री और पुरुष दोनों के ही सामान्य और समान रूप से क्रिया-कलापों और मानसिकता की अभिव्यक्ति की गई है.  'यहां मेरा घर नहीं', रंगमंच ये वक्त बीत ही क्यों नहीं जाता' और 'पानी' सीरीज की कविताएं इसी कोटि में आती हैं और यह विशुद्ध कविताएं हैं, जहां न स्त्री मुख्य बिन्दु है न पुरुष बल्कि सामाजिक सच्चाई की अभिव्यक्ति है.

'एक था सच' कविता आंखें खोल देने वाली है. हर मिलने वाले के व्यवहार को बारीकी से देखने के लिए हमें सचेत करती है. अर्चना की कविताओं में स्त्री का स्वाभिमान है. उसकी महत्वकांक्षा और सिर उठाकर जीने की ललक 'मैं आ गई हूं' कविता में स्पष्ट रूप से छलकती है.

युवा रचनाकार अर्चना की कविताएं उनकी दूरदर्शिता को बयां करती हैं. समाज की कठवी सच्चाई को सामने लाना भी संभवत: सबके वश की बात नहीं किन्तु अर्चना इस दृष्णिकोण से भी अपने समकक्षों से आगे निकल रही हैं. उनकी यह विशेषता है कि मानव मन में गहराई तक उतर जाती हैं. उनकी कविताएं कहीं आक्रोश व्यक्त करती हैं और नई दिशा दिखाती हैं और कहीं विरोध का सामना डटकर करने को तैयार रहती हैं.

ऐसी ही कविताएं पाठकों को झकझोर देती हैं. हम कहीं उनके पात्रों में अपना ही अक्स पाते हैं तो कविता दिल के और करीब लगती है. 'स्त्री जागते रहो' कविता में मानवता के इसी भाव से स्त्री को सचेत रहने का संदेश दिया है ताकि इंसान रूपी भेड़ियों को स्त्रियां पहचानें और उनसे सावधान रहें. 'हासिल' कविता मार्मिक है कि कैसे कुछ इंसान रूपी गिद्ध स्त्री को मात्र भोग्या समझते हैं.

'क्यों लिखूं मैं शोक गीत' कविता में कवियित्री का गुस्सा फूटा है स्त्रियों पर जो जीते जी अच्छे और बुरे, अपने और पराये में फर्क ही नहीं कर पातीं. अर्चना की कविताओं में चली आ रही व्यवस्था को बदलने की बलवती आकांक्षा है और यही आकांक्षा कविताओं के रूप में छटपटाहट को व्यक्त करती है. अर्चना राजहंस का भले ही यह पहला कविता संग्रह है. पर भविष्य के लिए संभावनाएं बहुत हैं, अपेक्षाएं हैं उनसे. आगे आने वाले काव्य संग्रहों में वह और परिपक्व दिखाई देंगी.

 

Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay