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बुक रिव्यू: महारोग से जिंदगी की जीत है 'कैंसर से दो-दो हाथ'

हमारे घरों में ऐसा खौफ है कैंसर का कि उसका नाम नहीं लेते. उसके बारे में इशारों से बात करते हैं. वजह जानते हैं न आप?

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aajtak.in
आशुतोष उज्जवलनई दिल्ली, 28 September 2015
बुक रिव्यू: महारोग से जिंदगी की जीत है 'कैंसर से दो-दो हाथ' कैंसर से दो-दो हाथ का बुक कवर

बुक: कैंसर से दो-दो हाथ
लेखक: पुष्पपाल सिंह
पब्लिशर: हार्परकॉलिन्स पब्लिशर्स इंडिया
कीमत: 150 रुपये

एक दिन मेरी पत्नी फोन पर बात कर रही थी. फोन कॉल खत्म करके बेहद गमगीन स्वर में मुझे बताया कि हमारे नजदीकी रिश्तेदार का 'उस' बीमारी से निधन हो गया है.

हमारे घरों में ऐसा खौफ है कैंसर का कि उसका नाम नहीं लेते. उसके बारे में इशारों से बात करते हैं. यह त्रासदी ही ऐसी है. जिस रोज आदमी को रिपोर्ट से यह पता चलता है कि उसके परिवार में किसी को कैंसर है, बस मातम छा जाता है. उसकी मौत को निश्चित जान कर भी खुद को और उसको तमाम बहानों से संबल दिया जाता है. अब यह असाध्य बीमारी नहीं है, अच्छा इलाज होता है. बड़े बड़े अस्पताल हैं. ये सब बातें रोज क्षीण होते मनोबल को बांधने की नाकाम कोशिशें करती हैं. लेकिन सच ये है कि उल्टी गिनती शुरू होती है एक नामालूम तारीख की जिस दिन सब खत्म हो जाएगा. कैंसर से बच निकलने वाले लोग बहुत कम होते हैं.

इस बार एक लेखक ने कैंसर को झेला, उससे जंग लड़ी और जीते. सबसे अच्छी बात कि इस महारोग के पता लगने से लेकर बेहद तकलीफदेह इलाज से गुजरने और फिर कामयाब होने तक हर मूमेंट पर नजर रखी. फिर पूरे घटनाक्रम को करीने से आसान शब्दों में ढाल कर हर आमो खास के लिए पेश किया.

विख्यात साहित्यकार और आलोचक डॉक्टर पुष्पपाल सिंह ने जिंदगी के चौथेपन में कैंसर जैसी भयानक बीमारी झेली और उस दर्द, डर से भरे अनुभव को "कैंसर से दो-दो हाथ" नाम की किताब में पिरोया. दरअसल बीमारी और अस्पतालों की भाषा इतनी कठिन होती है कि उन पर बात करना ही नहीं चाहता. लेकिन इस किताब में बड़ी बीमारी की छोटी से छोटी बात को बड़े सरल अंदाज में साझा किया है.

बीमारी के वक्त रिश्तों में प्रेम और संवेदना, साथियों रिश्तेदारों की जरूरत, खर्चीली और दर्दनाक कीमोथेरेपी और बाकी इलाज की प्रक्रिया, अस्पताल में लापरवाहियां और दुश्वारियां, मौत को सामने देखते हुए खुद के अंदर घटते बढ़ते आत्म्विश्वास की भरी पूरी सच्ची दास्तान है ये किताब.

बीच बीच में अन्धविश्वास पर विश्वास की गैर जरूरी सलाहियत है लेकिन क्या पता मरीज को उसमें भी कुछ सुकून मिलता हो.

क्यों पढ़ें...
कैंसर और उसके इलाज के बारे में उससे बेहतर कोई क्या बताएगा जो खुद उससे गुजरा हो. मृत्यु की अनिश्चित निश्चितता को महसूस करने के लिए पढ़िए. हां, उस दौरान रिश्तों की बढ़ती जरूरत, पैसे की अनिवार्यता और बीमारी के कारण जड़ों समेत उखड़ कर दूसरी जगह रोपे जाने वाले बुजुर्ग दरख्त की मुश्किल महसूस करने के लिए भी.

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