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'लगा झूलनी का धक्का, बलम कलकत्ता चले गये'

गंदले पानी की इस महान धारा को न जाने कितनी कहानियां याद होंगी. परंतु मांएं तो जिनों, परियों, भूतों और डाकुओं की कहानियों में मगन हैं और गंगा के किनारे न जाने कब से मेल्हते हुए इस शहर को इसका ख्याल भी नहीं आता कि गंगा के पाठशाले में बैठकर अपने पुरखों की कहानियां सुनें.

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aajtak.in
नंदलाल शर्मानई दिल्ली, 15 March 2015
'लगा झूलनी का धक्का, बलम कलकत्ता चले गये' Rahi Masoon Raza

उर्दू कवि और पटकथा लेखक राही मासूम रज़ा की कलम गंगा-जमुनी तहजीब की पैरोकार रही. उनकी कलम सांप्रदायिकता के खिलाफ सामाजिक समरसता की मशाल थामे चलती रही. गंगा और गाजीपुर से विशेष लगाव रखने वाले राही मासूम रज़ा को महाभारत सीरियल से भी खूब पहचान मिली, इस सीरियल के संवाद उनकी ही कलम से निकले. महाभारत के दूसरे 'व्यास' रज़ा साहब का निधन 15 मार्च 1992 के रोज़ हुआ था.

रज़ा साहब ने गाजीपुर और अपने गांव को केंद्र में रखकर क्लासिक उपन्यास 'आधा गांव' लिखा, जो आजादी के बाद पैदा हुए हालात में सामाजिक सच्चाईयों को बयां करता है. अपने जीवन का एक लंबा समय मुंबई और अलीगढ़ में गुजारने वाले राही मासूम रज़ा 'आधा गांव' में गंगा किनारे बेरोजगार विचरण वाले युवाओं की दशा को बयान करते हुए लिखते हैं..

गाजीपुर के पुराने किले में अब एक स्कूल है, जहां गंगा की लहरों की आवाज तो आती, लेकिन इतिहास के गुनगुनाने या ठंडी सांसें लेने की आवाज नहीं आती. किले की दीवारों पर अब कोई पहरेदार नहीं घूमता, न ही उन तक कोई विद्यार्थी ही आता है, जो डूबते सूरज की रोशनी में चमचमाती हुई गंगा से कुछ कहे या सुने.

गंदले पानी की इस महान धारा को न जाने कितनी कहानियां याद होंगी. परंतु मांएं तो जिनों, परियों, भूतों और डाकुओं की कहानियों में मगन हैं और गंगा के किनारे न जाने कब से मेल्हते हुए इस शहर को इसका ख्याल भी नहीं आता कि गंगा के पाठशाले में बैठकर अपने पुरखों की कहानियां सुनें.

यह असंभव नहीं कि अगर अब भी इस किले की पुरानी दीवार पर कोई आ बैठे और अपनी आंखें बंद कर ले, तो उस पार के गांव और मैदान और खेत घने जंगलों में बदल जाएं और तपोवन में ऋषियों की कुटियां दिखाई देने लगें. और वह देखे कि अयोध्या के दो राजकुमार कंधे से कमानें लटकाये तपोवन के पवित्र सन्नाटे की रक्षा कर रहे हैं.

लेकिन इन दीवारों पर कोई बैठता ही नहीं. क्योंकि जब इन पर बैठने की उम्र आती है, तो गजभर की छातियों वाले बेरोजगारी के कोल्हू में जोत दिये जाते हैं कि वे अपने सपनों का तेल निकालें और उस जहर को पीकर चुपचाप मर जाएं.

लगा झूलनी का धक्का,
बलम कलकत्ता चले गये.

राही मासूम रज़ा ने उर्दू शायरी हो या नज्‍़म, फिल्म की कहानी हो या डायलॉग अपनी कलम से हर बार कलाम किया. पेश है उनकी नज़्म..

हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद
अपनी रात की छत पर, कितना तनहा होगा चांद

जिन आंखों में काजल बनकर, तेरी काली रात
उन आंखों में आंसू का इक, कतरा होगा चांद

रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर
आंगन वाले नीम में जाकर, अटका होगा चांद

चांद बिना हर दिन यूं बीता, जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा, कैसा होगा चांद

.. और अब जगजीत सिंह और चित्रा की अमर जुगलबंदी में सुनिए रज़ा साहब की कलम से बयां चांद की बेबसी

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