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जन्मदिन विशेष: फैज, चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

जेल की मजबूत दीवारें भी फैज के विचारों की धार कमजोर नहीं कर पाईं, बल्कि उनकी कविता पीड़ा और प्रताड़ना में और निखरती गई.

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aajtak.in [Edited By: स्नेहा]नई दिल्ली, 18 February 2015
जन्मदिन विशेष: फैज, चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले Faiz Ahmad Faiz

अवाम के शायर फैज अहमद फैज का नाम उर्दू कविता और शायरी में बड़े ही अदब से लिया जाता है. उनका जन्म 13 फरवरी 1911 को क़स्बा काला क़ादिर सियालकोट (पंजाब) में हुआ था. उनकी शायरी उर्दू के मशहूर शायरों मीर, ग़ालिब, इकबाल, जोश और फिराक की तरह भारत ही नहीं पूरी दुनिया में लोकप्रिय है.

उनकी प्रमुख कविता-संग्रह 'नक़्शे-फ़रियादी', 'दस्ते सबा', 'ज़िंदानामा', 'मिरे दिल मिरे मुसाफिर' हैं. वो खुद निर्भीकता, प्रगतिशीलता, देश-दुनिया में चलने वाले मामलों में हमेशा सजग रहे. भारत के विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए. जहां उन्हें हमेशा उनके बगावती लेखन के चलते गिरफ्तार करके जेल में रखा गया. मगर जेल की मजबूत दीवारें भी फैज के विचारों की धार कमजोर नहीं कर पाईं, बल्कि उनकी कविता पीड़ा और प्रताड़ना में और निखरती गई.

उनकी कुछ लोकप्रिय गीत, कविताएं और शायरी.....

1. बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़ुबां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक् तेरी है
देख के आहंगर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्फ़लों के दहाने
फैला हर एक ज़न्जीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बां की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहने है कह ले

2. हम मेहनत कश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेगे
हम मेहनत कश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेगे
हम मेहनत कश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेगे
एक खेत नहीं, एक देश नहीं
हम सारी दुनिया मांगेगे
हम सारी दुनिया मांगेगे

यहाँ पर्वत पर्वत हीरे हैं यहाँ सागर सागर मोती हैं
ये सारा माल हमारा है
ये सारा माल हमारा है
ये सारा माल हमारा है
हम सारा खज़ाना मांगेगे

हम मेहनत कश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेगे
हम मेहनत कश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेगे
एक खेत नहीं, एक देश नहीं
हम सारी दुनिया मांगेगे
हम सारी दुनिया मांगेगे

हमारे खून बहे जो बाग़ उजड़े
जो गीत दिलों में कत्ल हुए
हर कतरों का हर गुंचे का
हर गीत का बदला मांगेगे

हम मेहनत कश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेगे
हम मेहनत कश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेगे
एक खेत नहीं, एक देश नहीं
हम सारी दुनिया मांगेगे
हम सारी दुनिया मांगेगे

जब सब सीधा हो जायेगा
जब सब झगडे मिट जायेंगे
हम मेहनत से उपजायेंगे
हम मेहनत से उपजायेंगे
हम मेहनत से उपजायेंगे
बस बाँट बाँट कर खायेंगे

हम मेहनत कश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेगे
हम मेहनत कश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेगे
एक खेत नहीं, एक देश नहीं
हम सारी दुनिया मांगेगे
हम सारी दुनिया मांगेगे

3. दिल में अब यूँ तेरे भूले हुये ग़म आते हैं

दिल में अब यूँ तेरे भूले हुये ग़म आते हैं
जैसे बिछड़े हुये काबे में सनम आते हैं

इक इक कर के हुये जाते हैं तारे रौशन
मेरी मन्ज़िल की तरफ़ तेरे क़दम आते हैं

रक़्स-ए-मय तेज़ करो, साज़ की लय तेज़ करो
सू-ए-मैख़ाना सफ़ीरान-ए-हरम आते हैं

कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने का दिमाग
वो तो जब आते हैं माइल-ब-करम आते हैं

और कुछ देर न गुज़रे शब-ए-फ़ुर्क़त से कहो
दिल भी कम दुखता है वो याद भी कम आते हैं

4. वो लोग बहुत खुश-किस्मत थे
वो लोग बहुत खुश-किस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे

हम जीते जी मसरूफ रहे
कुछ इश्क़ किया, कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
फिर आखिर तंग आ कर हमने
दोनों को अधूरा छोड दिया


5. मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग
मैने समझा था कि तू है तो दरख़्शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया मे रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये
यूँ न था, मैने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

अनगिनत सदियों से तरीक़ बहीमाना तिलिस्म
रेशमो-अतलसो-किमख़्वाब में बुनवाये हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ए-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून मे नहलाये हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से

लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे

और भी दुख हैं ज़माने मे मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की रहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग

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