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मौत पर मुस्कुराते खुशवंत सिंह के जन्मदिन पर, कुछ किस्से, कुछ चुटकुले

खुशवंत सिंह अगर आज होते तो लाइफ की सेंचूरी मना रहे होते. लेकिन हमेशा स्थापित प्रतिमानों का उपहास उड़ाने वाले सिंह भला इसको तवज्जो कैसे देते. पिछले साल 99 साल की उम्र में जब उन्होंने दुनिया से रुखसत ली तो यह दुनिया थोड़ी कम रंगीन हो गई. दिल्ली के सबसे यारबाज और दिलफेंक बूढ़े के जाने से महफिलों में खामोशी छा गई.

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aajtak.in
आदर्श शुक्ला 02 February 2015
मौत पर मुस्कुराते खुशवंत सिंह के जन्मदिन पर, कुछ किस्से, कुछ चुटकुले

खुशवंत सिंह को तीन चीजों से बेहद प्यार था। पहला दिल्ली से, दूसरा लेखन से और तीसरा खूबसूरत महिलाओं से। और इसे उन्होंने बखूबी जिया। वह दिल्ली के कोने-कोने से वाकिफ थे। डेल्ही: अ नॉवल लिख कर उन्होंने दिल्ली से अपने प्यार का इजहार किया। अपने कॉलम में उन्होंने न जाने दिल्ली के कितने अनछुए, अनजान पहलुओं को छुआ। लेखन तो बिल्कुल आखिर में आकर ही उन्होंने छोड़ा। ट्रेन टू पाकिस्तान से उन्हें लेखक के तौर पर पहचान मिली। उस पहचान को अ हिस्ट्री ऑफ द सिख्स ने आगे बढ़ाया। पिछले साल ही उनकी एक और किताब आई, द गुड, द बैड ऐंड द रिडिकुलस। उसके बाद उन्होंने घोषणा की कि अब और नहीं लिखेंगे। हालांकि उनका आखिरी कॉलम एक महीने पहले ही आया था। और खूबसूरत महिलाएं आखिरी दौर तक उनसे मिलने जाती रहीं। खुशवंत सिंह महज लेखक ही नहीं थे। वह महान संपादक भी थे। सरकारी पत्रिका योजना को नया अंदाज उन्होंने ही दिया था। द इलस्ट्रेटेड वीकली को एक अलग पहचान दी थी। हिन्दुस्तान टाइम्स की संपादकी भी उन्होंने की थी। वह हमारे अलग तरह के पुरखे थे। अपने ही सांचे में ढले हुए। - See more at: http://www.livehindustan.com/news/lifestyle/guestcolumn/article1-story-58-62-409283.html#sthash.Zn09VXLy.dpuf
खुशवंत सिंह को तीन चीजों से बेहद प्यार था। पहला दिल्ली से, दूसरा लेखन से और तीसरा खूबसूरत महिलाओं से। और इसे उन्होंने बखूबी जिया। वह दिल्ली के कोने-कोने से वाकिफ थे। डेल्ही: अ नॉवल लिख कर उन्होंने दिल्ली से अपने प्यार का इजहार किया। अपने कॉलम में उन्होंने न जाने दिल्ली के कितने अनछुए, अनजान पहलुओं को छुआ। लेखन तो बिल्कुल आखिर में आकर ही उन्होंने छोड़ा। ट्रेन टू पाकिस्तान से उन्हें लेखक के तौर पर पहचान मिली। उस पहचान को अ हिस्ट्री ऑफ द सिख्स ने आगे बढ़ाया। पिछले साल ही उनकी एक और किताब आई, द गुड, द बैड ऐंड द रिडिकुलस। उसके बाद उन्होंने घोषणा की कि अब और नहीं लिखेंगे। हालांकि उनका आखिरी कॉलम एक महीने पहले ही आया था। और खूबसूरत महिलाएं आखिरी दौर तक उनसे मिलने जाती रहीं। खुशवंत सिंह महज लेखक ही नहीं थे। वह महान संपादक भी थे। सरकारी पत्रिका योजना को नया अंदाज उन्होंने ही दिया था। द इलस्ट्रेटेड वीकली को एक अलग पहचान दी थी। हिन्दुस्तान टाइम्स की संपादकी भी उन्होंने की थी। वह हमारे अलग तरह के पुरखे थे। अपने ही सांचे में ढले हुए। - See more at: http://www.livehindustan.com/news/lifestyle/guestcolumn/article1-story-58-62-409283.html#sthash.Zn09VXLy.dpufखुशवंत सिंह को तीन चीजों से बेहद प्यार था। पहला दिल्ली से, दूसरा लेखन से और तीसरा खूबसूरत महिलाओं से। और इसे उन्होंने बखूबी जिया। वह दिल्ली के कोने-कोने से वाकिफ थे। डेल्ही: अ नॉवल लिख कर उन्होंने दिल्ली से अपने प्यार का इजहार किया। अपने कॉलम में उन्होंने न जाने दिल्ली के कितने अनछुए, अनजान पहलुओं को छुआ। लेखन तो बिल्कुल आखिर में आकर ही उन्होंने छोड़ा। ट्रेन टू पाकिस्तान से उन्हें लेखक के तौर पर पहचान मिली। उस पहचान को अ हिस्ट्री ऑफ द सिख्स ने आगे बढ़ाया। पिछले साल ही उनकी एक और किताब आई, द गुड, द बैड ऐंड द रिडिकुलस। उसके बाद उन्होंने घोषणा की कि अब और नहीं लिखेंगे। हालांकि उनका आखिरी कॉलम एक महीने पहले ही आया था। और खूबसूरत महिलाएं आखिरी दौर तक उनसे मिलने जाती रहीं। खुशवंत सिंह महज लेखक ही नहीं थे। वह महान संपादक भी थे। सरकारी पत्रिका योजना को नया अंदाज उन्होंने ही दिया था। द इलस्ट्रेटेड वीकली को एक अलग पहचान दी थी। हिन्दुस्तान टाइम्स की संपादकी भी उन्होंने की थी। वह हमारे अलग तरह के पुरखे थे। अपने ही सांचे में ढले हुए
खुशवंत सिंह अगर आज होते तो लाइफ की सेंचूरी मना रहे होते. लेकिन हमेशा स्थापित प्रतिमानों का उपहास उड़ाने वाले सिंह भला इसको तवज्जो कैसे देते. पिछले साल 99 साल की उम्र में जब उन्होंने दुनिया से रुखसत ली तो यह दुनिया थोड़ी कम रंगीन हो गई. दिल्ली के सबसे यारबाज और दिलफेंक बूढ़े के जाने से महफिलों में खामोशी छा गई.

जिंदगी को जश्न के रूप में गुजारने वाले खुशवंत को याद करते हुए गमजदा होना उनकी शान में गुस्ताखी है. खुशवंत को तीन चीजों से बेहद प्यार था. पहला दिल्ली से, दूसरा लेखन से और तीसरा खूबसूरत महिलाओं से. और इसे उन्होंने बखूबी जिया. वह दिल्ली के कोने-कोने से वाकिफ थे. 'डेल्ही: अ नॉवल' लिख कर उन्होंने दिल्ली से अपने प्यार का इजहार किया. अपने कॉलम में उन्होंने न जाने दिल्ली के कितने अनछुए, अनजान पहलुओं को छुआ.

वो ताउम्र लिखते रहे. 'ट्रेन टू पाकिस्तान' से उन्हें लेखक के तौर पर पहचान मिली. उस पहचान को 'अ हिस्ट्री ऑफ द सिख्स' ने आगे बढ़ाया. उनकी आखिरी किताब मौत से एक साल पहले आई. 'द गुड, द बैड ऐंड द रिडिकुलस' उसके बाद उन्होंने घोषणा की कि अब और नहीं लिखेंगे. हालांकि उनका आखिरी कॉलम मौत से एक महीने पहले ही आया था. खूबसूरत महिलाएं आखिरी दौर तक उनसे मिलने जाती रहीं.

खुशवंत सिंह महज लेखक ही नहीं थे. वह महान संपादक भी थे. सरकारी पत्रिका 'योजना' को नया अंदाज उन्होंने ही दिया था. 'द इलस्ट्रेटेड वीकली' को एक अलग पहचान दी थी. 'हिन्दुस्तान टाइम्स' की संपादकी भी उन्होंने की थी. वह हमारे अलग तरह के पुरखे थे बिल्कुल अपनी तरह के अनूठे. खुशवंत सिंह के कुछ चुटकुलों से उनकी शख्सियत का अंदाजा लगाइए.


1. बैग में कितनी मुर्गियां हैं?
एक बार संता और बंता अचानक गांव की एक सड़क पर मिले. संता के कंधे पर एक बड़ा सा बैग था.
बंता: तुम्हारे बैग में क्या है?
संता: कुछ नहीं, मुर्गियां हैं
बंता: अच्छा, अगर मैंने ये ठीक-ठीक अंदाजा लगा लिया कि बैग में कितनी मुर्गियां हैं तो क्या तुम वे मुर्गियां मुझे दे दोगे.
संता: ठीक है तुम दोनों ले लेना.
बंता: अममम.. पांच?

2. लाला गरीबचंद एक अमीर जमींदार थे. एक दिन उन्होंने अपने मुनीम को बुलाया और कहा, 'सारा हिसाब-किताब लगाओ और बताओ कि मेरी संपत्ति कितनी है और कितने साल तक चलेगी?
मुनीम ने सारी गिनती की और कहा: साहब आपके पास इतना पैसा है कि आपकी सात पुश्तें आराम से खाएंगीं.
लाला गरीबचंद खुश होने के बजाए दुखी होकर बोला: हाए मेरी आठवीं पुश्त का क्या होगा

3. संता बंता से: मैंने एक ऐसा कंप्यूटर बनाया है जो बिल्कुल इंसानों की तरह व्यवहार करता है.
बंता: वो कैसे?
संता: जैसे ही ये कोई गलती करता है इल्जाम दूसरे कंप्यूटर पर लगाता है

4. एक दिन संता खाना-खाने एक चीप रेस्टोरेंट में गया. उसने वहां देखा कि बंता वहीं काम कर रहा है. वो बंता के पास गया और बोला, तुम्हें शर्म नहीं आती कि तुम ऐसे चीप होटल में काम करते हो.
बंता: नहीं, क्योंकि मैं तुम्हारी तरह ऐसे चीप होटल में खाना नहीं खाता.

5. एक बार एक ब्रिटिश, अमेरिकन और संता एक झूठ बोलने वाली मशीन को टेस्ट कर रहे थे
ब्रिटिश: आई थिंक कि मैं एक बार में बीयर की 20 बोतल खाली कर सकता हूं.
buzzzzz मशीन चिल्लाई
अमेरिकन: आई थिंक मैं एक बार में 25 हैमबर्गर खा सकता हूं. buzzzz मशीन चिल्लाई.
संता: आई थिंक...!!!
और मशीन चिल्लाने लगी buzzzz buzzz buzz

6. संता ने देखा कि बंता बहुत उदास बैठा था
संता: क्या हुआ बंता बड़ा उदास दिख रहा है
बंता: यार कल मैंने इंडिया के जीतने पर सट्टा लगाया और 800 रुपए हार गया
संता: ओह किस पर शर्त लगाई थी?
बंता: 500 रुपए की, इंडिया पर.
संता: अरे पर तू 800 कैसे हार गया?
बंता: मैंने क्रिकेट की हाइलाइट्स पर भी शर्त लगाई थी.

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