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विधानसभा चुनाव: उत्तर प्रदेश में बदलाव की बेताबी

अनुभव और युवावस्था के उत्साह के मेल के साथ मुलायम और पुत्र अखिलेश की जोड़ी मायावती से मुकाबले की तैयारी कर रही है.

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प्रिया सहगललखनऊ, 16 December 2011
विधानसभा चुनाव: उत्तर प्रदेश में बदलाव की बेताबी पूर्वी यूपी की एक रैली में बसपा समर्थक

सन्‌ 1989 में मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री बनने पर उनकी मां से एक पत्रकार ने घिसा पिटा-सा सवाल पूछा था, ''आपको कैसा लग रहा है?'' इस पर नाक-भौं सिकोड़कर कुछ चिढ़ते हुए उन्होंने जवाब दिया था, ''कलेक्टर थोड़े ना बन गया है.'' यह लगभग दो दशक पुरानी बात है. तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके यादव बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती से अपनी कुर्सी वापस पाने की जीतोड़ कोशिशें कर रहे हैं. केंद्र और राज्य दोनों की सत्ता से बेदखल हो चुके 72 वर्षीय मुलायम का यह उस सारे नुक्सान की भरपाई का शायद आखिरी प्रयास हो. जनमत संग्रह को सही माना जाए तो इस लड़ाई में उनकी संभावनाएं खराब नहीं हैं.

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चाहे वह उत्तर-पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुलायम का गृह नगर इटावा हो या फिर पूर्वी उत्तर प्रदेश में मायावती के दबदबे वाला आंबेडकर नगर, मतदान करने के मापदंड एक जैसे ही हैं. विकास और रोजगार प्रमुख मुद्दे हैं. आंबेडकर नगर के किराना व्यवसायी अंगद पटेल कहते हैं, ''मायावती ने किसानों के लिए कुछ नहीं किया.'' वे ध्यान दिलाते हैं कि जब मुलायम सत्ता में थे तो उद्योग और कृषि क्षेत्र दोनों को ही बढ़ावा मिला था. ''लेकिन,'' वे आगे कहते हैं, ''तब गुंडागर्दी भी ज्यादा थी.''

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कुल मिलाकर यह उत्तर प्रदेश के लोगों के सामने मौजूद विकल्पों की एक बानगी है. अगर वे मुलायम को चुनते हैं, जो कि विकास के पैरोकार हैं, तो उन्हें बदले में कानून-व्यवस्था के बिगड़ने का जोखिम भी उठाना होगा. मुलायम के बेटे अखिलेश यादव ने इंडिया टुडे से कहा, ''गुंडागर्दी का नामोनिशान नहीं रहेगा.'' मैं खुद भी उस कमेटी का हिस्सा रहूंगा, जिसके पास गुंडागर्दी की शिकायतें की जा सकेंगी.'' उन्होंने आगे कहा, ''आप हमें एसएमएस या ईमेल कर सकते हैं या व्यक्तिगत तौर पर मिल सकते हैं.''

यह है समाजवादी पार्टी (सपा) का नया चेहरा. मुलायम जहां अपनी बीमारी से उबर रहे हैं, वहीं उनके बेटे अखिलेश आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर समाजवादी पार्टी के स्टार प्रचारक के रूप में उभरे हैं. अखिलेश ने तो पार्टी के चुनाव चिन्ह साइकिल का प्रचार करने के लिए 250 किमी लंबी साइकिल यात्रा भी की है.

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यह एक तरह का पैकेज डील है, जिसमें पिता के पास अनुभव का खजाना है और बेटा बदलाव का वादा कर रहा है. मुलायम के प्रचार शुरू करने से पहले ही 38 वर्षीय अखिलेश 132 चुनाव क्षेत्रों में अपनी क्रांति रथ यात्रा के सात चरण पूरे कर चुके हैं. मायावती से जहां मुलायम टक्कर ले रहे हैं वहीं उनका बेटा-जो कि सिडनी युनिवर्सिटी से इन्वायरमेंटल इंजीनियरिंग में स्नातक है-राहुल गांधी की युवा अपील का तोड़ है. अपनी रथ यात्रा में उमड़ी भीड़ को देख खुद युवा यादव भी चकित हैं. समाजवादी पार्टी का एक कार्यकर्ता कहता है, ''मुझे याद है जब वे कानपुर आए थे और सर्किट हाउस में दोपहर के वक्त झ्पकी लेना चाह रहे थे. उन्होंने सोचा था कि शहर पार करने में घंटा भर लगेगा लेकिन वे वहां शाम ढलने पर पहुंच पाए.''

अफवाहों के बाजार में चर्चा गरम थी कि पार्टी से अमर सिंह की रवानगी हो जाने के कारण मुलायम के उद्योगपतियों से संबंध टूट चुके हैं, जिसका मुंह तोड़ जवाब सपा नेता ने हाल ही में अपने छोटे बेटे की शादी में दिया. देश के प्रमुख उद्योगपति अनिल अंबानी और सहारा इंडिया के प्रमुख सुब्रत रॉय जैसे उद्योगपति भी इस विवाह समारोह में शरीक होने विशेष रूप से सैफई आए. उनके हर कार्यक्रम में मौजूद रहने वाले अमिताभ बच्चन पत्नी जया बच्चन सहित यहां मौजूद थे.

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मुलायम अपनी सियासी कूटनीति के तहत पुराने रूठे साथियों तक भी पहुंचे. वे रूठे हुए आजम खान को सपा में वापस ले आए. पिछले चुनावों में सपा प्रमुख ने भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को पार्टी में शामिल कर मुस्लिम वोट बैंक को नाराज कर दिया था.

किसी भी चुनाव में विकास और रोजगार प्रमुख कारक होते हैं. इन मामलों में तो प्रदेश की मुखिया मायावती का ट्रैक रिकॉर्ड सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में होगा. विडंबना ही कहेंगे कि लखनऊ के आंबेडकर जयंती उद्यानों में झ्लिमिलाती रोशनियां रात भर चालू रहती हैं जबकि आंबेडकर नगर, जो कि मायावती का गढ़ माना जाता है, सहित बाकी का पूरा यूपी 12-14 घंटे की बिजली कटौती का संकट झेलता है.

मायावती ने 2007-जब वे मुख्यमंत्री बनीं-में विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा था बल्कि विधान परिषद के पिछले दरवाजे के रास्ते विधायक बनकर आई थीं. उन्होंने गरजते हुए घोषणा की थी, ''मुख्यमंत्री होने के नाते पूरा उत्तर प्रदेश मेरा विधानसभा क्षेत्र है.'' लेकिन आंबेडकर नगर के लोग अपनी मुख्यमंत्री से विशेष जुड़ाव महसूस करते हैं. उन्होंने 1995 में अकबरपुर का नाम बदलकर आंबेडकर नगर कर दिया था और इसे जिले का दर्जा प्रदान किया था. यहां से उन्होंने तीन बार लोकसभा का चुनाव भी लड़ा है.

लेकिन अब आंबेडकर नगर के लोगों को लगने लगा है कि उनकी संरक्षक ने उनकी उम्मीदों को पूरा नहीं किया है. इस चुनाव क्षेत्र में चीनी मिलों से लेकर सीमेंट फैक्टरी तक यहां के ज्यादातर उद्योग मुलायम के समय के लगाए हुए हैं. स्थानीय लोग अब भी कहते हैं कि जब मुलायम सत्ता में थे तो प्रदेश में गन्ने की पैदावार रिकॉर्ड ऊंचाई पर जा पहुंची थी.

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फिलहाल इस जिले के सभी पांच विधायक बसपा से हैं. इनमें से तीन कैबिनेट मंत्री हैं. आंबेडकर नगर के एक सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप पांडे कहते हैं, ''हमारा विश्वास डगमगा गया है. यहां विकास की गंगा होनी चाहिए.'' वे आगे कहते हैं, ''मायावती इसे उतना महत्व नहीं देतीं जितना कि सोनिया गांधी अपने गढ़ रायबरेली को देती हैं.'' आंबेडकर नगर से लखनऊ के बीच की सड़क पर मायावती की छाप साफ दिखती है. गोरखपुर तक डामर की अच्छी सड़क बनी हुई है लेकिन इसके बाद यह टूट-फूट कर कच्चे रास्ते में तब्दील हो गई है. ऐसा इसलिए क्योंकि शुरुआती आधी सड़क केंद्रीय योजना का हिस्सा है और इसे पूर्व केंद्रीय सड़क मंत्री आरपीएन सिंह ने बनवाया था, जिनका निर्वाचन क्षेत्र पड़रौना नजदीक ही है. विकास के भी अपने सियासी अर्थ होते हैं.

मुलायम सिंह के गढ़ इटावा में भी सड़कें इतनी ही ऊबड़-खाबड़ हैं. हालांकि उनके गांव सैफई, जो कि इटावा से 20 किमी की दूरी पर है, में आमूल-चूल परिर्वतन देखा जा सकता है. यहां कच्ची सड़कों के किनारे खूबसूरती के साथ डिजाइन की गई इमारतों का अनूठा मेल देखने को मिलता है. गांव का प्रमुख आकर्षण है रूरल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस. इसमें 700 बिस्तरों वाला अस्पताल और 500 छात्र हैं. यहां कम पैसों में स्वास्थ्य देखभाल की सुविधा उपलब्ध है. पूरे उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि मध्य प्रदेश और बिहार से भी मरीज और छात्र यहां आते हैं.

नजदीक के मैनपुरी जिले की सावित्री देवी कहती हैं, ''सुविधा यहीं है.'' स्थानीय लोगों की मानें तो इटावा में स्वास्थ्य सुविधा मौजूद नहीं होने के कारण मुलायम के लीवर सिरोसिस से पीड़ित एक भतीजे की आगरा ले जाते वक्त मौत हो गई थी, इसके बाद मुलायम ने यह अस्पताल खुलवाया. मुलायम ने 220 किलोवाट का बिजलीघर भी स्थापित किया था जिसके चलते 4,000 की जनसंख्या वाले सैफई में तो कम-से-कम लगातार बिजली सप्लाई होती है.

मुलायम के गृह क्षेत्र के विकास में खेलों के प्रति उनके प्रेम का भी योगदान है. यहां बाहर गायें चरती हैं तो दूसरी ओर एस्बेस्टस की बाड़ वाले हॉकी स्टेडियम के भीतर राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी प्रशिक्षण ले रहे होते हैं. वैसे तो इसका प्रबंधन भारतीय खेल प्राधिकरण करता है लेकिन स्टेडियम को यहां लाने का श्रेय मुलायम को ही जाता है. यहां 400 मीटर का ओलंपिक आकार का रेस ट्रैक भी है, जिस पर बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड से आए खिलाड़ी हुनर को निखारते हैं. वाइ.पी. सिंह कहते हैं, ''यहां जंगल में कौन पूछ रहा था खेलों को, सिवाए नेताजी के.'' मुलायम पेशेवर पहलवान हैं जबकि अखिलेश फुटबॉल खेलते हैं और कई बार उन्हें रेस ट्रैक पर दौड़ लगाते भी देखा जा सकता है.

छात्र सैफई में सुरक्षित महसूस करते हैं. गांव की चौहद्दी से बाहर निकलने का जोखिम कम ही लोग उठाते हैं. सेकेंड ईयर की एक छात्रा, इलाहाबाद की जोहा दीबा खान कहती हैं, ''इटावा में सिनेमाहाल भी हैं लेकिन वहां हम सुरक्षित महसूस नहीं करते. सैफई कहीं ज्यादा सुरक्षित है.'' इटावा के रहने वाले 34 वर्षीय शिखर दुबे कहते हैं, ''कानून-व्यवस्था की समस्या तो है ही.'' अपनी बात की पुष्टि वे एक दिलचस्प उदाहरण के साथ करते हैं, ''वेर्ना और स्कॉर्पियो दोनों गाड़ियों की कीमत लगभग बराबर है. लेकिन वेर्ना जैसी फैंसी कार खरीदने पर आप गुंडों का आसान निशाना होते हैं.

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स्कॉर्पियो या बोलेरो जैसी एसयूवी गाड़ियां उनका ध्यान आकर्षित नहीं करतीं क्योंकि उन्हें तो यहां की सड़कों के लिए जरूरी माना जाता है.'' हालांकि शिखर ने शुरुआती स्कूली पढ़ाई से लेकर ग्रेजुएशन तक इटावा से ही किया है लेकिन मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने के लिए उन्हें दिल्ली में नौकरी खोजनी पड़ी और इसका कारण था गृह नगर में अवसरों की कमी. यही कहानी आंबेडकर नगर और बाकी के ग्रामीण उत्तर प्रदेश की है. आंबेडकर नगर के साइकोलॉजी के स्टुडेंट 28 साल के अमित कुमार कहते हैं, ''यहां प्राइवेट कंपनियां हैं ही नहीं. और सरकारी नौकरियों में आरक्षण है.''

बसपा और सपा दोनों ही से मतदाताओं का मोहभंग हो चुका है. लेकिन भाजपा और कांग्रेस दोनों ही कोई विश्वसनीय विकल्प पेश नहीं कर पा रहीं. मतदाताओं को लगता है कि मायावती को हराने के लिए उनके पास श्रेष्ठ विकल्प मुलायम ही हैं. पर समस्या यह है कि उन्हें मुलायम भी पसंद नहीं. एलएलबी स्टुडेंट विवेक सिंह कहते हैं, ''दोनों ही जनता की भावनाओं से खेलते हैं.'' पर दिक्कत यह है कि नेताओं की तरह जनता भी अपनी बात से पलट सकती है. 

क्या बसपा सरकार ने सरकारी नौकरियां देते वक्त गैर-दलितों के साथ भेदभाव किया है?

हां                  66

नहीं               29

नहीं जानते/कह नहीं सकते. आंकड़े प्रतिशत में

राज्य में कौन-सी पार्टी मुसलमानों के हितों का सबसे अच्छे ढंग से संरक्षण करती है?

सपा              47

बसपा            23

कांग्रेस           23

भाजपा            3

अन्य               1

बाकीः नहीं जानते/कह नहीं सकते. आंकड़े फीसद में

उम्मीदवार की जाति ज्यादा अहमियत रखती है या फिर योग्यता?

योग्यता         88

जाति               7

नहीं जानते/कह नहीं सकते. आंकड़े प्रतिशत में

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