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शौकीनों के बुरे दिन आ गए

उफ्फ ! अब दस बस नहीं है. सलमान खान तुमने क्या सोचकर ये बात कही थी. तुम तो कहकर निकल लिए. लेकिन तुम्हारे कहने के बाद राष्ट्रीय तौर पर जिन लौंडों और अंकलों ने दस का नोट जेब में होने पर खुद को विजय माल्या की बुआ का लड़का समझना शुरू किया था, अब उनका क्या होगा.
शौकीनों के बुरे दिन आ गए
विकास त्रिवेदीनई दिल्ली, 10 July 2014

उफ्फ ! अब दस, बस नहीं है. सलमान खान तुमने क्या सोचकर ये बात कही थी. तुम तो कहकर निकल लिए. लेकिन तुम्हारे कहने के बाद राष्ट्रीय तौर पर जिन लौंडों और अंकलों ने दस का नोट जेब में होने पर खुद को विजय माल्या की बुआ का लड़का समझना शुरू किया था, अब उनका क्या होगा?

खैर गलती तुम्हारी भी नहीं है. गलती अगर है तो वो सिर्फ एक की. इस जालिम जुबान की. जुबान भी ऐसी जो वाई-फाई के जरिए स्टाइल से जुड़ी हुई है. ये स्टाइल और जुबान की लगन का ही तो नतीजा है कि अब तक हम बेफिक्री में डूबकर कोल्ड ड्रिंक, सिगरेट, तंबाकू धड़ल्ले से अपने लबों से लगा लिया करते थे.

पर आज जब इस बजट में ये स्टाइलिश नशा सपरिवार महंगा हो गया है. तो मैं तुम्हारा दर्द समझ सकता हूं. अब तक तो जेब में पड़ी चंद चिल्लर हाथों में सिगरेट को सुशोभित करने के लिए काफी होती थी. क्या स्टाइल मारते थे तुम कॉलेज में, ऑफिस कैंटीन में.

भैया अब क्या होगा. ये सोच-सोचकर जिन लोगों के मुंह में चैनी खैनी होगी. उनका भी चैन और करार जरूर छिन रहा होगा. चैन छिनना लाजिमी भी है. अब सिगरेट के धुएं का छल्ला कैसे बनेगा. वाया चैनी खैनी चैन से मजा कैसे लिया जाएगा. ये सवाल उठना लाजिमी है. अब तक तो हमने सिर्फ वही विज्ञापन देखे जो इस बात की इजाजत दें कि शौक बड़ी चीज है. सिनेमाहॉल में बैठकर 'मुकेश हरारे और टार इतना टार' विज्ञापन देखते वक्त तो मोबाइल पर वाचिंग फलाना-फलाना का स्टेट्स डालना होता था.

बुरा ना मानना लेकिन तुम्हारे अच्छे दिन तो आने से रहे. हर साल की तरह इस साल भी जुल्म के शिकार तुम ही लोग हुए हो. यार एक काम कर लो. किसी भी कंपट टाइप अखबार में एक विज्ञापन देकर तुम अपनी यूनियन बना लो. यूनियन का नाम रखना- 'खाएं पिएं मरें- तुम्हें क्या यूनियन'. अपनी यूनियन लेकर इकट्ठा होकर घेराव कर दो किसी तंबाकू, सिगरेट, ठंडा बेचने वाली कंपनी का. साफ लफ्जों में... हालांकि मुंह में तो गुटखा टाइप कुछ भरा होगा तो साफ-साफ तो बोल ना पाओगे. फिर भी बोल देना कि हर बार सिगरेट, तंबाकू के शौकीन लोगों के साथ ही उत्पीड़न क्यों किया जाता है. कड़े शब्द अगर मुंह से निकल पावैं तो कड़े शब्दों में विरोध कर देना.

वैसे भाई लोगों आप लोगों के लिए एक विकल्प है. अगर महंगाई के चलते तुम लोग जुबान पर काबू ना कर पाओ तो बाबा रामदेव का रुख कर लेना. सुना है कि बाबा ने अरसा पहले कोल्ड ड्रिंक, सिगरेट, तंबाकू को खतरा बताया था. खतरे के साथ उन्होंने कुछ उपाय भी बताया था. तो बस उनके कारखाने से कोई जड़ी-बूटी बनवाकर सेवन चालू करें. वो कहते हैं शर्तिया लाभ मिलेगा.

अब कोल्ड ड्रिंक वालों तुम आओ. बोतल का दाम गर्दन पर होता है. पर बजट के जरिए तुम लोगों की गर्दन पर जो 'और पैसे दे बे' का टैग लगाया गया है, तुम इसके विरोध में सस्ती वाली रूह-अफजा की बोतल ले लो. और फ्रिजर से बर्फ निकालकर घोल घोल पियो. बजट के नियमों के मुताबिक, अब तुमसे ना हो पाएगा. दीपिका, रणबीर, सलमान को देखकर कब तक ढक्कन खोलते रहोगे बे. स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हैं. और शौक के मामले में एकदम नीरस है. जब कंडोम और सेक्स पर उनके विचार इतने अद्भुत हैं तो समझ लो. सरकार अभी-अभी बनी है. सरकार इतने बजट ठोकेगी कि कन्फ्यूज हो जाओगे कि आग सिगरेट में लगाई थी और धुंआ कहां से आ रहा है. बाकी अपना ख्याल रखना. घर पर आपका कोई इंतजार कर रहा है और जूते सस्ते हो गए हैं.

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