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OPINION: मैं और मेरा यूपीए, चिदंबरम का बजट गान

वित्त मंत्री चिदंबरम ने अंतरिम बजट को अपनी और यूपीए की तथाकथित उपलब्धियों के बखान के लिए बहुत अच्छी तरह इस्तेमाल किया, भले ही यह बात आलोचकों के गले से नहीं उतरी होगी.

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मधुरेन्द्र सिन्हा[Edited By: प्रवीण]नई दिल्‍ली, 17 February 2014
OPINION: मैं और मेरा यूपीए, चिदंबरम का बजट गान वित्त मंत्री पी चिदंबरम

वित्त मंत्री चिदंबरम ने अंतरिम बजट को अपनी और यूपीए की तथाकथित उपलब्धियों के बखान के लिए बहुत अच्छी तरह इस्तेमाल किया, भले ही यह बात आलोचकों के गले से नहीं उतरी होगी.

अब तक अंतरिम बजट भाषण बहुत छोटा और सीमित उद्देश्यों के लिए ही होता था लेकिन चिदंबरम ने परंपराओं को दरकिनार रखते हुए एक आर्थिक-सामाजिक भाषण दिया जिसके माध्यम से उन्होंने अपनी पार्टी के लिए एक बेहतर ताना-बाना बुनने की कोशिश तो की ही, विपक्षियों पर भी करारा हमला बोला. इसके लिए उन्होंने आंकड़ों का खूब सहारा लिया और उनके साथ खूब खेले भी.

उन्होंने गुलाबी भविष्य के सपने भी दिखाए जिससे वे आने वाले समय में चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर सकें. उन्होंने जीडीपी विकास दर के बारे में ऐसे संभावित आंकड़े पेश किए जो वर्तमान हालात में शायद ही पूरे हो सकें.

यह बजट भाषण शुरू से अंत तक अपनी उन उप्लब्धियों के बखान से भरा पड़ा था जो दरअसल कागजी ही हैं और उनका यथार्थ से कोई साबिका नहीं है. उन्होंने तो मंहगाई के कम होने के लिए अपनी पीठ थपथपा ली जबकि सारा देश जानता है कि इस मोर्चे पर यूपीए सरकार बुरी तरह असफल रही और आम जनता ने अभूतपूर्व महंगाई झेली.

वित्त मंत्री ने इसके माध्यम से समाज के हर वर्ग के लोगों को थोड़ा-थोड़ा खुश करने की कोशिश की. मसलन उन्होंने छात्रों के लिए एजुकेशन लोन में ब्याज की छूट देने की बात कही, उन्होंने सैनिकों को खुश करने की एक रैंक-एक पेंशन का भी प्रावधान किया, किसानों के कर्ज में छूट जारी रखने की बात कही, महिलाओं की सुरक्षा की बात की, दस लाख लोगों को रोजगार देने की बात की, अनुसूचित वर्ग के लिए और धन के प्रावधान की बात कही और खाद्य सुरक्षा की भी चर्चा की.

उन्होंने अपनी सरकार की उपलब्धियों के पुल बांधे और ऐसे दावे किए जिन पर यकीन करना आज के हालात में मुश्किल है. इतना ही नहीं उन्होंने देश की खराब आर्थिक स्थिति पर पर्दा डालने के लिए यह भी कहा कि दूसरे देशों की तुलना में भारत के हालात बेहतर हैं. ऐसा बयान कोई राजनीतिज्ञ ही दे सकता है, अर्थशास्त्री नहीं. उनका यह कहना कि विकास के मामले में यूपीए का जवाब नहीं, इस बात को इंगित करता है कि इस अवसर का उन्होंने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया लेकिन यह भी तय है कि ऐसा कुछ होने वाला नहीं है.

सच तो यह है कि उन्होंने जनता की तकलीफों को पूरी तरह से नज़रअंदाज किया और अपनी और पार्टी की तथाकथित उपलब्धियों के बेसुरे गीत गाए. उन्होंने बजट भाषण के नाम पर वोट की राजनीति करने की पूरी कोशिश की. चिदंबरम का यह एक ऐसा बजट भाषण था जिसे शायद ही कभी याद किया जाएगा और अगर किया भी गया तो सिर्फ इसलिए कि इसमें आंकड़ों का झूठ था.

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