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अमेरिका के लिए चीन को झटका दे रहा पाकिस्तान, रेंग रहीं चीनी परियोजनाएं

aajtak.in
10 September 2019
अमेरिका के लिए चीन को झटका दे रहा पाकिस्तान, रेंग रहीं चीनी परियोजनाएं
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आर्थिक संकट का सामना कर रहे पाकिस्तान ने चीन की अरबों डॉलर की महत्वाकांक्षी बेल्ट ऐंड रोड (बीआरआई) के तहत चल रहीं परियोजनाओं की रफ्तार धीमी कर दी है.

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चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर यानी सीपीईसी की नींव साल 2014 में रखी गई थी जिसके तहत चीन के शिनजियांग प्रांत से दक्षिणी पाकिस्तान के ग्वादर शहर को जोड़ा जाना था. अनुमान के मुताबिक, इस परियोजना की कुल लागत 60 अरब डॉलर है.
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पाकिस्तान सरकार में सीपीईसी प्रोजेक्ट डायरेक्टर हसन बट के मुताबिक, ग्वादर बंदरगाह का विकास, पावर प्लांट्स, सड़क निर्माण समेत पहले चरण की कई परियोजनाएं अभी तक अधूरी पड़ी हैं जबकि इनके लिए इसी साल की डेडलाइन रखी गई थी. दूसरे चरण की परियोजनाओं में भी कोई प्रगति नहीं हो रही हैं जिसमें विशेष आर्थिक क्षेत्र व औद्योगिक ढांचा बनाया जाना था.
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सीपीईसी की धीमी रफ्तार के पीछे पाकिस्तान कोई वजह नहीं बता रहा है. हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि सरकार ने जान-बूझकर परियोजनाओं की रफ्तार सुस्त कर दी है.

सिंध की प्रांतीय सरकार के पूर्व सलाहकार और जाने-माने अर्थशास्त्री कैसर बंगाली कहते हैं, चीन की इन योजनाओं पर कोई प्रगति नहीं हो सकती है. यहां तक कि बीजिंग को भी पता है कि फिलहाल सीपीईसी को होल्ड पर रखा गया है. यूएस नहीं चाहता है कि पाकिस्तान पर चीन का प्रभाव बढ़ता जाए...इसलिए हमारे देश की अर्थव्यवस्था का नियंत्रण अमेरिका और उससे संबंद्ध अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व बैंक जैसी वित्तीय संस्थाओं के हाथों में है.
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पाकिस्तान ने अपने सारे संसाधन चीन को थमा दिए हैं. सीपीईसी में चीनी निवेश की वजह से भारी-भरकम मात्रा में चीनी उपकरण और सामान का आयात किया जा रहा है जिससे पाकिस्तान का करेंट अकाउंट घाटा और विदेशी कर्ज बहुत बढ़ गया है. जुलाई में प्रकाशित हुई अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान का कुल विदेशी कर्ज मार्च में 85.4 अरब डॉलर के बराबर पहुंच गया था जिसमें से एक-चौथाई कर्ज चीन से लिया गया है. स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने ज्यादा बड़े दायरे को लेते हुए कुल कर्ज 106 अरब डॉलर बताया है.

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आयात में बढ़ोतरी और कर्ज अदायगी की वजह से पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खाली हो चुका था. स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के मुताबिक, पाकिस्तान ने 2018-19 में विदेशों से 16 अरब डॉलर का कर्ज लिया ताकि विदेशी मुद्रा की कमी से निपटा जा सके. इस कर्ज का 42 फीसदी यानी 6.7 अरब डॉलर चीन से आया था. इसके बाद, पाकिस्तान की सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का भी दरवाजा खटखटाया जिसने जुलाई महीने में पाक के लिए 6 अरब डॉलर का बेलआउट पैकेज की मंजूरी दी. हालांकि, पाकिस्तान सीपीईसी में खर्च को लेकर आईएमएफ के रडार में है.
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भारी-भरकम कर्ज की वजह से नई परियोजनाओं की रफ्तार धीमी हुई है. सीपीईसी के पहले चरण के तहत 8.5 अरब डॉलर के मेनलाइन-1 प्रोजेक्ट में रेलवे का आधुनिकीकरण किया जाना था. पाकिस्तान के योजना आयोग के सूत्रों के मुताबिक, अफसरशाही इन योजनाओं की रफ्तार बढ़ाने में दिलचस्पी नहीं ले रही है क्योंकि नैशनल अकाउंटबिलिटी ब्यूरो और आईएमएफ ने पाकिस्तान के कर्ज को देखते हुए कई पाबंदियां लगाई हैं.
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लंदन यूनिवर्सिटी के ओरिएंटल ऐंड अफ्रीकन स्टडीज स्कूल में रिसर्च एसोसिएट और राजनीतिज्ञ विश्लेषक आयशा सिद्दीका के मुताबिक, सीपीईसी की रफ्तार रोकने के पीछे दूसरी वजह है- पाकिस्तानी सेना. आयशा कहती हैं, पाकिस्तानी सेना अब सीपीईसी की आलोचना वाली रिपोर्ट्स प्रकाशित करने की ढील दे रही है. दो साल पहले किसी भी अखबार की सीपीईसी की आलोचना वाले लेख छापने की हिम्मत नहीं थी. सरकार की नीतियों में बराबर का दखल करने वाली पाक सेना ने सीपीईसी की आलोचना के लिए हरी झंडी दे दी है क्योंकि अब वह इससे कदम पीछे खींचना चाहती है.
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पाकिस्तान के एक उद्योगपति ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया, आप देखेंगे कि पाकिस्तान में चीन की सीपीईसी परियोजना के खिलाफ आवाजें बुलंद होती जा रही हैं. पाकिस्तान का कारोबारी समुदाय चीनी निवेशकों के वेंचर में पूरी तरह से शामिल नहीं है.

पाकिस्तानी जनता भी चीन की इस योजना को लेकर संदेह में है. कराची की एक महिला ताशफीन फारुकी ने कहा, सीपीईसी पाकिस्तान के लिए फायदे वाला है क्योंकि हमें आर्थिक वृद्धि और स्थिरता के लिए निवेश चाहिए लेकिन तुलना करें तो पाकिस्तान से ज्यादा चीन को फायदा होगा.
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सीपीईसी की सफलता पर इसलिए भी सवाल खड़े होने लगे हैं क्योंकि बलूच इसका विरोध कर रहे हैं. हाल ही में ग्वादर के एक लग्जरी होटल में बलूचों ने हमला किया था. पाकिस्तान में काम कर रहे कई चीनी नागरिकों की सुरक्षा को लेकर भी आशंकाएं जाहिर की जा रही हैं.
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दूसरी तरफ, अमेरिका अफगानिस्तान में तालिबान के साथ शांति समझौते में पाकिस्तान की मदद चाहता है और पाक इस मौके को अमेरिका के करीब जाने में इस्तेमाल करना चाहता है. अमेरिका सीपीईसी का विरोध करता रहा है जिसकी वजह से पाकिस्तान उसकी चिंताओं को देखते हुए थोड़े बहुत समझौते करने के लिए तैयार हो गया है.
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इस्लामाबाद में कूटनीतिक मामलों के जानकार कामरान युसूफ कहते हैं, पाकिस्तान चीन और यूएस के साथ अपने रिश्तों में संतुलन साधने की कोशिश में जुटा हुआ है.
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