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9 अगस्त 1925 को हुई इस घटना के ऊपर शहीद-ए-आज़म भगत सिंह ने काफी विस्तार से लिखा है. उन दिनों छपने वाली पंजाबी पत्रिका किरती में भगत सिंह ने एक सीरीज़ शुरू की थी, जिसमें वो काकोरी कांड के हीरो का परिचय पंजाबी भाषा में लोगों से करवाते थे.

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इतिहास के पन्नों में ऐसे भी क्रांतिकारियों का नाम भी दर्ज है, जिनका जन्म स्थान एक ही है और वह एक दिन फांसी के फंदे पर देश के लिए लटक गए. जानिए- उनके बारे में...
फुटपाथ पर जो हमारे माता-पिता पड़े हुए हैं, उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे कि जबतक भव्य भवन नहीं बनेगा, तब तक फुटपाथ पर पड़े माता-पिता को देखेंगे ही नहीं.
क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्‍मिल, अशफाक उल्‍ला खान और ठाकुर रोशन सिंह को साल 1927 में आज ही के दिन फांसी दी गई थी.
हिंदी के कथाकार हिमांशु जोशी अब हमारे बीच नहीं रहे. उनके निधन के साथ ही पहाड़ के लेखकों की बेहद स्थापित पीढ़ी में से एक और नाम कम हो गया.
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में काकोरी कांड हमेशा याद रखा जाएगा. ब्रिटिश राज के खिलाफ जंग छेड़ने की खतरनाक मंशा को पूरा करने के लिए क्रांतिकारियों को हथियार खरीदने थे. जिसके लिये ब्रिटिश सरकार का खजाना लूटने की योजना बनाई गई और इस ऐतिहासिक घटना को 9 अगस्त 1925 के दिन अंजाम दिया गया. इस ट्रेन डकैती में जर्मनी के बने चार माउज़र पिस्टल भी इस्तेमाल किए गए थे. हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के केवल दस सदस्यों ने इस पूरी घटना को अंजाम दिया था.
देश और दुनिया के इतिहास में 19 दिसंबर को कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं, जिनमें से ये सभी प्रमुख हैं...
उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी (सपा) सरकार ने शुक्रवार को पूर्ववर्ती मायावती सरकार द्वारा लिए गए फैसलों को बदलने के साथ बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सरकार के शासनकाल में शुरू की गई विभिन्न योजनाओं को समाप्त कर दिया है.
देश के नौजवानों को अपनी कविता और साहसिक कारनामों से आजादी का दीवाना बनाने वाले काकोरी कांड के नायक राम प्रसाद बिस्मिल और आजादी की लड़ाई में हिन्दू-मुसलमानों के बीच एकता का प्रतीक बने अशफाक उल्ला खां ने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया था.

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