एडवांस्ड सर्च

इस हिंदुस्तानी के बनाए बैट्स से खेलते हैं विश्व के टॉप क्रिकेटर्स

क्रिकेट का जुनून ही था कि जतिन के पिता बल्ले बनाने के कारोबार में आए और जतिन ने अपनी लगन से इसे विस्तार दिया. आज दुनिया का हर दिग्गज खिलाड़ी उनके बनाए बल्लों का दीवाना है.

Advertisement
आशीष मिश्र 12 January 2016
इस हिंदुस्तानी के बनाए बैट्स से खेलते हैं विश्व के टॉप क्रिकेटर्स jatin sareen

गांव में 40 वर्षीय जतिन सरीन का क्रिकेट के बल्ले बनाने वाला कारखाना अपने आप में एक म्युजियम है. यहां 100 साल पुराने बल्ले ही नहीं, वे बैट भी मौजूद हैं जिनसे खेलते हुए दुनिया के दिग्गज बल्लेबाजों ने कई रिकॉर्ड बनाए हैं. सरीन स्पोर्ट्स इंडस्ट्रीज के एमडी जतिन के चार एकड़ में फैले कारखाने की पहली मंजिल पर उनके दफ्तर में ऐसे बल्ले दीवारों पर टंगे हैं. एक कोने पर सजे बैट से मशहूर खिलाड़ी वीरेंद्र सहवाग ने 309 रन बनाए थे. बीच में वह बल्ला भी टंगा है जिससे श्रीलंका के कुमार संगकारा ने तिहरा शतक ठोका था. यहां सचिन तेंडुलकर और सौरव गांगुली का रिकॉर्डधारी बल्ला है तो ऑस्ट्रेलिया के एडम गिलक्रिस्ट का भी. बल्लों की बात चलते ही जतिन की आंखों में चमक आ जाती है. वे बेहद फख्र से कहते हैं, “पहले हिंदुस्तानी लोग गोरों के बनाए बैट से खेलते थे, अब गोरे हमारे बनाए बैट से खेलते हैं.”

देश के बंटवारे के बाद जतिन के दादा पाकिस्तान से आकर मेरठ में बस गए थे. पचास के दशक में उन्होंने बैडमिंटन का शटलकॉक बनाना शुरू किया. लेकिन जतिन के पिता एन.के. सरीन की बैडमिंटन में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी. वे उन दिनों कॉलेज के दौरान क्रिकेट खेलने के शौकीन थे. उन्होंने कॉलेज स्तर की कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया. यहीं से उनके मन में क्रिकेट के बल्ले बनाने का ख्याल आया. 1969 में उन्होंने अपनी कंपनी शुरू की और मेरठ में बल्ले का कारखाना खोला. इस कंपनी के बनाए बल्ले “एसएस बैट” के नाम से पहचाने गए.

उस दौरान दुनिया में दो तरह की लकडिय़ों “कश्मीर विलो” और “इंग्लिश विलो” से बल्ले बनाए जाते थे. भारत में केवल कश्मीर विलो का ही प्रचलन था. “इंग्लिश विलो” लकड़ी के बल्ले महंगे थे और उनसे केवल अमीर ही खेलते थे. एन.के. सरीन ने पहली बार “इंग्लिश विलो” लकड़ी का विदेश से आयात किया और इससे बैट बनाना शुरू किया. उस जमाने में उन्होंने सैयद किरमानी और रोजर बिन्नी से अनुबंध किया जो इनके बनाए बल्ले से क्रिकेट खेलते थे. इसके बाद मनोज प्रभाकर ने उनके बल्लों से खेलना शुरू किया और इसी कंपनी से बने बल्ले से खेलते हुए विनोद कांबली ने 1993 में इंग्लैंड के खिलाफ दोहरा शतक जड़ा. 

एसएस बैट्स का नया दौर उस वक्त शुरू हुआ जब एन.के. सरीन के बेटे जतिन ने 1997 में बल्ला बनाने का काम अपने हाथ में लिया. मेरठ कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद वे बल्ला बनाने का गुर सीखने इंग्लैंड चले गए. उस वक्त इंग्लैंड में जॉन न्यूब्री के बनाए बल्ले दुनिया में मशहूर थे. उन्होंने करीब साल भर जॉन न्यूब्री के साथ बिताया और उनसे हर वे बारीकियां सीखीं जो विश्वस्तरीय बल्ला बनाने के लिए जरूरी होती हैं.

जतिन ने मेरठ लौटने के बाद तेंडुलकर, गांगुली समेत कई क्रिकेट खिलाडिय़ों के साथ काफी वक्त बिताया. इन खिलाडिय़ों से मिले सुझाव के आधार पर उन्होंने देश में 28 मिलीमीटर की चौड़ाई वाले पतले बल्ले की जगह 40 मिलीमीटर के भी अधिक मोटे बल्ले बनाने का चलन शुरू किया और एक खास तकनीकी से इन बल्लों का हैंडल बनाया ताकि इनमें लोच रहे.

क्रिकेट बॉल पर प्रहार करने में “इंग्लिश विलो” लकड़ी के बने इन बल्लों का जवाब नहीं था. इनसे टकरा कर बॉल कहीं तेज और दूर तक जाती थी. इन बल्लों के निर्माण के लिए जतिन ने अपने कर्मचारियों को खुद ही विशेष ट्रेनिंग दी. जल्द ही ये मोटे बल्ले तेंडुलकर और गांगुली जैसे खिलाडिय़ों की पसंद बन गए. शुरू में 100-150 बल्ले रोज बनते थे, अब रोजाना करीब 700 बल्ले बनते हैं. तेंडुलकर ने जब भी अच्छी क्रिकेट खेली उनके बल्ले पर “टॉन” (यानी 100) जरूर लिखा मिला. “टॉन” एसएस बैट का ही एक ब्रांड है जिसे एन.के. सरीन ने '70 के दशक में रजिस्टर करवा लिया था. तेंडुलकर ने जब 35 शतक पूरे किए तो दुनिया की मशहूर कंपनी “ओकले” ने उन्हें 35 चश्मे उपहार के तौर पर दिए. इनमें से 27वें नंबर का चश्मा तेंडुलकर ने एक आभार पत्र के साथ जतिन को भी भेंट किया.

2007 के बाद टी 20 क्रिकेट का दौर शुरू हुआ तो मोटे पर हल्के एसएस बैट की मांग ने जोर पकड़ा. प्यूमा, एडिडास, नाइकी जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने जतिन से ही बल्ले बनवाने शुरू किए. विश्व क्रिकेट के सबसे क्रांतिकारी बल्ले “मंगूस” की तकनीक तो इंग्लैंड में बनी पर इसे मेरठ में जतिन की फैक्ट्री में ही बनाया गया. यह खास तरह का बल्ला छोटा था पर इसका हैंडल लंबा था. ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट खिलाड़ी मैथ्यू हेडन ने आइपीएल में “मंगूस” बैट से काफी चर्चा बटोरी थी.

जतिन ने 2006 में नया कारखाना खोला, जहां ज्यादातर हाथ से बल्ले बनाए जाते हैं. यहां 700 रु. से लेकर 25,000 रु. कीमत वाले बल्ले बनते हैं. आज विराट कोहली और इंग्लैंड के रवि बोपारा समेत 50 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी एसएस बैट से ही खेलते हैं. चार दर्जन से ज्यादा देशों में इस बल्ले के डीलर हैं. जतिन ने एसएस बैट को नकलचियों से बचाने के लिए पहली बार बल्लों पर नियॉन स्टिकर का इस्तेमाल शुरू किया है. यह जतिन का जलवा ही है कि एसएस बैट विश्व क्रिकेट में देश का लोहा मनवा रहा है.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay