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मेरा चेहरा देखकर मना कर देते थेः नवाजुद्दीन सिद्दीकी

वे 2010 की पीपली लाइव फिल्म को अपने करियर का अहम मोड़ मानते हैं. फिल्म में उनकी क्षेत्रीय पत्रकार की ऐक्टिंग ने उन्हें सबकी निगाहों में ला दिया.

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aajtak.in
नरेंद्र सैनीनई दिल्ली, 19 January 2015
मेरा चेहरा देखकर मना कर देते थेः नवाजुद्दीन सिद्दीकी Nawazuddin Siddiqui

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक उनींदा-सा कस्बा है बुढ़ाना. 1990 के दशक में सिद्दीकी परिवार के खामोश तबियत वाले एक लड़के का पड़ोस की एक लड़की पर दिल आ गया. वह अक्सर उस लड़की को देखता और बात करने की कोशिश करता. घर से उस लड़की को ज्यादा बाहर निकलने की इजाजत थी नहीं. वह अक्सर वहीं एक घर में टीवी देखने जाती थी, और यही वह मौका होता था जब वह अकेली होती. मजेदार यह कि वह वहां कृषि दर्शन देखने जाती.

एक दिन मौका देख, इस दीवाने ने उसका रास्ता रोक लिया और कहा, ''कृषि दर्शन में क्या रखा है. हमसे बात कर लो. '' वह लड़की शरमा गई और बोली, ''मैं टीवी देखने जा रही हूं. '' लड़के को बात चुभ गई और उसने पीछे से चिल्लाकर कहा, ''तुमसे वादा करता हूं, एक दिन टीवी पर आकर दिखाऊंगा. '' फिर लंबे संघर्ष के बाद वह दिन भी आ ही गया, जब उस लड़के को टीवी पर रोल मिल गया. उसने बरसों पहले किया अपना वादा पूरा कर दिया था. उस लड़के ने अपने दोस्त को फोन मिलाया और कहा, ''यार उस लड़की को बोल कि मैं टीवी पर आ रहा हूं. '' लेकिन दोस्त ने उसे बताया कि उसका तो निकाह हो गया है. इस तरह एकतरफा प्रेम कहानी का अंत हो गया.

यह एक प्रेम कहानी का अंत था, लेकिन एक ऐक्टर के संघर्षों से भरे कामयाब जीवन की शुरुआत हो चुकी थी. किसान परिवार के नौ बच्चों (सात लड़के, दो लड़कियां) में से एक सामान्य-सा दिखने वाला यह लड़का बचपन से ही ऐक्टर बनने के ख्वाब देखता था. वह इतना खामोश था कि 30-40 बच्चों की क्लास में भी मुश्किल से पांच-छह बच्चे ही जानते थे कि वह उनकी क्लास में है. वह अपराध के लिए कुख्यात अपने उस इलाके से दूर जाना चाहता था और पढ़ाई ही ऐसी चीज थी जिसका दामन थाम वह वहां से निकल सकता था.

कोई राह दिखाने वाला था नहीं और आर्थिक हालात भी शाहों वाले नहीं थे. ऐसे में उसे लगा कि सब साइंस की बात करते हैं तो काम की चीज होगी, सो उन्होंने साइंस में ग्रेजुएशन कर लिया. बिना किसी प्रोफेशनल एजुकेशन के नौकरी मिलना आसान न था. कई जगह कोशिश की तो केमिस्ट की नौकरी मिल गई. लेकिन मन नहीं लगा. ऐक्टिंग का शौक बुला रहा था. उसने दिल्ली आने का मन बनाया और यहां आकर ऐक्टिंग के शौक को आगे बढ़ाने का मौका मिला. चूंकि माली हालत अच्छी न थी लिहाजा शाहदरा में रात में चौकीदारी का काम कर लिया और एनएसडी में अपने ऐक्टिंग के हुनर को मांजने लगा. उसने 1996 में एनएसडी से अपनी शिक्षा पूरी की.

मजबूत इरादों और अपने हुनर को लेकर यह शख्स मायानगरी मुंबई पहुंचा. जान-पहचान थी नहीं. गोरेपन की क्रीम पर करोड़ों रु. खर्च करने वाले देश में सांवला रंग और सामान्य चेहरा. ''मुझे देखकर लोग मना कर देते थे. वे मुझे फिल्मों के लायक समझते ही नहीं थे. '' उसका संघर्ष दशक भर से ज्यादा समय तक चला. इस बीच यार-दोस्त कहने लगे कि कोई नौकरी कर लो, यह सब नहीं होने वाला. लेकिन वह हिम्मत हारने वालों में से कहां था.

1999 में सरफरोश में मुखबिर के छोटे-से रोल के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी की किस्मत खुली. अनुराग कश्यप ने इसी रोल को देखकर उन्हें ब्लैक फ्राइडे के लिए चुना था और फिर गैंग्स ऑफ वासेपुर-1,2 में भी लिया. इस फिल्म ने उन्हें दर्शकों का चहेता बना दिया और फिल्मों की लाइन लग गई. उनका फंडा है: किसी भी काम को करो तो पूरा जी लगाकर. किसी भी फील्ड में आधे-अधूरे ज्ञान से कुछ हासिल नहीं होता. हाल ही में सलमान खान के साथ किक में वे बतौर विलेन आए तो अपने छोटे-से रोल में ही छा गए. जल्दी ही वे बदलापुर, फर्जी और बजरंगी भाईजान में भी दिखेंगे.

कामयाबी के बावजूद नवाजुद्दीन का अंदाज पहले जैसा है. हताशा के दिनों में उन्होंने अपनी अम्मी की नसीहत हमेशा याद रखी: ''बारह साल में तो घूरे के दिन भी बदल जाते हैं बेटा, तू तो इनसान है. '' मां की नसीहत और मेहनत के बूते नवाज बॉलीवुड के दिलनवाज अदाकार बन गए हैं.

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