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जिंदगी का तराना, गा के जीने का इरादा था

मुंबई की रहने वाली संध्या निगम की ये कविता जिन्दगी का तराना है. जिसमें जिन्दगी के प्रति सकारात्मक सोच और हौसलों की उड़ान को शब्दों के माध्यम से व्यक्त किया गया है.

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Sandhya Nigam [Edited by: भूमिका राय]नई दिल्ली, 23 June 2015
जिंदगी का तराना, गा के जीने का इरादा था

हाले-ए-दिल गा के सुनाने का इरादा था,
कम्बख्त हर बार दगा दे जाते हैं ये आंसू
वर्ना हमें गमों को हरने का इरादा था.
सुबह के उजालो से डर सा लगता है
रात के अंधेरों से दोस्ती का इरादा था.
यूं तो डरते हैं हमसे गमों के तूफान भी
हमारा तो मौत को डराने का इरादा था.

 ये कविता मुंबई की रहने वाली संध्या निगम ने भेजी है.



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