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गुलाबी रंगों वाली वो देह

मेरे भीतर/कई कमरे हैं हर कमरे में/ अलग-अलग सामान कहीं कुछ टूटा-फूटा/तो कहीं सब कुछ नया! एकदम मुक्तिबोध की/ कविता जैसा

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अंजना बख्‍शीनई दिल्‍ली, 01 December 2014
गुलाबी रंगों वाली वो देह

मेरे भीतर/कई कमरे हैं
हर कमरे में/
अलग-अलग सामान
कहीं कुछ टूटा-फूटा/
तो कहीं सब कुछ नया!
एकदम मुक्तिबोध की/
कविता जैसा
बस खाली है तो/इन कमरों की
दीवारों पर/ये मटमैला रंग
और खाली है/भीतर की
आवाजों से टकराती/
मेरी आवाज़
नहीं जानती वो/
अतिकार करना
पर चुप रहना भी
नहीं चाहती
कोई लगातार/दौड़ रहा है
भीतर/और भीतर
इन छिपी/तहों के बीच
लुप्त होती चली है/
मेरी हंसी
जैसे लुप्त हो गई/
नाना-नानी
और दादा-दादी/
की कहानियां
परियों के किस्से/
वो सूत कातती बुढ़ि‍या/
जो दिख जाया करती
कभी-कभी/
चंदा मामा में
मैं अभी भी/ज़िदा हूं
क्योंकि मैं/
मरना नहीं चाहती
मुर्दों के शहर में/
सड़ी-गली
परंपराओं के बीच/
जहां पर
चीज बिकती हो/
जैसे बिकते हैं
गीत/बिकती हैं/ दलीलें और बिका करती है
गुलाबी रंगों वाली
वो देह/जिसमें बंद हैं
कई कमरे/
और हर कमरे की/
चाबी टूटती बिखरती/
जर्जर मनुष्यता-सी
कहीं खो गई!

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