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एक और सशक्तिकरण समारोह

ये कविता हमें क्षमा सिंह ने भेजी है. वाराणसी की क्षमा ने इसमें महिलाओं की स्थिति को व्यक्त करने की कोशिश की है. वो मानती हैं कि महिलाओं को समर्पित किसी दिवस से उनकी हालत में कोई परिवर्तन नहीं आने वाला.

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क्षमा सिंह [Edited by: भूमिका राय]नई दिल्ली, 26 June 2015
एक और सशक्तिकरण समारोह poem for stree page

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच लंबे-चौड़े भाषण
अतीत का दुःख तथा भविष्य के सपने
वर्तमान का पता नहीं.

इसके [वर्तमान] अतिरिक्त न जानें क्या-क्या
क्या बदला हमारे बीच, कुछ नहीं
सब पुराने ढर्रे पर.

हां, दिवस में एक नाम और जुड़ गया
मिल गए घंटों परिचर्चा के, बहसों के
चाय की चुस्कियों के.

जिनकी समस्या वही नदारद
वो जिनकी पैदावार ही इसलिए होती है की
वे रसोई और बिस्तर से ज्यादा न सोचें
वंश बढाएं और अपने बनाये खाने की तारीफ़ सुनें
और मान लें की इससे ज्यादा प्रशंसा
किसी चीज़ से नहीं मिल सकती
किसी भी चीज़ से नहीं.

सशक्त महिलाओं की सभा समाप्त
वे लौट पड़ीं
अगली बार फ़िर
सशक्तिकरण दिवस
सशक्त तरीके से मनाने का प्रण लेकर.

ये कविता हमें क्षमा सिंह ने भेजी है. वे का‍शी हिंदू विश्वविदयालय में शोध छात्रा हैं.

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