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जानिए उन शूटर दादियों के बारे में, जिनके रोल में दिखीं तापसी और भूमिका

शूटर दादी के नाम से मशहूर इन महिलाओं के संघर्ष की कहानी समाज को एक प्रेरणा देती है. आइए जानते हैं इन दोनों महिलाओं की दिलचस्प कहानी के बारे में.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 28 October 2019
जानिए उन शूटर दादियों के बारे में, जिनके रोल में दिखीं तापसी और भूमिका प्रकाशी और चंद्रो तोमर

तापसी पन्नू और भूमि पेडनेकर की फिल्म सांड की आंख की हर तरफ खूब प्रशंसा हो रही है. इसके साथ ही चर्चा में वो दो महिलाएं भी आ गईं हैं जिनके ऊपर ये फिल्म बनी है. शूटर दादी के नाम से मशहूर इन महिलाओं की संघर्ष की कहानी समाज को एक प्रेरणा देती है. आइए जानते हैं इन दोनों महिलाओं की दिलचस्प कहानी के बारे में.

चंद्रो तोमर- 60 साल की उम्र में स्थानीय राइफल क्लब में शूटिंग सीखकर चंद्रो तोमर कई कीर्तिमान बना चुकी हैं. गांव वाले इन्हें शूटर दादी कहते हैं. एक इंटरव्यू में चंद्रो तोमर ने बताया कि कैसे वो अपनी पोती को ट्रेनिंग दिलवाने के लिए एक शूटिंग रेंज पर लेकर गई थीं. पोती शूटिंग से डर रही थी तो उन्होंने खुद पिस्तौल उठाकर निशाने पर दाग दिया. दादी के निशाने को महज इत्तेफाक मानकर रायफल क्लब के कोच ने दादी से दोबारा निशाना साधने को कहा. दूसरी बार भी दादी ने बिल्कुल निशाने पर गोली चलाई. कोच ने दादी की छुपी प्रतिभा को पहचान कर ट्रेनिंग लेने की सलाह दी. इसके बाद चंद्रो तोमर शूटिंग के मैदान में उतर पड़ीं और नेशनल चैंपियन तक बन गईं. चंद्रो ने बताया कि वो कैसे जब रात में सब सो जाते थे तो छत पर जग में पानी भरकर वे प्रैक्टिस करती थीं, ताकि बंदूक पकड़ने के दौरान हाथ न हिले.

प्रकाशी तोमर- शूटर दादी के नाम से मशहूर प्रकाशी तोमर इंटरनेशनल शूटिंग चैंपियनशिप जीत चुकी हैं. 60 साल की उम्र तक प्रकाशी एक आम महिला की तरह घर में बच्चों के साथ घर-गृहस्थी संभालती थीं. प्रकाशी का कहना है कि मैंने चंद्रो को देखकर निशानेबाजी शुरू की. शुरुआत में थोड़ी हिचकिचाहट थी, लेकिन चंद्रो को अच्छा करता देख मुझे हिम्मत मिली. फिर तो शूटिंग एक जुनून बन गया.

उम्र के एक पड़ाव पर जब लोग बहुत सारे कामों से पीछा छुड़ाने लगते हैं, इन महिलाओं ने ऐसा कारनामा किया कि लोगों ने दांतों तले उंगलियां दबा लीं. इन दोनों महिलाओं ने कुल मिलाकर 352 मेडल्स जी, जिसने न सिर्फ उन्हें बल्कि उनके गांव को भी मशहूर कर दिया. इन दोनों महिलाओं का ये सफर आसान नहीं था. समाज के ताने झेलते हुए भी इन्होंने अपना और अपने गांव का नाम रौशन किया है.

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