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मध्य प्रदेश: नन्ही जान की बिसात ही क्या

जीवन का पहला साल भी पूरा नहीं कर पाने वाले नवजात शिशुओं की भारी संख्या मध्य प्रदेश के विकास के दावे को झुठला रही.

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aajtak.in
राहुल नरोन्हा भोपाल, 03 August 2016
मध्य प्रदेश: नन्ही जान की बिसात ही क्या मध्य प्रदेश के एक अस्पताल में नवजात की देखभाल करती नर्स

अचानक बिना किसी चेतावनी के 20 वर्षीया शिवरानी को प्रसव का दर्द उठा. मध्य प्रदेश के रीवा जिले के जिरहुआ गांव में रात घिर चुकी थी और यहां के 323 घरों को चांद-तारों समेत मिट्टी के तेल से जलने वाले महज कुछेक लैंपों ने रोशन किया हुआ था. उसका मजदूर पति काम के सिलसिले में उत्तर प्रदेश गया हुआ था. सो शिवरानी के पिता मुगुल किशोर ने अपने कोल जनजातीय समुदाय की औकात से बाहर जाकर एक टेंपो किराए पर लिया ताकि उसे पांच किलोमीटर दूर दभौरा के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया जा सके. रात 11 बजे शिवरानी ने एक लड़की को जन्म दिया. यह उसकी पहली संतान थी. पैदा होते ही नवजात के रोने की आवाज नहीं आई, बल्कि वह हवा के लिए छटपटाने लगी. स्वास्थ्य केंद्र में इसके लिए कोई आपात व्यवस्था न होने के चलते किशोर ने एक और टेंपो सिरमौर तक जाने के लिए किराए पर लिया, जो 39 किलोमीटर दूर है. डॉक्टर के यहां पहुंचने से पहले बच्ची ने आधे रास्ते में ही दम तोड़ दिया. न किसी की जवाबदेही, न कोई मुआवजा. बस एक और बच्चे की मौत समय से पहले हो गई, केवल इसलिए न्न्योंकि उसने भारत में जन्म लिया था.
यह कलंक इस राज्य का पीछा नहीं छोड़ रहा. बीते 12 बरस से मध्य प्रदेश सबसे ज्यादा शिशु मृत्यु दर वाला राज्य बना हुआ है, जो कि सब-सहारन अफ्रीका के कुछ हिस्सों से भी बदतर स्थिति है. ऐसा लगता है कि इस सूबे ने इस कलंक के साथ ही जीना स्वीकार कर लिया है. तभी मध्य प्रदेश की सरकार इस दिशा में कोई काम नहीं कर रही. किसी समुदाय के स्वास्थ्य का सूचक आइएमआर (शिशु मृत्यु दर) भी इस राज्य के समूचे सामाजिक-आर्थिक हालात की सूचना देता है. मध्य प्रदेश का खराब आइएमआर जीडीपी वृद्धि के 10
फीसदी से ज्यादा के आंकड़े और 21 फीसदी से ज्यादा की सकल कृषि वृद्धि दर को मुंह चिढ़ाता नजर आता है.

2014-15 के आंकड़ों के आधार पर नमूना पंजीकरण प्रणाली 2016 के अनुसार मध्यप्रदेश का आइएमआर 52 है. यह भारत में सबसे ज्यादा है. असम और ओडिशा इसके बाद 49 अंकों के साथ आते हैं, जबकि उत्तर प्रदेश 48 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर है. नमूना पंजीकरण प्रणाली (एसआरएस), 2015 में मध्य प्रदेश और असम, दोनों का देश में सर्वाधिक आइएमआर 54 था. विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में भारत का आइएमआर 38 था. मध्य प्रदेश ने वास्तव में पिछले कुछ वर्षों के दौरान आइएमआर के आंकड़ों में सुधार दर्ज किया है, लेकिन क्या यह पर्याप्त है? बेशक, इसका जवाब न में होगा.

आंकड़े अहम हैं
आंकड़ों का विश्लेषण अपने आप में एक कहानी  बयान करता है—वह यह कि मध्य प्रदेश के भीतरी इलाकों में अब भी स्वास्थ्य सुविधाओं का पहुंचना बाकी है. राज्य का स्वास्थ्य विभाग, खासकर ज्यादा आइएमआर वाले ग्रामीण इलाकों में (जो शहरी 35 अंक के आइएमआर के मुकाबले गांवों में 57 है) स्टाफ  और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है. राज्य में 51 जिला अस्पताल, 66 उपजिला अस्पताल, 334 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), 1,171 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और 9,192 उपकेंद्र हैं, जबकि यहां की अनुमानित आबादी 7.64 करोड़ है. ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे का हाल बहुत बुरा है. सरकारी स्वास्थ्य केंद्र द्वारा कवर की गई औसत आबादी मध्य प्रदेश में अन्य राज्यों के मुकाबले काफी ज्यादा है. यहां एक उपकेंद्र 5,000 से 7,000, एक पीएचसी 40,000 से एक लाख और एक सीएचसी एक से तीन लाख लोगों को कवर करता है.

भारत में 30 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के पीएचसी जितनी औसत आबादी को सेवाएं दे रहे हैं, वह मध्य प्रदेश से कम है. 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में उपकेंद्रों के मामले में यह औसत बेहतर है, जबकि 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सीएचसी द्वारा कवर की गई औसत आबादी बेहतर है. जाहिर है, मध्य प्रदेश इन सबसे बहुत नीचे है. लक्षद्वीप में एक सीएचसी औसतन 4,714 लोगों को सेवाएं देता है, जबकि मध्य प्रदेश में एक सीएचसी 1,57,357 की औसत आबादी को सेवा देता है. अरुणाचल प्रदेश में एक पीएचसी यदि 9,114 की औसत आबादी को सेवाएं देता है तो मध्य प्रदेश में यह संक्चया 44,882 है. राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में भी एक उपकेंद्र 3,574 लोगों को सेवाएं देता है जबकि मध्य प्रदेश में यह आंकड़ा 5,718 का है. यह अंतर बहुत ज्यादा है. इससे भी बुरी बात यह है कि राज्य के सीएचसी, पीएचसी और उपकेंद्रों में कर्मचारियों का जबरदस्त अकाल है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण मध्य प्रदेश में कुल 3,436 पुरुष स्वास्थ्यकर्मियों के पद रिक्त पड़े हुए हैं, जबकि पीएचसी और उपकेंद्रों में महिलाओं के 207 पद रिक्त हैं. इसके अलावा प्रसूति रोग, बाल रोग और महिला रोग विशेषज्ञों की भारी कमी है.

डॉक्टरों की कमी के साथ ही अस्पतालों में काम करने का ढर्रा भी लापरवाही भरा है. दो महीने पहले एक डेढ़ साल के और एक पांच साल के बच्चे की इंदौर के महाराजा यशवंत राव राजकीय अस्पताल के बच्चों वाले आइसीयू में मौत हो गई थी, जब उन्हें इलाज के दौरान ऑक्सीजन की जगह नाइट्रस ऑक्साइड चढ़ा दिया गया. बच्चों के परिवारों की वकील शन्नो खान कहती हैं, ''दोनों बच्चे गरीब परिवारों से थे और इस अस्पताल में इसलिए आए थे क्योंकि उनके पास इन्हें कहीं और ले जाने के लिए पैसे नहीं थे.'' अस्पताल का स्टाफ  सप्लाइलाइन में भ्रमित हो गया और गलत गैस चढ़ा दी. इनकी मौत आइएमआर के आंकड़ों में तो शामिल नहीं होगी, लेकिन स्टाफ की लापरवाही व्यापक तस्वीर को साफ  जरूर करती है.

रिश्वतखोर बाबू
राज्य के स्वास्थ्य विभाग को आइएमआर कम करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है. यहां अक्षमताओं और भयंकर भ्रष्टाचार का बोलबाला है. विभाग के तीन पूर्व निदेशकों—डॉ. योगीराज शर्मा, डॉ. अशोक शर्मा और डॉ. ए.एन. मित्तल के खिलाफ  जांच चल रही है. आयकर विभाग, जो आमतौर पर सरकारी कर्मचारियों से दूर रहता है, ने स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के घरों पर इसलिए छापा मारा क्योंकि उन्हें 'हाइ नेट वर्थ' वाला व्यक्ति पाया गया था. डॉ. योगीराज और डॉ. अशोक पर आयकर के छापे 2007 और 2008 में पड़े थे, जबकि तत्कालीन स्वास्थ्य निदेशक ए.एन. मित्तल पर लोकायुक्त का छापा मई, 2012 में पड़ा था, जिसमें 38 लाख रु. नकद के अलावा 72 लाख रु. के गहने, जमीन मालिकाने के कागजात और विदेशी मुद्रा पाई गई थी. इस विभाग में रिश्वतखोरी का मुक्चय स्रोत माल की खरीद है. चूंकि स्वास्थ्य विभाग को अनुदान की कोई कमी नहीं होती, लिहाजा नौकरशाह यहां तैनाती को मलाईदार मानते हैं और मंत्रियों के बीच भी यह विभाग काफी मांग में रहता है. कांग्रेस के प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी बताते हैं, ''पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अजय बिश्नोई के भाई जो कि राज्य बिजली विभाग में इंजीनियर थे, उन्हें डेपुटेशन पर ऐसे विभाग में लाया गया, जिसका काम दवाओं की खरीद के लिए टेंडर निकालना था.'' स्वास्थ्य विभाग के लिए 2016-17 में बजटीय आवंटन 6,693.55 करोड़ रु. का है, जिसका बड़ा हिस्सा दवाओं और उपकरणों की खरीद पर खर्च होना है.

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 4 का कहना है कि मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में प्रसव के लिए जाने वाले एक शहरी निवासी को 1,746 और गांव के निवासी को 1,259 रु. अलग से खर्च करने पड़ते हैं. यह पैसा वार्ड ब्वॉय से लेकर दूसरे कर्मचारियों को दी जाने वाली रिश्वत के काम आता है. मातृत्व और प्रसव से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए संस्थागत प्रसव के प्रसार को नीतिगत स्तर पर अपनाया गया था. हुआ यह है कि मध्य प्रदेश में संस्थागत प्रसवों से मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) में तो गिरावट आई है—(वर्ष 2000 में प्रति लाख पर 498 से आज प्रति लाख पर 221 तक) लेकिन शिशु मृत्यु दर (आइएमआर) में कमी नहीं आ सकी है.

अपना-अपना राग
जानकारों का कहना है कि अलग-अलग क्षेत्रों के साथ न आ पाने के चलते आइएमआर में कटौती एक दूर का सपना बनकर रह गई है. इसमें अकेले स्वास्थ्य विभाग का ही दोष नहीं है. हालांकि बुनियादी जिम्मेदारी उसी की थी. इसका दोष महिला और बाल विकास विभाग और ग्रामीण विकास विभाग को भी जाता है. महिला और बाल विकास विभाग का काम नवजात बच्चियों के स्वास्थ्य की निगरानी करना है, जबकि ग्रामीण विकास विभाग का काम रोजगार सुनिश्चित कराना है ताकि औरतें आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन सकें. फिलहाल हर विभाग अलग-थलग पड़े हुए काम कर रहा है और इनके बीच समन्वय का अभाव है.

पोषाहार विशेषज्ञ और भोजन के अधिकार अभियान में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त आयुक्त सचिन जैन कहते हैं, ''लाइफ साइकल अप्रोच की जरूरत है, जो बच्चियों के स्वास्थ्य पर केंद्रित हो क्योंकि आखिरकार उन्हें मां भी बनना है.'' वे कहते हैं, ''जब तक मां सेहतमंद नहीं है, बच्चों के बचने की संभावना अच्छी नहीं होगी.'' विस्तार कार्यक्रमों का भी यहां अभाव है. वे कहते हैं, ''सदियों से महिलाओं को एक खास तरीके से बरता गया है. यह रातोरात या केवल पैसा फूंकने से ठीक होने वाला नहीं है.'' राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, 2013 के अंतर्गत महिलाएं मातृत्व लाभ के योग्य हैं, लेकिन यह उन्हें नहीं मिल रहा.

मेडिकल मशीन

जैन इस बात को समझाते हैं कि मध्य प्रदेश पिछले 12 वर्षों में शिशु मृत्यु दर को घटाने में कामयाब रहने के बावजूद इस मामले में सबसे खराब स्तर पर क्यों है. वे कहते हैं, ''सरकार से फं ड दिए जाने और योजनाओं के माध्यम से तीव्र हस्तक्षेप ने यह सुनिश्चित किया कि तात्कालिक तौर पर आसान लक्ष्य पा लिए गए. अब कठिन लक्ष्यों की पूर्ति बचती है. यहां से हमें ऊपर जाना होगा.'' यूनिसेफ, मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. वंदना भाटिया कहती हैं, ''मध्य प्रदेश को सुरक्षित प्रसव समेत जच्चा-बच्चा की देखभाल की गुणवत्ता, घर से लेकर अस्पताल तक फीडिंग के तरीके, टीकाकारण, निमोनिया और हैजा नियंत्रण आदि पर ध्यान केंद्रित करना होगा.''

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री रुस्तम सिंह डॉक्टरों, खासकर विशेषज्ञों की कमी की बात को स्वीकार करते हैं. वे कहते हैं, ''हमें समस्या का अंदाजा है और हम समाधान निकालने का प्रयास कर रहे हैं.'' राज्य सरकार ने एक प्रस्ताव दिया है कि महाराष्ट्र के एक संस्थान से स्नातक चिकित्सकों को प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे विशेषज्ञों के स्तर पर आ सकें. इसे कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार है. विभाग में भ्रष्टाचार पर एक पूर्व आइपीएस अधिकारी कहते हैं कि यह समस्या थी, लेकिन अब इसे नियंत्रित कर लिया गया है.

ऊंची शिशु मृत्यु दर के लिए अफसर कुछ और कारण गिनाते हैं. महिला और बाल विकास विभाग के प्रधान सचिव जेएन कंसोटिया कहते हैं, ''मध्य प्रदेश की जनांकिकीय स्थिति अन्य राज्यों से भिन्न है और वह आंशिक तौर पर ऊंची शिशु मृत्यु दर के लिए जिम्मेदार है.'' राज्य में 1.5 करोड़ आदिवासी हैं और 1.1 करोड़ अनुसूचित जाति के लोग हैं. उनके मुताबिक, दोनों समुदायों का सामाजिक-आर्थिक सूचकांक निम्न है और स्वास्थ्य की स्थिति भी कमजोर है. क्षेत्रफल के हिसाब से मध्य प्रदेश एक विशाल राज्य है, जहां बड़ा भूभाग जंगलों का है, जो विस्तार कार्यक्रमों की पहुंच से बाहर है. यहां तक कि परंपरागत रूप से सामंती इलाके, खासकर उत्तर प्रदेश की सीमा से लगने वाले बुंदेलखंड और बघेलखंड में तो हालात अंग्रेजी शासन के दौर से भी बुरे हैं. सालाना स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2012-13 के मुताबिक आइएमआर के मामले में राज्य के सबसे खराब जिले हैं पन्ना (85), सतना (83) और गुना (75). ये इलाके आजादी से पहले रजवाड़ों के राज में आते थे. वे कहते हैं, ''किशोरियों के स्वास्थ्य में सुधार के लिए बनी सबला योजना और आइसीडीएस के तहत गर्भवती औरतों को पोषण जैसे हस्तक्षेप परिणाम दे रहे हैं.''

समस्या की पहचान और जागरूकता के बावजूद फि लहाल इसका कोई हल नहीं दिखता. राज्य सरकार आज भी राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के भरोसे है. कि वे अगले आइएमआर के आंकड़ें सुधार सकेंगे. क्या मध्य प्रदेश के लिए 13वां साल भाग्यशाली साबित होगा?

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