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पश्चिमी यूपी को लेकर सपा-कांग्रेस और बीएसपी की अजब-गजब रणनीति

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी सभाओं में निशाने पर बीजेपी को रख रहे हैं. रणनीति के तहत ही राहुल गांधी कहते हैं कि, बसपा की बात करना मैं जरुरी नहीं समझता क्योंकि वो तो लड़ाई में ही नहीं है.

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कुमार विक्रांत [Edited By: अनुग्रह मिश्र]नई दिल्ली, 05 February 2017
पश्चिमी यूपी को लेकर सपा-कांग्रेस और बीएसपी की अजब-गजब रणनीति वोटरों को रिझाने में लगे है राजनीतिक दल

उत्तर प्रदेश के सियासी दंगल की शुरुआत पश्चिमी यूपी से होनी है. ये वो इलाका है जो दंगो के साए में चुनाव में जायेगा. यहां बीजेपी, सपा-कांग्रेस गठबंधन, बसपा के साथ ही चौधरी अजीत सिंह भी सियासी मैदान में हैं. सभी की अपनी-अपनी रणनीति है, लेकिन गठबंधन और बसपा की रणनीति सबसे दिलचस्प है.

अखिलेश और राहुल की रणनीति

दरअसल, पश्चिमी यूपी को कांग्रेस और सपा की कमज़ोर कड़ी माना जा रहा है. सपा पहले से इस जाटलैंड में कमजोर रही है, क्योंकि यहां यादव मतदाता काफी कम हैं. ऐसे में कांग्रेस के सहारे सपा मुस्लिम वोट बैंक को अपने पाले में लाने में जुटी है. लेकिन उसको डर है कि, बीजेपी विरोध के नाम पर मुस्लिम वोट बसपा के पाले में ना जाएं क्योंकि बसपा के पास दलितों का बेस वोट भी है. इसीलिए सपा और कांग्रेस एक तरफ तो जाट नेता अजीत सिंह पर निगाहें गड़ाए हैं. उनको लगता है कि, चौधरी बीजेपी को ही वोटों का नुकसान पहुचायेंगे. दूसरी तरफ, वो पूरे पश्चिमी यूपी को जोर-शोर से बताएंगे कि, यूपी में मायावती 3 बार चुनाव के बाद गठजोड़ कर चुकी हैं, आगे भी कर लेंगी. साथ ही कोशिश यही है कि, पश्चिमी यूपी की लड़ाई को बीजेपी बनाम गठबंधन बनाया जाये, जिससे मुस्लिम मतदाता गठबंधन के पाले में रहें और आर-पार की लड़ाई में बीजेपी विरोध का वोट और मुस्लिम वोट मिलकर गठजोड़ की नैय्या पार लगा देंगे.

इसीलिए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी सभाओं में निशाने पर बीजेपी को रख रहे हैं. रणनीति के तहत ही राहुल गांधी कहते हैं कि, बसपा की बात करना मैं जरुरी नहीं समझता क्योंकि वो तो लड़ाई में ही नहीं है. साथ ही 11 फरवरी के दिन जब पहले चरण का मतदान होगा, उसी दिन पीएम के संसदीय क्षेत्र बनारस में राहुल,अखिलेश 5 घंटे का साझा रोड शो कर रहे होंगे, जिससे पश्चिमी यूपी के पहले चरण के मतदान पर असर डाल सकें.

मायावती का जाट लैंड प्लान


2007 में दलित-ब्राह्मण समीकरण बनाकर सीएम बनने वाली मायावती ने इस बार अपनी रणनीति बदल दी है. तब मायावती के सामने बीजेपी बड़ी चुनौती नहीं थी. इस बार मायावती नई रणनीति के साथ चुनावी मैदान में उतरीं हैं. इस बार मायावती ने दलित-मुस्लिम समीकरण को आधार बनाया है, जिसका सबसे बड़ा इम्तिहान पश्चिमी यूपी में ही होना है. मायावती यहां से 100 से ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार उतार चुकी हैं.

चुनाव प्रचार के दौरान मायावती बीजेपी पर ज्यादा हमलावर रहती हैं. यहां तक कि, मुस्लिमों को सन्देश देने के लिए बाहुबली और दागी छवि वाले अंसारी बंधुओं से भी उन्होंने हाथ मिला लिया, जिनकी दागी छवि के चलते अखिलेश, मुलायम-शिवपाल से टकराये और उनको सपा में शामिल नहीं होने दिया. ऐसे में अब गठबंधन की तरह ही मायावती भी लड़ाई को बसपा बनाम बीजेपी बनाना चाहती हैं. माया को लगता है कि, ऐसे में दलित बेस वोट के मद्देनजर 100 मुस्लिम उम्मीदवारों के सहारे वो दलित मुस्लिम गठजोड़ बनाकर बीजेपी विरोध का वोट भी हासिल कर पाएंगी. इसीलिए मायावती कहती हैं कि, कांग्रेस तो कहीं है नहीं और सपा में झगड़े के चलते सपा ही सपा को हरा रही है, इसलिए बीजेपी को हराने के लिए गठबंधन को वोट देना वोट खराब करना होगा.

बीजेपी की सीधी-सपाट नीति

बसपा और गठबंधन जितना मुस्लिम मतदाताओं की बातें करते हैं, बीजेपी को लगता है कि, बिना कुछ किये हिन्दू मतदाता उसके पक्ष में लामबंद हो जाएंगे, जिससे वो दलित वोट बैंक में भी सेंधमारी कर लेगी. साथ ही उसकी उम्मीद है कि, बसपा ने 100 से ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं, तो वहीं अखिलेश ने कांग्रेस से गठजोड़ करके तय कर दिया है कि, मुस्लिम मतदाता दो जगह बंटेगा और बीजेपी की राह आसान हो जायेगी. साथ बीजेपी को लगता है कि, उसके पास नरेंद्र मोदी बतौर तुरुप का इक्का भी मौजूद हैं.

कुल मिलाकर यूपी का दंगल कौन जीतेगा इसकी नींव पश्चिमी यूपी से ही रख दी जायेगी. साथ ही सभी को लगता है कि, सात चरणों के चुनाव में शुरुआती चरण जो आगे निकलेगा, आने वाले चरणों में भी माहौल उसके हक़ में बनता जायेगा। इसीलिए फ़िलहाल तो पश्चिमी यूपी पूरे यूपी की सियासी दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाने को तैयार है.

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