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अखिलेश सिंहः रायबरेली का रॉबिनहुड, गांधी परिवार भी जिसे नहीं दे सका मात

रायबरेली की सियासत के बेताज बादशाह माने जाने वाले अखिलेश सिंह ने पैसा, ताकत और राजनीति को अपना गुलाम बनाकर रखा. यही वजह रही कि गांधी परिवार भी अखिलेश सिंह की सियासत को रायबरेली में मात नहीं दे सका. मंगलवार को अखिलेश सिंह का निधन हो गया.

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aajtak.in
कुबूल अहमद नई दिल्ली, 20 August 2019
अखिलेश सिंहः रायबरेली का रॉबिनहुड, गांधी परिवार भी जिसे नहीं दे सका मात रायबरेली में अखिलेश सिंह

  • अखिलेश को नहीं दे सका कोई चुनौती
  • 90 के दशक में सियासत में रखा कदम
  • गांधी परिवार की नींद कर दी थी हराम
  • रायबरेली में यूं बनाई सियासी पकड़

रायबरेली की राजनीति और दबंगई में पिछले तीन दशक से बेताज बादशाह रहे अखिलेश सिंह ने हर तरह की लहर, दांव और सियासत को अपने सामने बौना साबित कर दिया था. मंगलवार की सुबह अखिलेश सिंह का लखनऊ के पीजीआई में निधन हो गया. वो लंबे समय से कैंसर से पीड़ित थे.

बता दें कि एक समय था जब गरीब आदमी को अखिलेश सिंह से पनाह में रहम और राहत मिलती दिखती थी तो दूसरी तरफ शहर के सभ्य, शिक्षित और पैसे वाले इस नाम से खौफ खाते थे. सुभाष चंद्र बोस को वह अपना आदर्श मानते थे. ये मानते थे कि सुभाष चंद्र बोस की मौत विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी वह अब भी जिंदा हैं. इसके लिए उन्होंने विधानसभा तक में आवाज उठाई थी.

सुबह होते ही लोग उनके पास मदद के लिए पहुंचने लगते थे, अखिलेश सिंह खुले दिल से सबकी मदद करते थे. अखिलेश सिंह सिर्फ अपने विधानसभा क्षेत्र ही नहीं बल्कि रायबरेली के दूसरे इलाके के गरीबों की मदद करने से पीछे नहीं रहते. इसी के चलते पूरे रायबरेली में उनती तूती बोलती थी.

अखिलेश सिंह की राजनीति में सेंध मारने की कोशिश करने वाले न जाने कितने नाम इतिहास में दफन हो गए. अखिलेश सिंह ने पैसा, ताकत और राजनीति को अपना गुलाम बनाकर रखा. यही वजह रही कि गांधी परिवार भी अखिलेश सिंह की सियासत को रायबरेली में मात नहीं दे सका.

अखिलेश को नहीं दे सका कोई चुनौती

उत्तर प्रदेश की सियासत में रामजन्म भूमि आंदोलन का दौर रहा हो या रायबरेली में गांधी परिवार की लहर या फिर समाजवाद और बहुजन हिताय के नारों का, अखिलेश सिंह सिर्फ अपने दम पर एक लंबे अरसे से सदर विधायक रहे. इतना ही नहीं मोदी लहर में जब देश से लेकर प्रदेश तक में कमल खिल रहा था तो रायबरेली में अखिलेश सिंह ने अपनी बेटी अदिति सिंह को चुनावी मैदान में उतारकर सारे समीकरण को ध्वस्त कर दिया और रिकार्ड मतों से जिताकर विधानसभा भेजा.

90 के दशक में सियासत में रखा कदम

अखिलेश सिंह ने 90 के दशक में अपना सियासी सफर कांग्रेस से शुरू किया था. वे करीब 24 साल तक रायबरेली सदर सीट से विधायक रहे. कांग्रेस में रहते हुए भी अखिलेश ने सभी दिग्गज नेताओं को अपने से बौना रखा. अखिलेश सिंह 13 साल तक कांग्रेस से अलग रहे. इस दौरान वह गांधी परिवार को जमकर कोसते थे. 1999 में जब कैप्टन सतीष शर्मा रायबरेली सीट से चुनाव लड़ने आए तो अखिलेश सिंह के विरोध से उनकी नींद हराम हो गई थी. इसके बाद कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को आगे आकर अखिलेश सिंह को साधा. 2002 में राकेश पांडेय की हत्या के बाद अखिलेश सिंह को कांग्रेस से बाहर कर दिया गया था.

गांधी परिवार की नींद हराम कर दी थी

इसके बाद 2004 में सोनिया गांधी रायबरेली सीट से चुनाव लड़ने आईं तो अखिलेश सिंह ने अपने चचेरे बड़े भाई अशोक सिंह को मैदान में उतारकर कांग्रेसी नेताओं को परेशान कर दिया था. प्रियंका गांधी 2004 में अपनी मां सोनिया गांधी के चुनाव प्रचार के लिए अखिलेश सिंह के इलाके से गुजरीं तो सड़कें सूनी पड़ी थीं और दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था. इसके बाद प्रियंका गांधी ने रायबरेली में डेरा जमा दिया था, जिसके बाद कहीं जाकर सोनिया जीत पाईं. अखिलेश सिंह का खौफ ऐसा था कि कांग्रेसी उनके डर से पोस्टर भी नहीं लगा पाते थे.

रायबरेली की सदर सीट से अखिलेश सिंह को मात देने के लिए गांधी परिवार ने कई मोहरों का इस्तेमाल किया, लेकिन एक भी कामयाब नहीं रहा. कांग्रेस नेताओं ने अखिलेश को हराने के लिए सत्ता और धन सबका इस्तेमाल किया, लेकिन अखिलेश सिंह जेल में रहते हुए भी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीत गए. 

क्षेत्र में गहरी पैठ

रायबरेली की सियासत में अखिलेश की जड़ें इतनी जम चुकी थीं कि विरोधियों के लिए उन्हें उखाड़ना आसान नहीं रहा था. वह एक बाहुबली नेता के रूप में जाने जाते थे. अपराध की दुनिया में उनका नाम तब आया जब 1985 में आनंद मिश्रा की हत्या हुई. इसके बाद 1987 में मनोज त्रिवेदी उर्फ बादशाह की हत्या में भी उनका नाम आया. इस घटना के बाद से तो पूरे जिले पर उनका एकछत्र राज कायम हो गया. जिले में जिसने भी सर उठाने की कोशिश की उसे इतिहास बना दिया गया.

23 जुलाई, 1988 को बैटमिंटन खिलाड़ी सैयद मोदी की हत्या हुई. इस हत्याकांड में भी अखिलेश सिंह का नाम आया, लेकिन इस घटना के बाद से जिले के बाहर भी उनकी तूती बोलने लगी. हालांकि जैसा कि होता आया है, मजबूत से मजबूत इस्पात के खंभे को भी एक उम्र के बाद जंग खाने लगता है अखिलेश सिंह का भी हाल कुछ ऐसा ही हो गया था. वो लंबे समय से कैंसर से पीड़ित थे, जिसके चलते उनका राजनीतिक वर्चस्व भी कम हो गया था.

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