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उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता किस पर लगाएंगे दांव?

उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों में से करीब 130 से 135 सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमानों का वोट निर्णायक साबित होता है. इनमें से ज्यादातर सीटें पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तराई वाले इलाके और पूर्वी उत्तर प्रदेश में हैं. यहां मुसलमानों का भरोसा हासिल किए बिना किसी भी उम्मीदवार के लिए जीत हासिल करना मुश्किल है.

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कुमार अभिषेक / खुशदीप सहगल नई दिल्ली, 26 January 2017
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता किस पर लगाएंगे दांव? उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव

उत्तर प्रदेश में पहले चरण के मतदान को अब दो हफ्ते का ही वक्त रह गया है, लेकिन प्रदेश के मुस्लिम मतदाता दुविधा में हैं कि उनका वोट किस राजनीतिक दल या गठबंधन को जाएगा. आज तक/इंडिया टुडे के रिपोर्टर्स ने प्रदेश के मुस्लिम बहुल इलाकों में जाकर उनका रुख जानने की कोशिश की. हर जगह बात करने से निचोड़ यही निकला कि मुस्लिम मतदाताओं का वोट उसी राजनीतिक दल या गठबंधन को जाएगा, जो बीजेपी को हराने की स्थिति में दिखेगा. हालांकि किसी भी जगह मुस्लिम मतदाताओं ने पक्के तौर पर ये नहीं कहा कि उनका वोट किस राजनीतिक दल या गठबंधन के खाते में जाएगा.

ये सच है कि यूपी में बीते ढाई दशक में मुस्लिम मतदाता अधिकतर मुलायम सिंह यादव पर ही भरोसा जताते रहे हैं. इस बार समाजवादी पार्टी की कमान मुलायम सिंह के हाथों में नहीं बल्कि उनके बेटे अखिलेश यादव के पास है. अखिलेश ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर मुसलमानों को सशक्त विकल्प देने की कोशिश की है, जिससे मुसलमानों की दुविधा खत्म हो सके. उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटरों की तादाद 20 फीसदी है. समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन की ख्वाहिश यही है कि मुसलमानों का एकमुश्त वोट उसे मिले और वो बहुमत के आंकड़े को छू सके.

हालांकि पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुसलमान अभी खुल कर ये बताने को तैयार नहीं है कि वो किस चुनाव चिह्न पर बटन दबाएंगे. लेकिन जमीनी हकीकत ये भी है कि अधिकतर मुसलमान अखिलेश के नेतृत्व वाले गठबंधन को ही बीजेपी को चुनौती देने के लिए सबसे बेहतर स्थिति में मान रहे हैं.

उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों में से करीब 130 से 135 सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमानों का वोट निर्णायक साबित होता है. इनमें से ज्यादातर सीटें पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तराई वाले इलाके और पूर्वी उत्तर प्रदेश में हैं. यहां मुसलमानों का भरोसा हासिल किए बिना किसी भी उम्मीदवार के लिए जीत हासिल करना मुश्किल है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एसपी-कांग्रेस गठबंधन पर दांव?
ये सच है कि मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग अखिलेश सरकार से मुजफ्फरनगर दंगों के बाद से ही नाराज रहा. लव जिहाद, कैराना पलायन और धर्मांतरण जैसे मुद्दों पर भी मुसलमान अखिलेश सरकार के रवैये से नाखुश दिखे. यही वजह है कि पिछले कुछ वक्त से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमानों का रुझान समाजवादी पार्टी की बजाए बीएसपी की तरफ खिसकता नजर आ रहा था. लेकिन अब समाजवादी पार्टी का गठबंधन कांग्रेस के साथ हो जाने से तस्वीर बदल सकती है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, मेरठ, बागपत, हापुड़ और गाजियाबाद जैसी सीटों पर अब समीकरण बदलते दिख रहे हैं. मुसलमानों का बड़ा तबका अखिलेश नीत गठबंधन की तरफ जा सकता है. लेकिन यहां मुसलिम मतदाता ये कहना भी नहीं भूलते कि आखिरी वक्त में जो भी बीजेपी को हराता दिखेगा, उनका वोट उसी तरफ जाएगा. यानी कई सीटों पर बीएसपी का उम्मीदवार सशक्त दिखने पर मुस्लिम मतदाता उसके नाम पर भी बटन दबा सकते हैं.

मेरठ जिले के ज्यादातर मुसलमानों का रुख एसपी-कांग्रेस गठबंधन की तरफ नजर आता है. लेकिन साथ ही हाजी याकूब जिस सीट से उम्मीदवार हैं वहां मुसलमान बीएसपी को वोट कर सकते हैं. यही बात बीएसपी के अन्य मजबूत उम्मीदवारों के लिए भी कही जा सकती है.

पश्चिमी यूपी की बात की जाए तो यहां इसमें मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है. मेरठ और इसके आसपास के जनपदों में मुसलमान वोटरों की संख्या 35 से 45 फीसदी तक है. बिजनौर जिले में मुसलमानों की संख्या करीब 40 फीसदी है. मेरठ में मुसलमान वोट 35 से 40 फीसदी हैं, तो मुजफ्फरनगर में ये लगभग 35 फीसदी हैं.

हापुड़ में मुसलमानों का प्रतिशत लगभग 35 से 40 प्रतिशत है. बागपत में मुसलमानों की संख्या 35 प्रतिशत के आसपास है. इन सभी जिलों में एसपी-कांग्रेस गठबंधन मुसलमानों की पहली पसन्द है, दूसरे नम्बर पर बीएसपी नजर आती है. लेकिन उम्मीदवारों की मजबूती को देखते हुए ये पसंद बदल भी सकती है.

मेरठ में मुसलमानों की पहली पसंद आज भी अखिलेश यादव हैं. मेरठ में मुसलमान एसपी-कांग्रेस गठबंधन को ही वोट देना पसन्द कर रहे हैं. अखिलेश को नए युग का सेकुलर नेता बताते हुए ज्यादातर मुस्लिम वोटरों का रुख उनकी तरफ है. उनका कहना है कि अखिलेश उनको पसंद करते हैं और वो अखिलेश को. छात्रों को लैपटॉप वितरण जैसी योजनाओं को चलाकर युवा मतदाताओं में भी अखिलेश की छवि अलग किस्म की बनी है.

मेरठ के मुस्लिम मतदाताओं जैसी ही सोच मुजफ्फरनगर और सहारनपुर जिलों में भी देखने को मिली. सहारनपुर की सातों विधान सभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता लगभग 35 से 40 फीसदी हैं. सहारनपुर की बेहट, देवबंद व गंगोह विधान सभा सीटें मुस्लिम बहुल हैं. यहां मुस्लिम मतदाताओं की यही सोच दिखाई दी कि बीजेपी के खिलाफ जो भी सबसे सशक्त उम्मीदवार होगा, उसी को वोट देंगे, वो चाहे किसी भी पार्टी का क्यों ना हो.

तनजीम उलेमा-ए-हिंद के प्रदेश अध्यक्ष मौलाना नदीम-उल-वाजिदी के मुताबिक अखिलेश को अपनी सरकार की नाकामियों की वजह से कांग्रेस से गठबंधन के लिए मजबूर होना पड़ा. वाजिदी का कहना है कि इस गठबंधन का फायदा समाजवादी पार्टी को जरूर मिलेगा क्योंकि जिन सीटों पर कांग्रेस का प्रत्याशी नहीं है वहां पर कांग्रेस का 7 फीसदी फिक्स वोट समाजवादी पार्टी के खाते में जाएगा. उन्होंने साथ ही कहा कि मुसलमानों को उसी उम्मीदवार को वोट देना चाहिए जो बीजेपी को हराता दिखे. देवबंद में आम मुस्लिम मतदाता भी एसपी-कांग्रेस गठबंधन को पहली पसंद बताते नजर आए.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के समीकरण अलग
पूर्वी उत्तर प्रदेश में समीकरण थोड़े अलग हैं. यहां भी मुसलमानों की पहली चाहत समाजवादी पार्टी जरूर है, लेकिन यहां बीएसपी ने इस तबके में बड़ी सेंध भी लगा रखी है. अगर अंसारी बंधुओं ने मायावती का दामन थामा तो बीएसपी की तरफ मुसलमान झुक सकता है. कम से कम गाजीपुर, मऊ जौनपुर, गोरखपुर सरीखे इलाकों में मुसलमान बीएसपी की तरफ मुड़ सकते हैं. मुख्तार अंसारी के बसपा के टिकट से मऊ सदर विधान सभा से चुनाव लड़ने के संकेत मिलते ही मऊ में चुनावी समीकरण बदलता नजर आ रहा है. सदर के मुस्लिम वोटर अब हाथी पर सवारी करने का मन बना रहे हैं.

लखनऊ और अवध क्षेत्र का रुझान
लखनऊ और अवध क्षेत्र में मुसलमान समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ जाएगा इसकी संभावना ज्यादा है. लखनऊ के सुन्नी मुसलमानों के धर्म गुरु फिरंगीमहली यूं तो खुलकर नहीं बोलते लेकिन अखिलेश के कामकाज की तारीफ खुलकर करते हैं. वहीं, शिया मुसलमानों के नेता फिलहाल अखिलेश के साथ खड़े नजर नहीं आते. इस क्षेत्र में भी मुसलमानों की पहली पसंद एसपी-कांग्रेस गठबंधन हो सकता है लेकिन जहां भी बीएसपी उम्मीदवार ज्यादा मजबूत दिखा, मुस्लिम मतदाता उसकी तरफ मुड़ सकते हैं.

वाराणसी में अलग-अलग राय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में मुस्लिम मतदाताओं का रुख किस और है, इस बारे में अलग-अलग राय देखने को मिली. मुस्लिम धर्म गुरुओं की मानें तो धर्म जाति के आधार पर बांटकर वोट देखना बिल्कुल गलत है. लेकिन मौजूदा हालात की बात की जाए तो वाराणसी के मुस्लिमों का रुझान बीएसपी की ओर बढ़ा है. हालांकि मुसलमानों का एक तबका एसपी-कांग्रेस गठबंधन को अच्छा कदम बता रहा है. वाराणसी में मुस्लिमों की तादाद 15.85 फीसदी, आजमगढ़ में 28.07 फीसदी, मऊ में 22.74 फीसदी, गाजीपुर में 13.89 फीसदी और मिर्जापुर में 10.63 फीसदी है.



बुंदेलखंड में समीकरण साफ नहीं
समाजवादी पार्टी की यूपी के इलाकों में सबसे कमजोर कड़ी कोई माना जाता हो तो वो बुंदेलखंड है. लेकिन पार्टी यहां अपना ट्रंपकार्ड खेलने जा रही है. कांग्रेस के साथ गठबंधन से यहां फायदा मिलता दिख रहा है. साथ ही अखिलेश यहां खुद चुनाव लड़ सकते हैं. लेकिन ये भी सच है कि बुंदेलखंड में बीएसपी काफी मजबूत मानी जाती रही है. ऐसे में जिन जगहों पर बीएसपी का मजबूत उम्मीदवार दिखेगा, वहां मुसलमान बीएसपी पर दांव लगाना पसंद कर सकते हैं.

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