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फूलपुर उपचुनाव: अतीक अहमद की दावेदारी बिगाड़ सकती है सपा की तैयारी

उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर संसदीय क्षेत्रों पर उपचुनाव होने जा रहा है. फूलपुर पर भी सभी की निगाहें हैं क्योंकि बीजेपी इस पर अपनी जीत बनाए रखना चाहती है तो सपा फिर से यहां पर जीत हासिल करना चाहती है, लेकिन अतीक अहमद की दावेदारी उनका काम बिगाड़ सकती है.

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aajtak.in
कुमार अभिषेक फूलपुर, 20 February 2018
फूलपुर उपचुनाव: अतीक अहमद की दावेदारी बिगाड़ सकती है सपा की तैयारी अतीक अहमद (फाइल फोटो)

बाहुबली और सपा के पूर्व सांसद अतीक अहमद ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मंगलवार को फूलपुर लोकसभा सीट पर जोरदार दमखम के साथ नामांकन दाखिल किया. अतीक के मैदान में उतरे ने सपा का सियासी खेल बिगड़ता नजर आ रहा है.

बता दें कि फूलपुर लोकसभा सीट के लिए बीजेपी ने जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए कौशलेंद्र पटेल को उम्मीदवार बनाया, तो वहीं सपा ने भी पटेल समुदाय के ही नागेंद्र पटेल पर दांव लगाया है. जबकि कांग्रेस ने ब्राह्मण समाज से आने वाले मनीष मिश्रा को मैदान में उतारा है.

अतीक अहमद फूलपुर लोकसभा सीट से सांसद रह चुके हैं. सपा की कमान अखिलेश यादव के हाथ में आने के बाद से वो पार्टी से साइड लाइन कर दिए गए हैं. पार्टी उन्हें खास तवज्जे नहीं दे रही है. ऐसे में उन्होंने सपा से बागवत करके निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में ताल ठोका है.

अतीक अहमद की फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतों पर मजबूत पकड़ है. उनके उतरने से अखिलेश यादव द्वारा पार्टी की ओर से बनाए गए प्रत्याशी नागेंद्र पटेल की जीत की राह में रोड़ा बन गए हैं. इस लोकसभा सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की अच्छीखासी संख्या है. अतीक के उतरेने से सपा को एकमुश्त मिलने वाले मतों में सेंधमारी लग सकती है. ऐसे में बीजेपी की राह आसान बनती दिख रही है. सपा ने फूलपुर में पटेल, पासी, यादव और मुस्लिम मतों की उम्मीद लगाए हुई थी, लेकिन अतीक के उतरने से उनका यह समीकरण फेल हो सकता है.

मोदी लहर में बीजेपी का खुला खाता

बीजेपी पहली बार मोदी लहर में 2014 के लोकसभा चुनाव में फूलपुर सीट पर अपनी जीत का परचम लहराने में कामयाब रही थी. केशव प्रसाद मौर्य बीजेपी उम्मीदवार के तौर 2014 में फूलपुर सीट से सांसद बने, लेकिन मार्च 2017 में यूपी के डिप्टी सीएम बनने के बाद उनके फूलपुर संसदीय क्षेत्र से इस्तीफा देने के बाद अब उपचुनाव हो रहा है.

जीत बरकरार रखना आसान नहीं

यूपी में 2014 के लोकसभा या 2017 के विधानसभा चुनाव की तरह इस बार बीजेपी लहर जैसा कुछ नहीं दिख रहा. बीजेपी का जो माहौल था, वह काफी बदल चुका है. योगी के एक साल के कार्यकाल को देखा जाए तो उनके पास गिनाने को कुछ खास उपलब्धियां भी नहीं हैं. कांग्रेस ने ब्राह्मण चेहरा उतारकर बीजेपी का समीकरण और खराब कर दिया है.

फूलपुर का जातीय समीकरण

फूलपुर संसदीय क्षेत्र में जातीय समीकरण काफी दिलचस्प है. इस संसदीय क्षेत्र में सबसे ज्यादा पटेल मतदाता हैं, जिनकी संख्या करीब सवा दो लाख है. मुस्लिम, यादव और कायस्थ मतदाताओं की संख्या भी इसी के आसपास है. लगभग डेढ़ लाख ब्राह्मण और एक लाख से अधिक अनुसूचित जाति के मतदाता हैं.

फूलपुर की सोरांव, फाफामऊ, फूलपुर और शहर पश्चिमी विधानसभा सीट ओबीसी बाहुल्य हैं. इनमें कुर्मी, कुशवाहा और यादव वोटर सबसे अधिक हैं. फूलपुर सीट पर एसपी की मजबूत पकड़ रही है. यही वजह है कि 1996 से लेकर 2004 तक समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार यहां से लगातार जीतता रहा है.

फूलपुर लोकसभा सीट से कुर्मी समाज के कई नेता सांसद बने. प्रो. बीडी सिंह, रामपूजन पटेल (तीन बार), जंग बहादुर पटेल (दो बार) एसपी के टिकट पर सांसद चुने गए. इसके बाद एसपी ने 2004 के लोकसभा चुनाव में अतीक अहमद को फूलपुर से प्रत्याशी बनाया जो विजयी रहे, लेकिन इसके बाद 2009 के चुनाव में बीएसपी के टिकट पर पंडित कपिल मुनि करवरिया चुने गए और 2014 में बीजेपी के केशव प्रसाद मौर्य ने जीत हासिल कर सपा के जीत के सफर पर विराम लगा दिया.

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