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घोसी के रण में राय बनाम राजभर, जातीय समीकरण से किसकी होगी नैया पार

पूर्वांचल की घोसी लोकसभा सीट एक दौर में कल्पनाथ राय की कर्मभूमि रही है. 2014 में मोदी लहर में बीजेपी पहली बार यहां कमल खिलाने में कामयाब रही थी. इस बार बीजेपी ने अपने मौजूदा संसद हरिनारायण राजभर को चुनावी मैदान में एक बार फिर उतारा है. जबकि गठबंधन ने अतुल राय और कांग्रेस ने बालकृष्ण चौहान को मैदान में उतारकर मुकाबले को रोचक बना दिया है.

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सुरेंद्र कुमार वर्मानई दिल्ली, 16 May 2019
घोसी के रण में राय बनाम राजभर, जातीय समीकरण से किसकी होगी नैया पार बीजेपी ने घोसी से फिर से हरिनारायण को बनाया है उम्मीदवार (ट्विटर)

उत्तर प्रदेश में इस बार के लोकसभा चुनाव की खास बात यह है कि कई संसदीय क्षेत्रों के वोटर्स अपने स्थानीय सांसदों से खफा हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात आने पर वह सोच में पड़ जाते हैं, इन्हीं सीटों में घोसी संसदीय सीट भी शामिल है. घोसी संसदीय सीट पर वैसे तो मुख्य लड़ाई भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा सांसद हरिनारायण राजभर और सपा-बसपा गठबंधन के संयुक्त उम्मीदवार अतुल राय के बीच होती नजर आ रही है, लेकिन बसपा से बगावत कर कांग्रेस का दामन थामकर चुनावी मैदान में उतरे बालकृष्ण चौहान ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है.

बालकृष्ण चौहान ने पिछला लोकसभा चुनाव बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर लड़ा था, लेकिन समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन के बाद बसपा को यह सीट मिली और उसने अतुल कुमार सिंह उर्फ अतुल राय को प्रत्याशी बना दिया. बसपा के इस फैसले से नाराज होकर बालकृष्ण चौहान पार्टी से बगावत कर कांग्रेस का दामन थामते हुए चुनावी रणभूमि में उतर गए और उनके मैदान में आने से गठबंधन की राह मुश्किल होती दिख रही है. गठबंधन को दोहरी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. पहला, उसके उम्मीदवार पर रेप केस और दूसरा, कांग्रेस की ओर से पेश की जा रही कड़ी चुनौती. वहीं, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने पार्टी के राष्ट्रीय सचिव अतुल कुमार सिंह उर्फ अतुल अंजान को टिकट दिया है.

दलित और मुस्लिम निर्णायक

घोसी संसदीय सीट पर जातिगत समीकरण पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा वोटर्स दलित बिरादरी से आते हैं. यहां पर 4.30 लाख दलित वोटर्स हैं, तो इसके बाद मुस्लिम वोटर्स हैं जिनकी संख्या 3.32 लाख है. इनके बाद चौहान 2.72 लाख, राजभर 2.03 लाख और यादव 1.62 लाख हैं जो यहां के चुनावी जंग पर अपना फैसला सुनाएंगे. क्षत्रिय वोटर्स भी बड़ी संख्या में है और इनकी संख्या करीब 1.15 लाख है.

मोदी लहर के सहारे बीजेपी की कोशिश घोसी में जातिगत आधार को तोड़ने की है और बीजेपी की यही कोशिश है कि मतदाताओं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सहारे चुनावी नैया को पार कराने की है. साथ ही बीजेपी राष्ट्रवाद नाम पर भी जीत की आस लगाए हुए है. हालांकि सीपीआई उम्मीदवार अतुल अंजान का कहना है कि राष्ट्रवाद के नाम पर यहां वोट नहीं पड़ने जा रहा.

सपा-बसपा गठबंधन के बारे में सीपीआई के अतुल अंजान कहते हैं कि यह सिर्फ वोट के लिए किया गया गठबंधन है. बसपा के उम्मीदवार अतुल माफिया हैं, और उन पर कई तरह के आपराधिक केस चल रहे हैं. वह इस समय रेप के केस में फरार चल रहे हैं. वहीं बीजेपी के उम्मीदवार हरिनारायण राजभर के बारे में वह कहते हैं कि वह तो अपने क्षेत्र में बेहद कम ही दिखते हैं. उन्होंने कोई विकास कार्य नहीं किया है.

कड़ा मुकाबला, जीत का अंतर ज्यादा

सपा-बसपा के साथ गठबंधन में शामिल राष्ट्रीय लोकदल के राज्य प्रवक्ता अंशुमान सिंह कहते हैं कि बीजेपी चाहे कुछ भी कहे पूर्वांचल समेत पूरे प्रदेश में गठबंधन मजबूत स्थिति में दिख रहा है और वह बीजेपी को कड़ी टक्कर दे रहा है. घोसी सीट की बात करें तो यहां भी सपा-बसपा गठबंधन के जीतने के आसार ज्यादा हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि लड़ाई जोरदार है और जीत चाहे किसी को भी मिले, लेकिन हार-जीत का अंतर ज्यादा नहीं रहने वाला.

घोसी में गरीबी, बेरोजगारी, किसानों की बदहाल स्थिति, बंद मिलों को चलाने, ओवर ब्रिज और बुनकरों के लिए विपणन केंद्र बनाए जाने समेत कई अहम मुद्दे हैं. राष्ट्रीय लोकदल के प्रदेश प्रवक्ता अंशुमान सिंह कहते हैं कि क्षेत्र में किसी तरह का विकास कार्य नहीं हुआ. किसानों की स्थिति बदहाल है. युवा बेरोजगार घूम रहे हैं. यहां पर सड़कों की स्थिति जरूर ठीक हुई है, लेकिन अन्य क्षेत्र में सरकार नाकाम रही है. सपा-बसपा गठबंधन भले ही अपने उम्मीदवार पर केस चलने के कारण टेंशन में हो, लेकिन जातिगत समीकरण उसके पक्ष में नजर आ रहा है.

अतुल राय की गैरमौजूदगी में उनके करीबी और बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी के बेटे ने प्रचार की कमान अपने हाथों में ले रखी है. ऐसे में गठबंधन प्रत्याशी अगर दलित, यादव, मुस्लिम और भूमिहार वोटों को एकजुट करने में सफल रहते हैं तो मोदी का जादू यहां फीका पड़ सकता है.

हालांकि बीजेपी उम्मीदवार हरिनारायण राजभर अपने जाति और सवर्ण वोट के सहारे एक बार फिर संसद पहुंचने के जुगत में हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सीएम योगी ने गुरुवार को घोसी संसदीय सीट के तहत मऊ में जनसभा करके राजभर को जिताने की अपील की है.

कल्पनाथ राय की धरती पर इस बार चुनाव का क्या माहौल है और क्या वहां पर 2014 की तरह मोदी लहर का असर दिख रहा है. इस पर सीपीआई उम्मीदवार अतुल अंजान कहते हैं कि वहां पर मोदी लहर जैसी कोई चीज नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी की सभा में ज्यादा लोग नहीं आए थे. वहीं बसपा प्रमुख मायावती की रैली की बात करें तो वहां पर महज 100-200 महिलाएं ही शामिल हुई. अंशुमान सिंह भी कहते हैं कि क्षेत्र में मोदी लहर जैसी कोई चीज नहीं है. अतुल अंजान भी कहते हैं कि सांसद हरिनारायण ने कुछ काम नहीं किया है.

वामपंथ का गढ़

2014 में मोदी लहर में बीजेपी को घोसी सीट पर ऐतिहासिक जीत हासिल मिली थी, तब पार्टी के उम्मीदवार हरिनारायण राजभर ने बसपा के दारा सिंह चौहान को हराकर अपनी पार्टी के लिए यहां से खाता खोला था. दारा सिंह 2 साल पहले बसपा छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए हैं. 18 उम्मीदवारों के बीच हुई जंग में हरिनारायण को 36.53 फीसदी (3,79,797) वोट मिले, जबकि बसपा के दारा सिंह को 22.49 फीसदी (2,33,782) वोट मिले. जबकि चौथे स्थान पर रहे समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार राजीव कुमार राय के खाते में 16.0 फीसदी यानी 1,65,887 वोट आए.

तीसरे स्थान पर कौमी एकता दल के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले बाहुबली मुख्तार अंसारी रहे जिन्हें 1,66,369 वोट (करीब 16 फीसदी) मिले थे. पिछले चुनाव में मिले वोटों के अनुपात को मिला दिया जाए तो सपा-बसपा गठबंधन के खाते में कुल 38.49 फीसदी वोट आते हैं जो बीजेपी को मिले वोटों का अंतर 2 फीसदी से भी कम है. हरिनारायण ने यह चुनाव 1,46,015 मतों के अंतर से जीता था.

घोसी के संसदीय इतिहास की बात करें तो यह प्रदेश के उन चंद सीटों में शामिल है जो वामपंथ के गढ़ के लिए जानी जाती रही है. पूर्वांचल में वामपंथ का गढ़ कहे जाने वाले घोसी संसदीय सीट पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) का लंबे समय तक कब्जा रहा. 1957 से अब तक 16 बार हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 4 बार जीत मिली, जबकि सीपीआई ने 5 बार जीत हासिल की है. 1957 के चुनाव में कांग्रेस को पहली जीत मिली. दूसरी ओर कांग्रेस के टिकट पर कल्पनाथ राय 2 बार चुनाव जरूर जीते, लेकिन यहां पर चुनाव जीतने के लिए उनकी अपनी ही छवि ही काफी थी. बाद में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भी उन्होंने चुनाव जीता था.

5 बार सांसद रहे कल्पनाथ

कल्पनाथ राय के बारे में बात की जाए तो गोरखपुर यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान छात्र राजनीति में कूदने वाले कल्पनाथ राय के नाम से घोसी सीट को खासी पहचान मिली. कांग्रेस के टिकट पर कल्पनाथ राय ने पहली बार 1989 में जीत हासिल की थी, फिर वह 1991, 1996 और 1998 में जीत कर लोकसभा पहुंचे. कांग्रेस से मनमुटाव होने के बाद 1996 के चुनाव में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की. इसके बाद 1998 में समता पार्टी के टिकट पर वह चौथी बार लोकसभा पहुंचे. इसके अलावा 1974–80, 1980–86 और 1986 में राज्यसभा में कांग्रेस सांसद रहे. कांग्रेस राज में वह कई बार मंत्री भी रहे. नरसिम्हा राव सरकार के कार्यकाल में वह खाद्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रहे और इस दौरान इन पर घोटाले के आरोप लगे. वह इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भी मंत्री रहे.

1999 में कल्पनाथ राय के निधन के बाद अन्य दलों के लिए यहां से रास्ता निकला और बसपा (1999), सपा (2004), 2009 (बसपा) और 2014 (बीजेपी) ने इस सीट से जीत हासिल की. बीजेपी को 2014 में पहली बार यहां से जीत मिली थी.

घोसी संसदीय क्षेत्र के तहत 5 विधानसभा क्षेत्र (मधुबन, घोसी, मुहम्मदाबाद-गोहना, मऊ सदर और रसड़ा) आते हैं जिसमें सिर्फ मुहम्मदाबाद-गोहना सीट ही अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व है. इन 5 विधानसभा सीट में से 3 पर बीजेपी का कब्जा है, जबकि 2 पर बसपा ने जीत हासिल की हुई है.

सपा-बसपा गठबंधन के बाद घोसी संसदीय सीट पर चुनाव बेहद दिलचस्प हो गया है. गठबंधन के उम्मीदवार अतुल राय पर रेप केस चल रहा है और वह फरार बताए जा रहे हैं, लेकिन गठबंधन के चलते उनकी स्थिति अभी भी मजबूत है. तो बीजेपी जहां मोदी लहर और योगी के करिश्मे के दम पर फिर से अपने वर्चस्व बचाने की कोशिशों में लगी है तो कांग्रेस ने बसपा के बागी बालकृष्ण चौहान को मैदान में उतारकर चुनाव को रोचक बना दिया है. अतुल अंजान के भरोसे सीपीआई अपने गढ़ को बचाने में जुटी है. अब देखना होगा कि जनता किन पर अपना भरोसा जताती है और किसके पक्ष में वोट करती है.

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