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लौटा गोल्ड स्मगलिंग का दौर

सोने पर आयात शुल्क में वृद्धि के बाद उसकी तस्करी में तेजी आ गई है. इस पीली धातु के पश्चिम एशिया से केरल तक के पोशीदा सफर का जायजा लेती रिपोर्ट.

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aajtak.in
सारिका मल्होत्रानई दिल्ली, 10 December 2013
लौटा गोल्ड स्मगलिंग का दौर

वह अपना नाम जाहिर करना नहीं चाहेगा लेकिन आधी बांह की झक सफेद शर्ट और मुंडू (दक्षिण भारतीय धोती) जैसे सामान्य पहनावे में यह 43 वर्षीय व्यक्ति अपने पेशे के बारे में जो बताता है, वह चौंकाने वाला है.

उत्तर केरल के कासरगोड जिले का यह मूल निवासी अब दुबई में रहता है और भारत में सोने की तस्करी का 'बिचौलिया’ है. इस साल अक्तूबर में ही उसने देश में 20 किलो सोना अवैध तरीके से भिजवाया.

बेशक, वह अपनी अगली खेप के बारे में मुंह नहीं खोलना चाहता लेकिन इतना जरूर बताता है कि केरल के हवाई अड्डों पर उसके सोना ले जाने वाले कुछ 'कैरियर’ (लोग) हाल में पकड़े गए इसलिए वह राज्य के रूट के इस्तेमाल से बचेगा.

उसने उत्तर केरल के कोझिकोड में अपने दौरे के समय इंडिया टुडे ग्रुप की पत्रिका बिजनेस टुडे  को बताया, ''मैं अब राज्य से सटे हवाई अड्डों जैसे कोयंबत्तूर और मैंगलोर को पसंद करूंगा.” 

कासरगोड का यह बाशिंदा दरअसल हवाला एजेंट है लेकिन उसे सोने की तस्करी का भी अनुभव है. 1988-89 में जब स्वर्ण नियंत्रण कानून के तहत सोने का आयात प्रतिबंधित था, वह सऊदी अरब से सोना लाने वाला 'कैरियर’ का काम करता था.

116 ग्राम के सोने के 20 टुकड़ों की खेप लाने पर उसे हर टुकड़े के पीछे 2,000 रु. की आमदनी हो जाती थी लेकिन 30 टुकड़े की खेप के लिए वह दोगुनी रकम लेता था.

1991-92 में आर्थिक उदारीकरण के साथ सोने के आयात को नाममात्र का शुल्क अदा करने पर कानूनन वैध कर दिया गया तो सोने की तस्करी फायदेमंद नहीं रही. तब वह करेंसी की तस्करी करने लगा.

लेकिन अब दो दशक बाद सोने की तस्करी फिर शुरू हो गई है. इसकी शुरुआत सरकार के आला हलकों में इस एहसास के साथ हुई कि देश में चालू खाते के बेहिसाब बढ़ते घाटे की एक मुख्य वजह भारी मात्रा में सोने का आयात है.

यह घाटा 2012-13 में 88.2 अरब डॉलर यानी सकल घरेलू उत्पाद के 4.8 प्रतिशत के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने मौजूदा वित्त वर्ष में ही चालू खाते के घाटे को 60 अरब डॉलर के स्तर पर नीचे लाने के लक्ष्य के मद्देनजर सोने पर आयात शुल्क में धीरे-धीरे बढ़ोतरी कर दी.

यह शुल्क जनवरी, 2012 तक 2 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर 10 प्रतिशत हो गया है. सोने के आयात पर बंदिशें भी लगाई गईं. मसलन, उत्पाद शुल्क को 7 प्रतिशत से बढ़ाकर 9 प्रतिशत किया गया और आयातित सोने का न्यूनतम 20 प्रतिशत निर्यात करने की बाध्यता तय कर दी गई.

इन उपायों का असर हुआ और सोने के आयात का आधिकारिक आंकड़ा इस साल मई में 161.38 टन से घटकर सितंबर में मात्र 7.24 टन रह गया. लेकिन इन कड़े उपायों के अप्रत्याशित 'साइड-इफेक्ट’ भी हुए.

जैसा कि भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने खुद स्वीकार किया, ''एक चिंता यह है कि क्या सोने की तस्करी बड़े पैमाने पर हो रही है और हवाला के जरिए भुगतान हो रहा है.” उन्होंने माना कि सोने की तस्करी बढ़ी है लेकिन यह अभी छोटे पैमाने पर है.

कासरगोड के बांशिदे की तरह बिचौलियों की जिम्मेदारी सोने की खेप भारतीय एजेंटों तक पहुंचाने की होती है. वह कैरियर तलाशता है, उसे खेप सौंपता है, उसके दोनों तरफ की हवाई यात्रा का इंतजाम करता है, सीमा शुल्क व हवाई अड्डा अधिकारियों को अपने संपर्कों के जरिए रिश्वत देकर उसकी सुरक्षित यात्रा का बंदोबस्त करता है.

बिचौलिए का कमीशन अलग-अलग हो सकता है. कासरगोड के बाशिंदे के मुताबिक वह कुल वजन का 10 प्रतिशत लेता है यानी 2.5 किलो सोने की एवज में 250 ग्राम सोना.

कैरियर से खेप की आपूर्ति भारत में 'लैंडिंग एजेंट’ लेते हैं. वे उसे खुदरा दुकानों पर पहुंचाते हैं. पुराने जमाने के माफिया सरगना हाजी मस्तान, या करीम लाला वगैरह ज्यादातर समुद्र के रास्ते होने वाली तस्करी में सोने की खेप के 'लैंडिंग एजेंट’ ही हुआ करते थे, जो 1960 के दशक के मध्य में सरकारी आदेश के तौर पर लागू हुए सोना नियंत्रण कानून के बाद सक्रिय हुए थे. दाऊद इब्राहिम भी शुरू में लैंडिंग एजेंट ही था.

आज यह तंत्र कैसे काम करता है? बिचौलिया बताता है कि सोने की तस्करी का हवाला और मुद्रा तस्करी से संबंध है. हवाला के पैसे से ही यह धंधा चलता है, तस्कर की तो मामूली रकम ही लगी होती है. तस्कर हवाला ऑपरेटर के पैसे से सोना खरीदता है.

अगर खेप बड़ी हुई तो बिचौलिए की तलाश होती है वरना तस्कर खुद ही कैरियर ढूंढ़ लेता है. सोने के तस्कर, जो ज्यादातर भारतीय हैं, खाड़ी के सभी देशों में हैं लेकिन ज्यादातर दुबई स्थित एजेंटों के जरिए ही काम करते हैं.

दुबई में सोना खरीदना पूरी तरह कानूनी है और उसके बदले में रसीद मिलती है. तस्कर एजेंट के जरिए भारत में कीमत का सौदा करता है, इसे 'कटिंग’ कहते हैं, यह दर सोने की आपूर्ति तक नहीं बदलती, चाहे विश्व बाजार में कितना ही ऊंच-नीच क्यों न हो जाए. दुबई से सोना बाहर ले जाना भी पूरी तरह कानूनी है.

कैरियर को सोने की खेप के साथ रसीद भी दी जाती है, ताकि जरूरत पडऩे पर वह उसे दुबई में हवाई अड्डे पर अधिकारियों को दिखा सके. अगर खेप बड़ी हुई तो दुबई पुलिस से खेप के वजन और कैरियर के नाम का सर्टिफिकेट भी हासिल कर लिया जाता है.

भारत में सीमा शुल्क अधिकारियों को चकमा देकर या रिश्वत देकर खेप लैंडिंग एजेंट को सौंप दी जाती है.

अगर खेप पकड़ी जाती है तो पूरा घाटा तस्कर ही उठाता है इसलिए उसकी जेब का भारी होना जरूरी है. सऊदी अरब के जेद्दा में धंधा चलाने वाला, केरल के कन्नूर जिले का एक हवाला एजेंट कहता है, ''यह मुकम्मल तंत्र है. हर खिलाड़ी की भूमिका स्पष्ट है और गोपनीयता भी बरती जाती है.

मसलन, कैरियर को हवाई टिकट सौंपने वाले व्यक्ति के अलावा किसी के बारे में पता नहीं होता. कई बार तो बिचौलिए को भी पता नहीं होता कि असली तस्कर कौन है.” ऐसी सावधानियां इसलिए जरूरी हैं ताकि कैरियर के पकड़े जाने पर पूरा तंत्र ही फंदे में न आ जाए.

कन्नूर के इस बाशिंदे के मुताबिक, सऊदी अरब में करीब 200 मध्यम स्तर के हवाला एजेंट हैं जबकि दुबई में 500 के आसपास.
 
अर्थव्यवस्था
कोई तस्कर कितना कमा लेता है? एक हवाला एजेंट का आकलन कुछ इस प्रकार है. सोने का दाम ऊपर-नीचे होते रहते हैं. लेकिन, मान लीजिए किसी दिन सोने (24 कैरेट का विशुद्ध सोना) की कीमत 26.30 लाख रु. प्रति किलो है.

तस्कर अपने भारतीय साथी से भारत में 'लैंडिंग दाम’ करीब 30 लाख रु. प्रति किलो तय करेगा, इस तरह उसे प्रति किलो पर 3.70 लाख रु. मुनाफा होगा. विश्व बाजार में 26.30 लाख रु. की कीमत होने पर भारत में आधिकारिक चैनल से खरीदने पर यह प्रति किलो 31 लाख रु. से ज्यादा ही पड़ेगा. इसलिए खुदरा स्तर पर भी अच्छा कमीशन देना होगा.

कैरियर का दोनों तरफ का खर्च, खासकर हवाई यात्रा का, तस्कर को ही उठाना पड़ता है, जो 30,000 रु. पड़ता है. इसके अलावा कैरियर को प्रति किलो के हिसाब से 1,000 दिरहाम (17,000 रु.) कमीशन देना पड़ेगा.

इस तरह पहले एक किलो की खेप पर कुल मुनाफा 3.20 लाख रु. है. अगर कैरियर एक किलो से ज्यादा ले जाता है तो मुनाफा बढ़ जाता है क्योंकि अतिरिक्त सिर्फ कमीशन ही देना पड़ता है.

आयात शुल्क बढऩे के पहले, जब सोने की तस्करी काफी कम थी, खाड़ी देशों से लौट रहे लोगों खासकर मजदूरों को ही कैरियर के रूप में इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन तस्करी में तेजी आने और मुनाफा बढऩे पर कैरियर भी बदल गए हैं.

हाल में सोना जब्त किए जाने के मामलों से पता चलता है कि इसमें स्त्रियों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है. यहां तक कि बाल-बच्चों वाले परिवारों और विमानकर्मियों तक से कैरियर का काम लिया जा रहा है. कोझिकोड में एक वरिष्ठ सीमा शुल्क अधिकारी कहते हैं, ''हाल तक बुर्का पहने कोई गर्भवती या गोद में बच्चों वाली महिला अमूमन कैरियर नहीं हुआ करती थी.”

अधिक चुस्त तरीके अपनाने वाले कैरियर अब कमीशन भी ज्यादा मांगते हैं. अब इसमें एक नया तत्व 'एरेंजर’ का जुड़ गया है, जो कैरियर का जुगाड़ करते हैं. हाल में महिला कैरियरों की गिरफ्तारी के बाद अब उनकी मांग घट गई है.

बिचौलियों का मानना है कि ऐसे कैरियरों की गिरफ्तारी पर मीडिया में ज्यादा हो-हल्ला मचता है, जो इस धंधे के लिए अच्छा नहीं है. अब ज्यादा मांग खासकर ग्रामीण पृष्ठभूमि के युवा भारतीयों की है.

कैसे छुपाया जाता है सोना? छोटी मात्रा तो जेब या बैग वगैरह में ऐसे छुपाई जा सकती है कि शक न हो लेकिन मात्रा के कई किलो होने पर अलग तरीका अपनाया जाता है. पुलिस और सीमा शुल्क अधिकारियों का मानना है कि दुबई में छुपाने में माहिर यानी 'कंसीलमेंट एजेंटों’ की जमात तैयार हो गई है और ये सभी भारतीय हैं.

ये एजेंट इमरजेंसी लाइट, वाशिंग मशीन, व्हीलचेयर, बच्चों की साइकिल, टीवी सेट वगैरह में सोना छुपाने के नए-नए तरीके ईजाद करने में माहिर हैं. ये हर तीन किलो सोना छुपाने के लिए 500 दिरहाम लेते हैं.

केरल तस्करी के सोने का एक अहम ठिकाना है. त्रिशूर, कोडुवैली, वेंगारा जैसे शहर इसके प्रमुख केंद्र हैं. यहां के व्यापारी पूरे राज्य और पूरे देश में सोना खपा देते हैं. मसलन, कोझ्किोड जिले में छोटे-से शहर कोडुवैली में महज 50 मीटर के इलाके में जेवरात की 200 दुकानें हैं. दुकानदार कहते हैं कि भारतीयों में सोने की भूख इतनी है कि बिक्री कोई समस्या नहीं है.

अंगमल्लै कस्बे में मझेले स्तर का एक दुकानदार बताता है कि अवैध तरीके से आया सोना खरीदने से न सिर्फ आयात शुल्क बचता है, बल्कि 1 प्रतिशत वैट और राज्य के अन्य कर देने से छुटकारा मिल जाता है. कोझिकोड में एक थोक बिक्रेता कहता है, ''जेवरात के संगठित और असंगठित क्षेत्र, दोनों के दुकानदार तस्करी वाले सोने पर आश्रित होते हैं.

संगठित क्षेत्र वाले अपनी जरूरत का करीब 30 प्रतिशत तस्करों से लेते हैं जबकि असंगठित क्षेत्र में 50 प्रतिशत के आसपास खपत है. बड़ी दुकानें भी अधिकृत कारोबार से ही नहीं चल सकतीं. वे अपने खातों में अनधिकृत चैनलों से आए सोने को 'पुराना सोना’ या 'स्कैरप सोना’ कहकर दर्ज करते हैं.”

इसके अंत का कोई संकेत नहीं दिखता. 2013 में सोने की अनुमानित मांग 950 टन थी जबकि अभी तक आधिकारिक चैनलों से 400 टन ही आया है. यह कमी कैसे पूरी होगी, इसका अंदाजा आसानी से लग सकता है.

एजेंटों का अनुमान है कि कम-से-कम अगले साल आम चुनावों तक शुभ दिन जारी रहेंगे. आयात शुल्क कम नहीं किया जाएगा. शायद एक वजह चुनाव प्रचार के लिए हवाला के पैसों को तस्करी के सोने के जरिए आसानी से देश में लाना भी है.

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