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पुरानी है सचिन पायलट और अशोक गहलोत की सियासी अदावत, जानें लड़ाई का पूरा इतिहास

राजस्थान में कांग्रेस पार्टी इस वक्त संकट से गुजर रही है. अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की लड़ाई सबके सामने है और सरकार पर खतरा मंडरा रहा है.

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aajtak.in
शरत कुमार जयपुर, 13 July 2020
पुरानी है सचिन पायलट और अशोक गहलोत की सियासी अदावत, जानें लड़ाई का पूरा इतिहास सचिन पायलट और अशोक गहलोत

  • पुरानी है सचिन पायलट और अशोक गहलोत की लड़ाई
  • विधानसभा चुनाव के बाद से ही दिखी नाराजगी
  • कई मसलों पर आमने-सामने आ चुके हैं दोनों नेता

राजस्थान में मची सियासी हलचल के बीच कांग्रेस में सचिन पायलट और अशोक गहलोत के रास्ते अब अलग होते दिख रहे हैं. लेकिन दोनों के बीच पैदा हुई इस दरार का एक अपना इतिहास है, जो लंबे वक्त से चलता आ रहा है. अशोक गहलोत के दूसरे कार्यकाल में जब कांग्रेस बुरी तरह से हार गई थी, तब केंद्रीय मंत्री के रूप में केंद्र सरकार में शामिल सचिन पायलट को राजस्थान की कमान दी गई थी. उसके बाद लोकसभा चुनाव में सचिन पायलट को करारी शिकस्त मिली और 25 की 25 सीटें हार गए. खुद सचिन पायलट भी चुनाव हार गए. मगर कांग्रेस आलाकमान ने उन पर भरोसा जताते हुए 5 साल तक उनको कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा, इस बीच कांग्रेस महासचिव के रूप में अशोक गहलोत कांग्रेस पार्टी में काम करते रहे.

उत्तर प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव प्रभारी रहे जहां पर उत्तर प्रदेश को छोड़कर बाकी जगह सफलता मिली. इस सफलता के बाद अशोक गहलोत राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर से स्थापित हो गए, जिसके बाद सचिन पायलट और अशोक गहलोत में अदावत शुरू हो गई.

कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी दोनों को एक साथ गाड़ी में लेकर घूमते थे. हर रैली में दोनों का एक साथ हाथ उठाया जाता और यहां तक की हालत यह हो गई थी कि रैली के लिए जयपुर के खासा कोठी होटल में बस लगती थी और बस में अशोक गहलोत सचिन पायलट को एक सीट पर बैठा कर कांग्रेस की रैली में ले जाया जाता था.

उसके बाद टिकट बंटवारे को लेकर सचिन पायलट और अशोक गहलोत में ठन गई. राहुल गांधी ने सचिन पायलट को फ्री हैंड दिया, तब राजनीति में चतुर अशोक गहलोत ने अपने लोगों को निर्दलीय खड़ा कर दिया और 11 निर्दलीय के अलावा अपने एक करीबी स्वास्थ्य राज्य मंत्री सुभाष गर्ग को राष्ट्रीय लोक दल से समझौते के नाम पर टिकट दिलवा दिया. कांग्रेस जब बहुमत से 1 सीट कम रह गई तो अशोक गहलोत ने 13 निर्दलीय और राष्ट्रीय लोक दल के विधायक के साथ कांग्रेस आलाकमान को अपनी ताकत दिखाई और इस बीच सचिन पायलट के कई करीबी चुनाव हार गए. बस यहीं से कहानी पूरी तरह पलट गई.

कहते हैं राहुल गांधी आखिरी दम तक कोशिश करते रहे कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाएं, इसके लिए उन्होंने कई बार विधायकों से रायशुमारी की. मगर 35 साल से राजस्थान की राजनीति में सक्रिय अशोक गहलोत विधायकों के समर्थन के मामले में सचिन पायलट पर भारी पड़ गए और सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री के पद पर रहकर संतोष करना पड़ा.

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दोनों के बीच सियासी अदावत का किस्सा पुराना है...

1. इन दोनों के बीच खाई की बुनियाद तो उसी दिन पड़ गई थी जब शपथ ग्रहण समारोह में सचिन पायलट ने कहा कि मैं उप-मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लूंगा और अशोक गहलोत के साथ लूंगा.

2. फिर जब मंत्रियों को शपथ दिलाई जाने लगी तो राजभवन में सचिन पायलट ने कहा कि मेरी भी कुर्सी राज्यपाल के बगल में लगेगी, जहां पर मंत्री शपथ ले रहे हैं. उस समय कहा जाता है कि अशोक गहलोत ने विरोध किया कि उपमुख्यमंत्री का पद कोई संवैधानिक पद नहीं होता है. वह एक कैबिनेट मंत्री की हैसियत का होता है इसलिए राज्यपाल और मुख्यमंत्री के कुर्सी के बगल में उपमुख्यमंत्री का कुर्सी नहीं लग सकती, मगर सचिन पायलट ने अपनी कुर्सी लगवाई.

3. सरकार बनने के कुछ वक्त बाद ही सचिन पायलट को दिखने लगा कि उनके साथ सिर्फ एक कैबिनेट मंत्री के रूप में बर्ताव किया जा रहा है.

4. राजस्थान विधानसभा में मुख्य द्वार से केवल राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री आते हैं. उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट उसी रास्ते से पहली बार जब विधानसभा शुरू हुई तो आए 1 दिन तो वह आ गए, मगर दूसरे दिन जैसे ही आए विधानसभा के मास्टर ने उन्हें रोक लिया और कहा कि आप विधायकों और मंत्रियों के रास्ते से आइए.

सचिन पायलट जिद पर अड़ गए तो अशोक गहलोत ने उन्हें आगंतुकों के रास्ते से आने का प्रावधान कर दिया यानी बीच का रास्ता निकाला गया कि ना तो मुख्यमंत्री के रास्ते से आएंगे और ना हम मंत्रियों के रास्ते से आएंगे वह दूसरे रास्ते से ही आएंगे.

5. इसके बाद धीरे-धीरे सरकार के फैसलों में सचिन पायलट की हिस्सेदारी कम होती चली गई, धीरे-धीरे पायलट के करीबी जो मंत्री थे वह अशोक गहलोत के करीबी होते चले गए और पायलट हाशिए पर आ गए.

6. प्रियंका गांधी की राजनीति में एंट्री के साथ ही सचिन पायलट के लिए दुश्वारियां बढ़ गईं और अशोक गहलोत 10 जनपथ में मजबूत होते चले गए.

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7. इस बीच सचिन पायलट व्यक्तिगत बातचीत में अक्सर बताया करते थे कि 1 साल से ज्यादा हो गया अब राहुल गांधी उनसे बातचीत नहीं करते हैं यानी कांग्रेस में अब उनके पास न दिल्ली में जगह बची थी और न ही राजस्थान में.

8. राजस्थान में फिलहाल स्थानीय निकाय के चुनाव होने हैं जिसमें पंचायत से लेकर शहरी चुनाव में टिकट बांटना है. मगर अशोक गहलोत चाहते थे कि सचिन पायलट को प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाया जाए, इसे लेकर पायलट बेहद नाराज थे.

9. इस बीच इस साल जनवरी से ही सरकार गिराने की साजिश है शुरू हो गई थी और इसमें सचिन पायलट के साथ देने के लिए बीजेपी के केंद्रीय नेता शामिल हो गए थे.

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