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चुनाव से पहले 'उड़ता पंजाब' ने ड्रग्स मुद्दे को दिया राजनीतिक रंग

दरअसल अपने नाम और कहानी को लेकर यह फिल्म रिलीज से पहले ही काफी चर्चा में थी. सेंसर बोर्ड के बाद अपील ट्रिब्यूनल ने फिल्म से पंजाब शब्द हटाने का आदेश दिया और विवाद शुरू हो गया.

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aajtak.in
प्रियंका झा/ रीमा पाराशर नई दिल्ली, 09 June 2016
चुनाव से पहले 'उड़ता पंजाब' ने ड्रग्स मुद्दे को दिया राजनीतिक रंग फिल्म के निर्माता-निर्देशकों ने केंद्र सरकार पर लगाए आरोप

विवादों में घिरी फिल्म उड़ता पंजाब ने अब वो राजनीतिक रंग ले लिया है जिसमे घिरकर फिल्म की रिलीज से ज्यादा बात नेताओं और राजनीतिक दलों की आपसी लड़ाई पर आकर उलझ गई है. पंजाब में नशे के दलदल में फंसे युवाओं पर आधारित उड़ता पंजाब पर सेंसर की कैंची से भड़के अनुराग कश्यप और सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेट यानी सीएफबीसी के डायरेक्टर पहलाज निहलानी के बीच चल रहे आरोप आग में घी डाल रहे हैं. लेकिन पंजाब में अगले साल होने वाले चुनाव से पहले ये बात जरूर साफ हो रही है कि राज्य में ड्रग्स का मुद्दा किस हद तक राजनीतिक रंग लेगा.

पंजाब शब्द से शुरू हुआ विवाद
दरअसल अपने नाम और कहानी को लेकर यह फिल्म रिलीज से पहले ही काफी चर्चा में थी. सेंसर बोर्ड के बाद अपील ट्रिब्यूनल ने फिल्म से पंजाब शब्द हटाने का आदेश दिया और विवाद शुरू हो गया. अनुराग कश्यप ने कहा की सूचना और प्रसारण मंत्रालय को दखल देना चाहिए और वो इस बात से निराश हैं कि मंत्री उनकी सुनवाई नहीं कर रहे. जवाब में सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री राज्यवर्धन राठौर ने कहा की फिल्म मेकर्स को ट्रिइब्यूनल में जाने का अधिकार है क्योंकि मंत्रालय या सरकार का इससे लेना-देना नहीं.

लेकिन चुनाव से ठीक 8 महीने पहले रिलीज के लिए अटकी उड़ता पंजाब को विवादों में घिरना ही था क्योंकि फिल्म की थीम यानी राज्य में नशे की लत वो मुद्दा है जिसे आम आदमी पार्टी और कांग्रेस सत्ताधारी अकाली बीजेपी के खिलाफ इस्तेमाल करती रही है. सरकार के सूत्र भी इस बात से इनकार नहीं कर रहे कि फिल्म पर लड़ाई अब राजनीतिक है. सूत्रों का कहना है कि नशे की समस्या सिर्फ पंजाब ही नहीं बल्कि पूरे भारत में है इसलिए सिर्फ पंजाब को केंद्र में रखकर फिल्म बनाना सही नहीं है.

केंद्र सरकार नहीं दे सकती दखल
फिल्म के समर्थन में उतरे राजनीतिक दल पूरे विवाद के लिए केंद्र सरकार और मंत्रालय को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. लेकिन 'मेल टुडे' के हाथ लगे सुप्रीम कोर्ट के 28/11/2000 के फैसले पर नजर डाले तो ये साफ होता है कि केंद्र सरकार को किसी भी फिल्म में कट लगाने या रिलीज का हक ही नहीं है. ये जिम्मेदारी CBFC की है. कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया वर्सेस केएम शंकरप्पा आदेश में साफ कहा गया है कि अगर फिल्म के निर्माता-निर्देशक सीबीएफसी के फैसले से खुश न हो तो वो ट्रिब्यूनल में अपील कर सकते हैं, और सरकार भी ट्रिब्यूनल के दिए फैसले को मानने के लिए बाध्य है. फैसले में कहा गया है कि संविधान में सरकार को भी न्यायिक आदेशों का पालन करना होता है.

अगर ट्रिब्यूनल में बैठे जानकार कोई फैसला करते हैं तो उसे मानना पड़ता है. इस फैसले का हवाला देकर सरकार ने पूरे मामले से पल्ला झाड़ लिया है लेकिन राजनीति यही खत्म होगी ऐसा फिलहाल दिखाई नहीं देता. क्योंकि अब फिल्म की रिलीज से ज्यादा बात राजनीतिक आरोपों के इर्द-गिर्द घूम रही है.

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